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एक दशक बीता, अनेक दंश बीतने बाकी

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाचेलेट ने मार्च 2019 में मानवाधिकार परिषद से कहा कि श्रीलंका में सांप्रदायिक या अंतर जातीय हिंसा और अस्थिरता को बढ़ावा देने वाले खतरे बने हुये है।  आगे पढ़ें

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पांच साल बाद भी वही खामोश मोदी

वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार अजय उपाध्याय ने जुलाई 2014 में कहा था, ‘मीडिया से मोदी की दूरी को सही अर्थ में देखे जाने की जरूरत है। मोदी को काम तो करने दीजिए, उन्होंने अभी शुरूआत ही की है।’ हालांकि उपाध्याय गलत साबित हुए।  आगे पढ़ें

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गिरोहबंदी को खत्म किए बिना खतरे में ही रहेगी आंतरिक सुरक्षा

दरअसल, मोदी हजम नहीं हो पा रहा है इसलिए एक ऐसा प्रचार तंत्र और स्लीपर सेलनुमा नेटवर्क को बड़ी ताकत बनाने की कोशिश की जा रही हैं। इसमें हर महत्वपूर्ण हिस्से के कई लोग शामिल हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया और सबसे भयावह भूमिका सोशल मीडिया निभा रहा है। कठुआ में मुस्लिम बच्ची के साथ सामूहिक ज्यादती की हर खबर में यह अनिवार्य रूप से लिखा और बताया गया कि यह घटनाक्रम एक मंदिर के भीतर हुआ। सारा देश हिल उठा। भोपाल के बोर्ड आॅफिस चौराहे पर भी आरोपियों को फांसी देने की मांग को लेकर जुलूस निकाल दिया गया। इस घटना के शोर के बीच ही साहिबाबाद के मदरसे में एक हिंदू बच्ची गीता से सामूहिक ज्यादती हुई। भोपाल के बोर्ड आॅफिस चौराहे पर इसके खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुनाई दिया। एक शख्स ने फेसबुक पर तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए लिखा, गलती सरासर गीता की ही है। उसने धर्म गलत चुना और अपने साथ हुए दुष्कर्म के लिए भी गलत स्थान का चयन किया। वरना तो आज उसके लिए देश से विदेश तक इतने आंसू बह रहे होते कि प्रलय ही आ जाती। पोस्ट के समर्थन में कमेंट््स आना तो दूर, लाइक्स भी गिने-चुने ही मिल सके। अलबत्ता उस यूजर को गिरोह के एक सदस्य ने बदतमीज लेखक साबित कर दिया। read more  आगे पढ़ें

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‘श’ और ‘स‘ के फर्क में पिसता मुल्क

वैसे देखा जाए तो राजनीतिक दलों के अधिकांश गठबंधन शराब भी होते हैं और उनमें सराब वाली फितरत भी होती है। जनता पार्टी से शुरू कीजिए। मोरारजी भाई की सरकार लोकतंत्र की सेहत के लिए किसी शराब की तरह घातक साबित हुई और देश की जनता के लिए कांग्रेस के विकल्प के नाम पर सराब की तरह छलावा मात्र बन गयी। कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के वर्चस्व वाले दौर में उत्तरप्रदेश में हाथी तथा सायकिल का साथ शराब के हैंगओवर की तरह वहां की जनता का सिर दर्द बन गया और आज एक बार फिर सराब की भांति मायावती और अखिलेश यादव की जुगलबंदी मतदाता को फिर भरमाने का जतन शुरू कर चुकी है। बिहार में नीतिश कुमार ने लालू प्रसाद यादव से गठबंधन तोड़कर इस शराब से पिंड छुड़ाया और फिर सारे दिखावों को दरकिनार कर एक बार पुन: एनडीए की गोद में जा बैठे।  आगे पढ़ें

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क्या ये तर्क कयासों से परे नहीं हैं.....

रही बात असिहष्णुता और साम्प्रदायिकता की खाई की, जो एज़ पर विपक्षी दल, बढ़ी है, तो उनके लिए बस यह कहना है कि इन पांच सालों और उससे पहले के पांच सालों के आंकड़े उठा कर देख लें कि किस वक्फे में दंगे ज़्यादा हुए हैं। हां यह ज़रूर है कि बीते पांच सालों में हमने बायस्ड पत्रकारिता की नई मिसालें कायम होती देखी हैं। नेता, अभिनेता, पत्रकार, आम लोग, सबके चेहरों से नकाब उतर गए हैं। पहले हम जिन पर आंख मूंद कर विश्वास कर लेते थे उनसे अब सोशल मीडिया के ज़रिए सीधे सवाल कर रहे हैं तो हाल यह है कि अब तक जो शान्त और बौद्धिक नज़र आते थे, वो अब बदले बदले से सरकार नज़र आने लगे हैं। बाकी, अन्तिम फैसला तो हम पर ही हैं कि हम किसे अपनाएंगे और किसे ठुकरा देंगे। मई की गर्मी में सब क्लीयर हो जाएगा...पर मेरी दुआएं उनके साथ हैं, जिन्होंने इस देश में जबरदस्त बदलाव की नींव रखी है और नामुमकिन को मुमकिन करने का भरोसा दिया है.. read more  आगे पढ़ें

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कश्मीर: बीमार का इलाज, बीमारी का नहीं

झाबुआ से भाजपा विधायक जीएस डामोर के बयान का बुरा नहीं मानना चाहिए। उस पर चिल्लपों की जरूरत भी नहीं है। क्या हुआ जो उन्होंने कश्मीर के चार जिलों को अलग कर नया राज्य बनाने का फॉर्मूला सुझा दिया ! आप कहेंगे कि बात बे-सिर पैर की है। आप सही कह रहे हैं। आपका यह खयाल भी होगा कि ऐसा करने से भी आतंकवाद खत्म नहीं होगा। इस बात पर भी हमारी सहमति है। लेकिन कश्मीर और खासतौर से आतंकवाद से जुड़ी समस्या सुलझाने के नाम पर चहुंओर जो कुछ चल रहा है, उसे देख और सुनकर डामोर की बात बहुत अधिक नहीं खलती है। read more  आगे पढ़ें

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यह समय है जज्बात पर पूरी ताकत से नियंत्रण रखने का

आशय देश-विरोधी गतिविधियों पर चुप्पी साधने का नहीं है। उसकी निंदा कीजिए। उसके खिलाफ कानून की मदद लीजिए। किंतु कानून हाथ में लेने की गलती न करें। अभिव्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता को दुश्मन के मंसूबे पूरे करने का जरिया न बनाएं। वह गलती न दोहराएं, जिसके तहत उत्तरप्रदेश में कश्मीर के छात्रों को एक शहर से वापस अपने राज्य जाने की धमकी दी गयी है। पूर्वोत्तर की आरम्भ में बतायी गयी छात्रा क्षेत्रवाद के जहर का शिकार हुई। विधानसभा में एक बुजुर्ग किसी पुराने अपमान के बदले का औजार बन गया। इस जहर और बदले का प्रसार रोकना हमारे हाथ में है। देश के हित में है। भारतीयता के हित में है, जो आज भी इस देश में रह रहे हर बाशिंदे को सुरक्षा तथा गर्व का अहसास कराती है।read more  आगे पढ़ें

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प्रियंका गांधी: अब वक्त बतायेगा बंद मुट्ठी लाख की ख़ाक की..!

यूपी में आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का महागठबंधन बना है। इस महागठबंधन ने राज्य में कांग्रेस पार्टी के लिये सिर्फ दो सीटें छोड़ी थी, ऐसे में कांग्रेस पार्टी में यूपी को लेकर कोई बड़ा निर्णय होना तो स्वाभाविक ही था। यह निर्णय प्रियंका गांधी के राजनीतिक पदार्पण में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है। प्रियंका गांधी की मदद से कांग्रेस पार्टी के यूपी में परंपरागत वोट बैंक को सहेजने में भी मदद मिलेगी, जो निकट भविष्य में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिये तो पार्टी के लिये काफी मूल्यवान साबित होगा ही साथ ही 2022 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी यूपी की राजनीति में बड़ी ताकत के रूप में स्थापित हो जाएगी। प्रियंका गांधी अभी तक अमेठी और रायबरेली में ही लोकसभा चुनाव के मौके पर अपनी भूमिका निभाती रही हैं लेकिन अब उनकी भूमिका पूरे उत्तरप्रदेश में होगी।  आगे पढ़ें

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अच्छा होगा पहले राहुल कांग्रेस को बदल लें....

शायद कांग्रेस को एक बात समझ में आ रही है कि जहां उसकी भाजपा से सीधी लड़ाई है, वहां के मुस्लिम मतदाताओं के पास उसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है, लिहाजा मुस्लिमों की उपेक्षा करके भी यदि कांग्र्रेस अध्यक्ष मंदिरों की खाक छानते रहेंगे तो भी मुस्लिमों को जाना कहां है? इसमें हकीकत हो सकती है। लेकिन इसमें खतरा एक यह भी है कि किस्सा, न खुदा ही मिला न बिसाले सनम-न इधर के रहे, न उधर के रहे, जैसा हो सकता है। आखिर अब हिन्दू भला कांग्रेस पर क्यों भरोसा करने लगेगा। किसी मंदिर में मत्था टेकने से, किसी मठ के स्वामी के दर्शन करने से क्या हिन्दू उन तथ्यों की अनदेखी कर सकता है, जब कांग्रेस ने प्रो मुस्लिम राजनीति को चुन लिया था।read more  आगे पढ़ें

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FIFA WORLD CUP: जब पिछली बार मिस्र की टीम यहां थी तब सालाह पैदा भी नहीं हुए थे

फीफा विश्‍वकप 2018: आज फुटबॉलर मोहम्‍मद सालाह का 26वां जन्मदिन है. जब उसके देश की टीम पिछली बार वर्ल्डकप में खेली थी, तब वह पैदा भी नहीं हुए थे. मिस्र, यानी इजिप्ट 28 साल बाद वर्ल्डकप में खेल रहा है. रात साढ़े आठ बजे (भारतीय समयानुसार) जब मोहम्‍मद सालाह मैदान में उतरेंगे, तो एकाटेरिनबर्ग एरीना में मौजूद 45,000 दर्शकों के अलावा, दुनिया की आधी आबादी की निगाहें उसी पर टिकी होंगी.जब बॉल उसके बूट से टकराकर गोलपोस्ट के भीतर जाती है, तो लिवरपूल फुटबॉल क्लब स्टेडियम का नज़ारा कुछ ऐसा हो उठता है - पहले जश्न और शोर, फिर कुछ क्षण की खामोशी, फिर हाथ आसमान की तरफ उठता है खुदा को शुक्रिया कहने के लिए, और फिर जब वह धरती को चूमता है, तो उन लम्हों की पवित्रता के लिए ज़रूरी शांति का उसके प्रशंसक सम्मान करते हैं. यह फुटबॉल के नए सुपरस्टार मोहम्मद सालाह हैं, और वह अपने कारनामों से लिवरपूल क्लब के ही नहीं, दुनियाभर के लाड़ले बन गए. यह इस बात की तसदीक भी है कि आस्था आज भी पहचान और शोहरत के रास्ते में नहीं आती. आज के हालात में सालाह उस विश्वास, समाज और संस्कृति की नई पहचान बन रहे हैं, जिसे दुनिया संदेह और सवालों की नज़र से देख रही है. पश्चिमी समाज पर मंडरा रहे इस्लामोफोबिया के मिथक को किक मारते सालाह उस लीग में शामिल हो गए हैं, जहां मिस्र के इस खिलाड़ी की तुलना लियोनेल मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो से की जा रही है. सालाह लिवरपूल के लिए 43 मैचों में 49 गोल कर चुके हैं और साथी खिलाड़ियों और फुटबॉल लेखक संघ ने उन्हें अप्रैल में साल का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भी चुना है. मोहम्मद सालाह इंग्लैंड में भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने मिस्र में. सालाह पिछले अक्टूबर में मिस्र के नायक बने थे, जब आखिरी क्षणों में उनके पेनल्टी किक से मिस्र की टीम 1990 के बाद पहली बार वर्ल्डकप में जगह बनाने में कामयाब रही थी. राजधानी काहिरा की दीवारें उनके पोस्टरों से रंग गईं, और समूचे बाज़ार पर उनकी तस्वीर छा गई. चादर से लालटेन तक सालाह ही सालाह. समूचा मिस्र आज लिवरपूल का फैन बन गया है. मोहम्मद सालाह की लोकप्रियता की बड़ी वजह है उनका अपनी पहचान पर फख्र होना.मोहम्मद सालाह पिछले महीने यूएफा चैम्पियन्स लीग के फाइनल में लिवरपूल की ओर से खेलते हुए कंधे में चोट खा बैठे थे, लेकिन मिस्र के कोच हेक्टर कूपर ने साफ कर दिया है कि सालाह चोट से उबर गए हैं, और उरुग्वे के खिलाफ खेलने को तैयार हैं. सो, अब देखना यह है कि क्या मिस्र दो बार के चैम्पियन उरुग्वे को मात दे पाएगा...?  आगे पढ़ें

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