कश्मीर: बीमार का इलाज, बीमारी का नहीं



झाबुआ से भाजपा विधायक जीएस डामोर के बयान का बुरा नहीं मानना चाहिए। उस पर चिल्लपों की जरूरत भी नहीं है। क्या हुआ जो उन्होंने कश्मीर के चार जिलों को अलग कर नया राज्य बनाने का फॉर्मूला सुझा दिया ! आप कहेंगे कि बात बे-सिर पैर की है। आप सही कह रहे हैं। आपका यह खयाल भी होगा कि ऐसा करने से भी आतंकवाद खत्म नहीं होगा। इस बात पर भी हमारी सहमति है। लेकिन कश्मीर और खासतौर से आतंकवाद से जुड़ी समस्या सुलझाने के नाम पर चहुंओर जो कुछ चल रहा है, उसे देख और सुनकर डामोर की बात बहुत अधिक नहीं खलती है।  सबसे पहले यह समझिए की आखिर कश्मीर की समस्या क्या है। समस्या यह है कि इस राज्य को लेकर चल रहे तमाम बखेड़े यदि खत्म हो गये तो कई राजनीतिक और गैर-राजनीतिक चेहरों के सामने आजीविका का संकट आ जाएगा। ऐसे राजनेताओं में महबूबा मुफ्ती और उमर तथा फारूक अब्दुल्ला सहित कविंदर गुप्ता के स्थानीय नाम हैं तो इसी फेहरिस्त में दिल्ली में बैठकर केंद्रीय स्तर पर अपनी राजनीति चमकान ेवाले कई सियासतदां भी शामिल हैं।


गैर राजनीतिक नामों में अलगाववादी हैं। कश्मीर की वह आवाम है, जो रह-रहकर शेष आबादी को देश के खिलाफ भड़काती है। खुद के अलग होने की बात कहती है। इस भयावह कुटिलता में इन सबसे ऊपर है पाकिस्तान। उस देश के तो राजनीतिज्ञों का वजूद और सेना की समानांतर सरकार ही केवल इस दम पर चलती है कि उन्होंने कश्मीर के मुद्दे को कभी शांत होने नहीं दिया।  तो, कश्मीर देश की सियासत का बहुत बड़ा केंद्र है और उसकी समस्या को बनाए रखना अनेक लोगों के निहित स्वार्थ की खुराक पूरी करने का एकमात्र जरिया है। इसलिए देश के इस हिस्से में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए कम मौकों पर ही ठोस सुझाव आते हैं। बाकी जो कहा जाता है, वह डामोर एंड कंपनी के इर्द-गिर्द और उनके स्तर वाली बात ही रहती है। अच्छे सुझावों की हत्या करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। सर्वदलीय  प्रतिनिधि मंडल वहां के हालात का जायजा लेने गया तो वामपंथियों के पेट में यह सोचकर मरोड़ उठ गयी कि अलगाववादी इस चर्चा में शामिल नहीं हो रहे हैं।


दहशतगर्दों के पालतू पत्थरबाजों पर प्रभावी नियंत्रण लगता दिखा तो पैलेट गन को लेकर घाटी से दिल्ली तक कोहराम मचा दिया गया। बहुत बड़ी बात है कि अलगाववादियों के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी और प्रवर्तन निदेशालय की सख्ती का स्वयंभू धर्म निरपेक्ष ताकतों ने विरोध नहीं किया है। लेकिन आवाज तो उठ रही है। पूर्व मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती वहां के एक ऐसे संगठन के खाते सील होने पर नाराजगी जता चुकी हैं, जिसके खिलाफ देश-विरोधियों का साथ देने के पुख्ता सबूत मौजूद हैं।  डामोर के सुझाव से कुछ नहीं होना है। ठीक उसी तरह, जैसे ममता बनर्जी और दिग्विजय सिंह के ‘सबूत मांगो’ अभियान का देश की गौरवमयी सेना की विश्वसनीयता पर कोई असर नहीं होगा। लेकिन दु:खद यह है कि इतनी पुरानी और जटिल हो चुकी समस्या को अगंभीर सुझावों और बचकाने बयानों के जरिए सुलझाने के प्रयास का दिखावा किया जा रहा है। देश में कोई भी सरकार रही हो, वह इस राज्य की बीमारी की बजाय बीमार का इलाज करने तक ही सीमित रही। इसे उसी तरह दुर्भाग्य मान लिया जाए, जिस तरह डामोर जैसे नेताओं के बयान पर अफसोस जताने के सिवाय और कुछ नहीं किया जा  सकता। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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