गिरोहबंदी को खत्म किए बिना खतरे में ही रहेगी आंतरिक सुरक्षा



'यह हमारे दुश्मन की खुशकिस्मती है कि उसे हमारे देश में आतंक फैलाने के लिए केवल हथियार भेजना होते हैं, आदमी नहीं।' यह एक फिल्म का संवाद है। जिसे हिंदुस्तानी पुलिसकर्मी का किरदार निभा रहा अभिनेता कहता है। फिल्म थी, सरफरोश। बीस साल पहले रिलीज हुई थी। इसके बाद से तो हालात और भी बिगड़ चुके हैं। क्योंकि पड़ोसी मुल्क हथियारों के साथ-साथ विचारधारा भी भेज रहा है, जिसे पालने-पोसने वाले और कोई नहीं, इस देश के ही कई नागरिक हैं।  कलम की सियाही चुक जाएगी। लिखते-लिखते हाथ थक जाएंगे, लेकिन ऐसे नागरिकों की पूरी फेहरिस्त फिर भी तैयार नहीं की जा सकती। क्योंकि वो कुकुरमुत्ते की तरह पनपते चले जा रहे हैं। और यही कुकुरमुत्ते देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए आज सबसे बड़ा खतरा बनकर तेजी से नासूर की शक्ल में तब्दील होते जा रहे हैं। कल्पना कीजिए कि यदि आज 'देश के टुकड़े-टुकड़े' करने की कामना रखने वाला कन्हैया कुमार इसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा है तो फिर भविष्य क्या होगा! यह देश-विरोधी गतिविधि और भावनाओं को प्रश्रय देने का ऐसा खतरनाक दौर है, जिसकी परिणति में टुकड़े-टुकड़े हुए सोवियत संघ जैसा परिदृश्य साफ दिखाने लगता है। एक उदाहरण देता हूं। कन्हैया कुमार के चुनाव की खबर में कितनी बार आपने देखा कि उसके लिए 'देशद्रोह का आरोपी' या 'जमानत पर चल रहा' वाली बात लिखी जाती है! ऐसा न के बराबर हो रहा है


जो ऐसा करते हैं, तुरंत उन्हें 'भक्त' की संज्ञा देकर चुप कराने का जतन शुरू हो जाता है। दूसरी ओर, कोई भी न्यूज पोर्टल खोल लीजिए। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से जुड़ी कमोबेश हर खबर में 'मालेगांव बमकांड', 'सुनील जोशी कांड' और 'अजमेर बम कांड' का जिक्र सोद्देश्य किया जाता है।  एक खास किस्म के एजेंडे को लागू करने के लिए कैसे षड़यंत्र रचा जाता है, इसका उदाहरण भोपाल से ही मिल रहा है। वामपंथी दलों का इस लोकसभा क्षेत्र में कोई जनाधार नहीं है। तमाम चुनाव में उनके प्रत्याशियों का अंजाम अंतत: 'जमानत जब्त' वाला ही होता है। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ने घोषणा की कि दिग्विजय सिंह के खिलाफ वह प्रत्याशी नहीं उतारेगी। असर यह कि दिग्विजय ने तुरंत ही भाकपा के टिकट पर बेगूसराय से चुनाव लड़ रहे कन्हैया कुमार को न केवल देशद्रोह मामले में क्लीन चिट दे दी, बल्कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुई देश-विरोधी नारेबाजी का आरोप आरएसएस और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद पर जड़ दिया। बदले में कन्हैया कुमार को यहां आकर दिग्विजय सिंह का प्रचार करना था। पर शायद किसी ने समझा दिया कि इसका कोई फायदा भोपाल में नहीं होगा, लिहाजा, कन्हैया कुमार टल गए। लेकिन फिर सीताराम येचुरी और जावेद अख्तर जैसों को भोपाल में बुलाया गया। दरअसल, मोदी हजम नहीं हो पा रहा है इसलिए एक ऐसा  प्रचार तंत्र और स्लीपर सेलनुमा नेटवर्क को बड़ी ताकत बनाने की कोशिश की जा रही हैं।


इसमें हर महत्वपूर्ण हिस्से के कई लोग शामिल हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया और सबसे भयावह भूमिका सोशल मीडिया निभा रहा है। कठुआ में मुस्लिम बच्ची के साथ सामूहिक ज्यादती की हर खबर में यह अनिवार्य रूप से लिखा और बताया गया कि यह घटनाक्रम एक मंदिर के भीतर हुआ। सारा देश हिल उठा। भोपाल के बोर्ड आॅफिस चौराहे पर भी आरोपियों को फांसी देने की मांग को लेकर जुलूस निकाल दिया गया। इस घटना के शोर के बीच ही साहिबाबाद के मदरसे में एक हिंदू बच्ची गीता से सामूहिक ज्यादती हुई। भोपाल के बोर्ड आॅफिस चौराहे पर इसके खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुनाई दिया। एक शख्स ने फेसबुक पर तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए लिखा, 'गलती सरासर गीता की ही है। उसने धर्म गलत चुना और अपने साथ हुए दुष्कर्म के लिए भी गलत स्थान का चयन किया। वरना तो आज उसके लिए देश से विदेश तक इतने आंसू बह रहे होते कि प्रलय ही आ जाती।' पोस्ट के समर्थन में कमेंट््स आना तो दूर, लाइक्स भी गिने-चुने ही मिल सके। अलबत्ता उस यूजर को गिरोह के एक सदस्य ने बदतमीज लेखक साबित कर दिया।  देश को भीतर से खतरा उस हर शख्स से है, जो वंदेमातरम कहने से मना करता है। उससे भी बड़ा खतरा उस गिरोह से है, जो तुरंत ऐसा करने वालों की हिमायत में सामने आ जाता है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह कि राष्ट्र-हित के खिलाफ लोग इतने हो जाते हैं, जिनकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। फेसबुक यूजर एक महिला को मैं जानता हूं।


राष्ट्रीय स्तर के शिक्षण संस्थान से रिटायर हुई हैं। कुछ साल पहले तक उनके एफबी अकाउंट पर पारिवारिक छायाचित्र या कोई उत्कृष्ट साहित्यिक कृति ही दिखती थी। नोटबंदी के बाद उनसे मिलना हुआ। पता चला कि उनके चिरंजीव का भारी-भरकम काला धन (जिसे वह सेविंग्स बता रही थीं) तबाह हो गया है। उसके बाद से मैंने उनकी हर फेसबुक पोस्ट पर सिर्फ और सिर्फ भाजपा, संघ और हिंदुत्व का विरोध ही देखा है। महिला हिंदू है। खास बात यह कि उनकी ऐसी हर पोस्ट को एक खास समुदाय के पूर्व छात्र-छात्राओं का खुलकर समर्थन मिलता है।  सोशल मीडिया इस गिरोह का सबसे बड़ा अड्डा है। आप खुद देखिए। गोविंद पानसरे और गौरी लंकेश की हत्या हिंदूवादी संगठनों ने की इस शीर्षक वाली असंख्य पोस्ट आपको उस पर दिखेंगी। जिनके मुकाबले कश्मीर में आरएसएस नेता चंद्रकांत शर्मा की हत्या वाली पोस्ट न के बराबर ही दिखती हैं। बीबीसी की खबरें पढ़िए। हाल ही में  उसकी वेबसाइट पर एक आतंकवादी के बारे में सूचना पढ़ी। सारी खबर में घोषित आतंकी के लिए 'वे ऐसा करते थे' जैसे सम्मानसूचक शब्द लिखे गये थे। कश्मीर में पैलेट गन से घायल हुए पत्थरबाजों के भयावह छायाचित्र प्रकाशित करने वाले इस समाचार संस्थान ने शायद ही कभी वह छायाचित्र दिखाया हो, जिसमें पत्थरबाजों के हाथ जख्मी सुरक्षा बल का कोई जवान दिख रहा हो।


  बहुत बड़ी समस्या यह हुई कि ऐसी ताकतों को रोकने के प्रयास बहुत देर से शुरू हुए हैं और वो भी बेहद बिखरे स्तर पर। सन 1992 के विवादित ढांचा विध्वंस के बाद की एक बात है। विनोद दुआ के एक टीवी कार्यक्रम में उन्होंने किसी शहर की बात दिखाई। जिस समय वह कमेंट्री कर रहे थे कि शहर के लोगों में भड़काऊ नारेबाजी से डर है, उस समय जो चित्र दिखाया गया, वह अयोध्या में मंदिर के पक्ष में लिखे गये नारे का था। राष्ट्रीय स्तर की एक पत्रिका ने अयोध्या दंगे के बाद बेहद प्रभावित एक क्षेत्र पर खास खबर की। बताया कि किस तरह वहां के बच्चे इस सबसे उबरकर नया जीवन जी रहे हैं। हद तो यह थी पूरी स्टोरी में सारे मुस्लिम बच्चों का ही जिक्र था। मानो एक भी हिंदू इन दंगों से प्रभावित नहीं हुआ हो। इन सब पर सामूहिक एवं सशक्त विरोध नहीं जताया गया। नतीजा यह कि आज यह जहर हर ओर फैल चुका है। अवार्ड वापसी गैंग को हम जानते हैं, लेकिन अवार्ड देने वाली एक अघोषित गैंग की ओर हमारा ध्यान अब भी नहीं जा रहा। यह वह गिरोह है, जो देश या हिंदुओं के खिलाफ बात एवं आचरण करने वाले किसी भी  शख्स को तुरंत धर्म निरपेक्ष प्रगतिशील या सच्चा हिंदुस्तानी का खिताब प्रदान कर देता है। जब कोई हिंदू ऐसा करता है तो उसे तत्काल प्रभाव से सच्चे हिंदू की संज्ञा दे दी जाती है। यह नेटवर्क इतना तगड़ा है कि इसने बहुतायत में हिंदुओं का ही मानसिक गुलाम बना लिया है। ऐसी एक-एक गतिविधि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा है। जिसके निदान का चिंतन ही नहीं, बल्कि तुरंत  उपाय करना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन गयी है। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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