‘श’ और ‘स‘ के फर्क में पिसता मुल्क



एक गायन प्रतियोगिता की याद आ रही है। कांटे का मुकाबला था। एक से बढ़कर एक गायक-गायिकाएं। अंत में विजेता के लिए दो युवतियां बचीं। दोनो के गायन में कोई कमी नहीं थी। जज दुविधा में थे। तब एक गायिका से कहा गया कि वह गीत की पंक्ति ‘...दीवारो-दर को ‘गौर’ से पहचान लीजिए..’ दोहराये। प्रतिभागी ने ऐसा करते हुए नाममात्र की नजर आने वाली चूक कर दी और उसे तुरंत बाहर कर दिया गया। दरअसल युवती ने ‘गौर’ की जगह ‘गौर’ कह दिया। ‘गौर’ का मतलब ध्यान देना होता है और गोर का आशय होता है कब्र। जजों का कहना था कि यदि गायन में उच्चारण की शुद्धता का ध्यान न रखा जाए तो यह बहुत बड़ी खामी का परिचायक है। इसी तरह की नाममात्र की भूल के चलते नरेंद्र मोदी चौतरफा घिर गये हैं। मामला उच्चारण की चूक का ही है। उन्हें ‘शराब’ कहना था, लेकिन ‘सराब’ कह गये। शराब यानी मदिरा। सराब यानी मृग मरीचिका। मोदी ने उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन की तुलना सेहत के लिए घातक शराब से की। गलती उच्चारण में कर गये। नतीजा यह कि सियासी विरोधी भाषणों में और शेष विरोधी सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री पर पिल पड़े हैं।


  वैसे देखा जाए तो राजनीतिक दलों के अधिकांश गठबंधन शराब भी होते हैं और उनमें सराब वाली फितरत भी होती है। जनता पार्टी से शुरू कीजिए। मोरारजी भाई की सरकार लोकतंत्र की सेहत के लिए किसी शराब की तरह घातक साबित हुई और देश की जनता के लिए कांग्रेस के विकल्प के नाम पर सराब की तरह छलावा मात्र बन गयी। कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के वर्चस्व वाले दौर में उत्तरप्रदेश में हाथी तथा सायकिल का साथ शराब के हैंगओवर की तरह वहां की जनता का सिर दर्द बन गया और आज एक बार फिर सराब की भांति मायावती और अखिलेश यादव की जुगलबंदी मतदाता को फिर भरमाने का जतन शुरू कर चुकी है। बिहार में नीतिश कुमार ने लालू प्रसाद यादव से गठबंधन तोड़कर इस शराब से पिंड छुड़ाया और फिर सारे दिखावों को दरकिनार कर एक बार पुन: एनडीए की गोद में जा बैठे।  शराब से लेकर सराब तक का परिदृश्य हर ओर आज भी कायम है। ममता बनर्जी जिस विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करना चाह रही हैं, वह तीखी धूप के बीच हो रहे लोकसभा चुनाव में किसी मृग मरीचिका जैसा ही गया दिखता है। क्योंकि यह अब तक स्पष्ट नहीं है कि कौन दल उनके साथ है और कौन नहीं। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी तो शराब और सराब के बीच ऐसा झूला झूल रही है कि उसके नेताओं का दिमाग ही चकरघिन्नी हो गया लगता है।


कांग्रेस की दशा तो राष्ट्रीय परिदृश्य पर शराब के नशे में टुन्न वाली दिखती है। मोदी के हराने के जुनून को नशे की हद तक अपने ऊपर हावी कर चुके राहुल गांधी कभी फ्रंट फुट पर खेलने की बात करते हैं तो कभी बैक फुट पर आते हुए सपा-बसपा के लिए उत्तरप्रदेश में सीट छोड़ देते हैं। सोनिया गांधी कभी ममता बनर्जी से गलबहियां करती हैं तो कभी राहुल भाजपा के साथ-साथ ममता की पार्टी को भी आरोपों के लपेटे में ले लेते हैं। नतीजा यह होता है कि कुछ समय  पहले तक राहुल के साथ मुस्कुराकर  फोटो खिंचवाती ममता उन्हें ह्यबच्चाह्ण कहकर संबोधित कर देती हैं। प्रियंका वाड्रा दावा तो कांग्रेस की सरकार बनने का करती हैं, लेकिन यह उस समय किसी सराब जैसा नजर आता है, जब वह लखनऊ पहुंचकर भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर रावण की मिजाजपुर्सी के नाम पर उनसे सियासी गठबंधन की असफल कोशिश कर गुजरती हैं।  यह शराब सा घातक असर और सराब जैसा छलावा नहीं तो और क्या है कि राष्ट्रवाद की बात करने वाली भाजपा कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की गोद में बैठ जाती है और भगवान राम का सरेआम अपमान करने वाले नरेश अग्रवाल को तपाक से गले लगा लेती है। न मदिरा अच्छी है और न ही मृग मरीचिका पर यकीन किया जाना चाहिए। लेकिन पूरा सियासी माहौल ह्यशह्ण और ह्यसह्ण के बीच इस बुरी तरह हिचकोले ले रहा है कि उसे नशे का असर कहें या नजरों का भ्रम, यह तय करना आज की तारीख में नामुमकिन जान पड़ता है। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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