क्या ये तर्क कयासों से परे नहीं हैं.....



 आखिरकार चुनावों का ऐलान हो गया है। कयास हम कितने भी लगा लें पर रिज़ल्ट आने से पहले नहीं कहा जा सकता कि टॉपर कौन होगा। इसलिए बात उन बातों की जो कयासों से परे हैं। 2014 में जब नई सरकार सत्ता में आई थी तो उसे चुनने का कारण मनमोहन सरकार की नाकामियां थी, लगातार बढ़ रही अराजकता थी, दिन पर दिन खुल रहे घोटाले थे, बढ़ती महंगाई थी, अपराध और बेरोजगारी का बढ़ता ग्राफ था और देश में जगह-जगह हो रहे बम धमाके थे। पाकिस्तान जब चाहे तब हमें आंखे दिखाता था और हमारे सैनिकों के सिर तक काट कर ले जाता था। मोदी सरकार सत्ता में आई तो बदलाव आया। आज महंगाई काबू में है, अराजकता पर लगाम है, जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में कहीं कोई बम नहीं फटा। घोटाले नहीं हुए। हां, राफेल स्कैम पर बात करना बेमानी है क्योंकि उसकी सच्चाई सब जानते हैं, भले ही मानें ना। कुम्भ इतने भव्य स्तर पर हुआ। और उसमें सबकुछ हुआ सिवाय भगदड़ में लोगों के मरने के, जो अब से पहले कभी नहीं हुआ था। घोटाले करके विदेश में बस जाने के दिन लद गए। अब तो हाल यह है कि लोग विदेश भागने के बाद भी भारत सरकार के डर में जीते हैं। क्रिश्चियन मिशेल तक को भारत ले आए हम।


माल्या जो ग्यारह हज़ार करोड़ का कर्ज लेकर भागा था, उससे 13 हज़ार करोड़ वसूल लिए और इसके बावजूद उसके एक्सट्रेडिशन की कोशिशें जारी हैं। नीरव मोदी का बंगला उड़ा दिया। उसकी हालिया हालत देखकर अन्दाजा़ लगाया जा सकता है कि वह अपने बच जाने को लेकर कितना सुनिश्चित है। अपराधियों की आंखों में कानून का यहीं डर तो देखना चाहते थे हम...। आज पाकिस्तान डरता है हमसे। हां, उन लोगों के भोलेपन पर कुछ नहीं कहना, जिन्हें सर्जिकल स्ट्राइक और अभिनन्दन का ढाई दिन में वापस आ जाना केवल सेना का शौर्य लगता है और जिन्हें इमरान खान की कोशिशों में डर नहीं शान्ति की पहल दिखती है। पाकिस्तान के अलग-थलग पड़ जाने में भी इन भोलेभाले लोगों को सरकार की नीतियों का हाथ नहीं दिखता। आज हम बतौर एक देश इस सरकार के नेतृत्व में ना केवल सुरक्षित महसूस करते हैं, बल्कि शक्तिशाली भी मानने लगे हैं खुद को। हमारा लीडर ऐसा है जो जहां जाता है, लोग उसे हाथों हाथ लेते हैं फिर चाहे अमेरिका हो या अरब देश। यहीं तो चाहते थे हम। यह भी दिक्कत थी हमें कि राजनेताओं के घोटालों में शामिल होने के बावजूद कोई उन पर हाथ नहीं डालता। इस सरकार ने यह भी कर दिखाया। सोनिया गांधी और राहुल गांधी ज़मानत पर है, हैराल्ड हाउस खाली करना पड़ा है।


चिदम्बरम और उनके सुपुत्र अदालतों के चक्कर काट रहे हैं, वाड्रा साहब रोज़ ई़़डी के मेहमान बन रहे हैं। कश्मीर मुद्दे पर तो ऐसा कड़ा रुख आजतक किसी का नहीं दिखा। अलगाववादी नेता जेल में हैं, और सरकार को आंखे दिखाने वाले राजनेता डरे हुए हैं कि इस सरकार का कोई भरोसा नहीं, पता नहीं कब 370 हटा दें। सड़कें बन रही हैं, विकास हो रहा है, और तो और, जिन जिन योजनाओं की इस सरकार में नींव पड़ी, अधिकतर पूरी भी हो चुकी हैं। यहीं तो चाहिए था हमें, हमेशा से अपनी सरकार से.... रही बात असिहष्णुता और साम्प्रदायिकता की खाई की, जो एज़ पर विपक्षी दल, बढ़ी है, तो उनके लिए बस यह कहना है कि इन पांच सालों और उससे पहले के पांच सालों के आंकड़े उठा कर देख लें कि किस वक्फे में दंगे ज़्यादा हुए हैं। हां यह ज़रूर है कि बीते पांच सालों में हमने बायस्ड पत्रकारिता की नई मिसालें कायम होती देखी हैं। नेता, अभिनेता, पत्रकार, आम लोग, सबके चेहरों से नकाब उतर गए हैं। पहले हम जिन पर आंख मूंद कर विश्वास कर लेते थे उनसे अब सोशल मीडिया के ज़रिए सीधे सवाल कर रहे हैं तो हाल यह है कि अब तक जो शान्त और बौद्धिक नज़र आते थे, वो अब बदले बदले से सरकार नज़र आने लगे हैं।बाकी, अन्तिम फैसला तो हम पर ही हैं कि हम किसे अपनाएंगे और किसे ठुकरा देंगे। मई की गर्मी में सब क्लीयर हो जाएगा...पर मेरी दुआएं उनके साथ हैं, जिन्होंने इस देश में जबरदस्त बदलाव की नींव रखी है और नामुमकिन को मुमकिन करने का भरोसा दिया है..

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चित्रा अग्रवाल

चित्रा अग्रवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं जिन्होंने प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में सफलतापूर्वक काम किया है। दैनिक जागरण, अमर उजाला से लेकर आज तक में काम करने के बाद इन दिनों वे दिल्ली में पत्रकारिता के विद्यार्थियों को पढ़ा रही है। सामयिक मुद्दों पर चित्रा सटीक टिप्पणी करती हैं।



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