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क्या ये तर्क कयासों से परे नहीं हैं.....

रही बात असिहष्णुता और साम्प्रदायिकता की खाई की, जो एज़ पर विपक्षी दल, बढ़ी है, तो उनके लिए बस यह कहना है कि इन पांच सालों और उससे पहले के पांच सालों के आंकड़े उठा कर देख लें कि किस वक्फे में दंगे ज़्यादा हुए हैं। हां यह ज़रूर है कि बीते पांच सालों में हमने बायस्ड पत्रकारिता की नई मिसालें कायम होती देखी हैं। नेता, अभिनेता, पत्रकार, आम लोग, सबके चेहरों से नकाब उतर गए हैं। पहले हम जिन पर आंख मूंद कर विश्वास कर लेते थे उनसे अब सोशल मीडिया के ज़रिए सीधे सवाल कर रहे हैं तो हाल यह है कि अब तक जो शान्त और बौद्धिक नज़र आते थे, वो अब बदले बदले से सरकार नज़र आने लगे हैं। बाकी, अन्तिम फैसला तो हम पर ही हैं कि हम किसे अपनाएंगे और किसे ठुकरा देंगे। मई की गर्मी में सब क्लीयर हो जाएगा...पर मेरी दुआएं उनके साथ हैं, जिन्होंने इस देश में जबरदस्त बदलाव की नींव रखी है और नामुमकिन को मुमकिन करने का भरोसा दिया है.. read more  आगे पढ़ें

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कश्मीर: बीमार का इलाज, बीमारी का नहीं

झाबुआ से भाजपा विधायक जीएस डामोर के बयान का बुरा नहीं मानना चाहिए। उस पर चिल्लपों की जरूरत भी नहीं है। क्या हुआ जो उन्होंने कश्मीर के चार जिलों को अलग कर नया राज्य बनाने का फॉर्मूला सुझा दिया ! आप कहेंगे कि बात बे-सिर पैर की है। आप सही कह रहे हैं। आपका यह खयाल भी होगा कि ऐसा करने से भी आतंकवाद खत्म नहीं होगा। इस बात पर भी हमारी सहमति है। लेकिन कश्मीर और खासतौर से आतंकवाद से जुड़ी समस्या सुलझाने के नाम पर चहुंओर जो कुछ चल रहा है, उसे देख और सुनकर डामोर की बात बहुत अधिक नहीं खलती है। read more  आगे पढ़ें

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यह समय है जज्बात पर पूरी ताकत से नियंत्रण रखने का

आशय देश-विरोधी गतिविधियों पर चुप्पी साधने का नहीं है। उसकी निंदा कीजिए। उसके खिलाफ कानून की मदद लीजिए। किंतु कानून हाथ में लेने की गलती न करें। अभिव्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता को दुश्मन के मंसूबे पूरे करने का जरिया न बनाएं। वह गलती न दोहराएं, जिसके तहत उत्तरप्रदेश में कश्मीर के छात्रों को एक शहर से वापस अपने राज्य जाने की धमकी दी गयी है। पूर्वोत्तर की आरम्भ में बतायी गयी छात्रा क्षेत्रवाद के जहर का शिकार हुई। विधानसभा में एक बुजुर्ग किसी पुराने अपमान के बदले का औजार बन गया। इस जहर और बदले का प्रसार रोकना हमारे हाथ में है। देश के हित में है। भारतीयता के हित में है, जो आज भी इस देश में रह रहे हर बाशिंदे को सुरक्षा तथा गर्व का अहसास कराती है।read more  आगे पढ़ें

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प्रियंका गांधी: अब वक्त बतायेगा बंद मुट्ठी लाख की ख़ाक की..!

यूपी में आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का महागठबंधन बना है। इस महागठबंधन ने राज्य में कांग्रेस पार्टी के लिये सिर्फ दो सीटें छोड़ी थी, ऐसे में कांग्रेस पार्टी में यूपी को लेकर कोई बड़ा निर्णय होना तो स्वाभाविक ही था। यह निर्णय प्रियंका गांधी के राजनीतिक पदार्पण में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है। प्रियंका गांधी की मदद से कांग्रेस पार्टी के यूपी में परंपरागत वोट बैंक को सहेजने में भी मदद मिलेगी, जो निकट भविष्य में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिये तो पार्टी के लिये काफी मूल्यवान साबित होगा ही साथ ही 2022 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी यूपी की राजनीति में बड़ी ताकत के रूप में स्थापित हो जाएगी। प्रियंका गांधी अभी तक अमेठी और रायबरेली में ही लोकसभा चुनाव के मौके पर अपनी भूमिका निभाती रही हैं लेकिन अब उनकी भूमिका पूरे उत्तरप्रदेश में होगी।  आगे पढ़ें

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अच्छा होगा पहले राहुल कांग्रेस को बदल लें....

शायद कांग्रेस को एक बात समझ में आ रही है कि जहां उसकी भाजपा से सीधी लड़ाई है, वहां के मुस्लिम मतदाताओं के पास उसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है, लिहाजा मुस्लिमों की उपेक्षा करके भी यदि कांग्र्रेस अध्यक्ष मंदिरों की खाक छानते रहेंगे तो भी मुस्लिमों को जाना कहां है? इसमें हकीकत हो सकती है। लेकिन इसमें खतरा एक यह भी है कि किस्सा, न खुदा ही मिला न बिसाले सनम-न इधर के रहे, न उधर के रहे, जैसा हो सकता है। आखिर अब हिन्दू भला कांग्रेस पर क्यों भरोसा करने लगेगा। किसी मंदिर में मत्था टेकने से, किसी मठ के स्वामी के दर्शन करने से क्या हिन्दू उन तथ्यों की अनदेखी कर सकता है, जब कांग्रेस ने प्रो मुस्लिम राजनीति को चुन लिया था।read more  आगे पढ़ें

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FIFA WORLD CUP: जब पिछली बार मिस्र की टीम यहां थी तब सालाह पैदा भी नहीं हुए थे

फीफा विश्‍वकप 2018: आज फुटबॉलर मोहम्‍मद सालाह का 26वां जन्मदिन है. जब उसके देश की टीम पिछली बार वर्ल्डकप में खेली थी, तब वह पैदा भी नहीं हुए थे. मिस्र, यानी इजिप्ट 28 साल बाद वर्ल्डकप में खेल रहा है. रात साढ़े आठ बजे (भारतीय समयानुसार) जब मोहम्‍मद सालाह मैदान में उतरेंगे, तो एकाटेरिनबर्ग एरीना में मौजूद 45,000 दर्शकों के अलावा, दुनिया की आधी आबादी की निगाहें उसी पर टिकी होंगी.जब बॉल उसके बूट से टकराकर गोलपोस्ट के भीतर जाती है, तो लिवरपूल फुटबॉल क्लब स्टेडियम का नज़ारा कुछ ऐसा हो उठता है - पहले जश्न और शोर, फिर कुछ क्षण की खामोशी, फिर हाथ आसमान की तरफ उठता है खुदा को शुक्रिया कहने के लिए, और फिर जब वह धरती को चूमता है, तो उन लम्हों की पवित्रता के लिए ज़रूरी शांति का उसके प्रशंसक सम्मान करते हैं. यह फुटबॉल के नए सुपरस्टार मोहम्मद सालाह हैं, और वह अपने कारनामों से लिवरपूल क्लब के ही नहीं, दुनियाभर के लाड़ले बन गए. यह इस बात की तसदीक भी है कि आस्था आज भी पहचान और शोहरत के रास्ते में नहीं आती. आज के हालात में सालाह उस विश्वास, समाज और संस्कृति की नई पहचान बन रहे हैं, जिसे दुनिया संदेह और सवालों की नज़र से देख रही है. पश्चिमी समाज पर मंडरा रहे इस्लामोफोबिया के मिथक को किक मारते सालाह उस लीग में शामिल हो गए हैं, जहां मिस्र के इस खिलाड़ी की तुलना लियोनेल मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो से की जा रही है. सालाह लिवरपूल के लिए 43 मैचों में 49 गोल कर चुके हैं और साथी खिलाड़ियों और फुटबॉल लेखक संघ ने उन्हें अप्रैल में साल का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भी चुना है. मोहम्मद सालाह इंग्लैंड में भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने मिस्र में. सालाह पिछले अक्टूबर में मिस्र के नायक बने थे, जब आखिरी क्षणों में उनके पेनल्टी किक से मिस्र की टीम 1990 के बाद पहली बार वर्ल्डकप में जगह बनाने में कामयाब रही थी. राजधानी काहिरा की दीवारें उनके पोस्टरों से रंग गईं, और समूचे बाज़ार पर उनकी तस्वीर छा गई. चादर से लालटेन तक सालाह ही सालाह. समूचा मिस्र आज लिवरपूल का फैन बन गया है. मोहम्मद सालाह की लोकप्रियता की बड़ी वजह है उनका अपनी पहचान पर फख्र होना.मोहम्मद सालाह पिछले महीने यूएफा चैम्पियन्स लीग के फाइनल में लिवरपूल की ओर से खेलते हुए कंधे में चोट खा बैठे थे, लेकिन मिस्र के कोच हेक्टर कूपर ने साफ कर दिया है कि सालाह चोट से उबर गए हैं, और उरुग्वे के खिलाफ खेलने को तैयार हैं. सो, अब देखना यह है कि क्या मिस्र दो बार के चैम्पियन उरुग्वे को मात दे पाएगा...?  आगे पढ़ें

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एक‌ ई-मेल और कई‌ सवाल

भीमा कोरेगांव हिंसा के नाम पर दिल्ली, नागपुर और मुंबई से 5 लोगों की गिरफ़्तारी के बाद जिस प्रतिरोध की उम्मीद थी, वह अचानक जैसे मंद पड़ गया है. दरअसल, पुलिस ने इस दौरान एक चिट्ठी निकाल ली जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या का इरादा जताया गया था. किसी कॉमरेड प्रकाश को किसी आर- जिसे रोनी विल्सन कहा जा रहा है- की ओर से भेजे गए इस ईमेल में कहा गया है कि मोदी ने पंद्रह राज्यों में बीजेपी की सरकार बनवा दी है. अगर यही चलता रहा तो हम बर्बाद हो जाएंगे. इसलिए जिस तरह राजीव गांधी की हत्या हुई थी, उस तरह नरेंद्र मोदी को भी मार दिया जाए. कहना मुश्किल है, यह किसी एक आदमी की अपनी ख़ामख़याली या कट्टरता थी या इसे समूह का वैचारिक समर्थन भी हासिल था- क्योंकि अभी तक इस चिट्ठी के अलावा पुलिस ने ऐसा कोई सबूत नहीं पेश किया है जिससे पता चले कि इस इरादे को बाक़ायदा साज़िश की शक्ल दी जा रही थी. लेकिन यह चिट्ठी आते ही इन गिरफ़्तारियों पर उठ रहे सवालों पर जैसे ताला लग गया. इसकी दो वजहें साफ़ हैं- एक तो संभवतः यह डर कि इस चिट्ठी के आधार पर सरकार बहुत सख्त कार्रवाई कर सकती है और इसकी गाज़ उन लोगों पर भी गिर सकती है जो इन लोगों के समर्थक या हमदर्द नज़र आएं. लेकिन दूसरी और ज्यादा बड़ी वजह यह है कि आधुनिक लोकतांत्रिक भारत का जो संस्कार बना है, उसमें कई तरह की बेईमानियों की जगह है, हिंसक प्रदर्शनों की भी, लेकिन राजनीतिक हत्या का खयाल अब भी हमें डरावना लगता है. किसी लोकतंत्र के भीतर किसी आवाज़ को दबाने के लिए उसकी हत्या की जाए- यह हमें मंज़ूर नहीं है. शायद इस विचार की यह अस्वीकार्यता भी है जिसकी वजह से ये गिरफ़्तार लोग अलग-थलग पड़ गए हैं. लेकिन इस सिलसिले में दो बातें और करनी ज़रूरी हैं. क्या किसी व्यक्ति को मार कर उसकी विचारधारा को ख़त्म किया जा सकता है? जिस साल आतंकवादियों ने इंदिरा गांधी की हत्या की, उस साल कांग्रेस-समर्थक लोगों के बहुत नृशंस व्यवहार और क़रीब 3000 लोगों की हत्या के बावजूद देश भर से कांग्रेस को व्यापक समर्थन मिला- इतना बड़ा समर्थन आज तक किसी और को नहीं मिला. अगर आप नरेंद्र मोदी को परास्त करना चाहते हैं तो उन्हें अंततः इसी लोकतांत्रिक दायरे में परास्त करने का रास्ता खोजना होगा. नहीं तो नरेंद्र मोदी को मार कर आप ऐसी अमरता प्रदान कर देंगे जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती. जाहिर है, नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ भी राजनीतिक लड़ाई लड़नी होगी. माओवादी छापामार युद्ध एक दौर में चाहे जितने आकर्षक लगते रहे हों, राष्ट्र राज्यों की बढ़ती ताकत धीरे-धीरे उनको बेमानी बना रही है- बल्कि माओवादी हिंसा एक तरह से राज्य की हिंसा को वैधता देती है, बल्कि उसकी कहीं ज़्यादा बड़ी हिंसा से लोगों को आंख मूंदने की छूट भी देती है. लेकिन अब ख़तरा दूसरा है. एक चिट्ठी को आधार बनाकर पुलिस प्रतिरोध की हर आवाज़ को दबाने का रास्ता न खोजने लगे. क्योंकि इस चिट्ठी से पहली दुर्घटना यह हुई है कि भीमा कोरेगांव हिंसा के वास्तविक गुनहगारों का सवाल पीछे छूट गया है. पुलिस फिलहाल जिन लोगों को गिरफ़्तार कर रही है, वे वहां हो रहे कार्यक्रम से जुड़े लोग थे. वहां गड़बड़ी उन लोगों ने की जो नहीं चाहते थे कि ऐसा कोई कार्यक्रम कामयाब हो. लेकिन वे सब लोग आज़ाद घूम रहे हैं और भीमा कोरेगांव से जुड़े जो लोग पकड़े जा रहे हैं, उन्हें माओवादी बताया जा रहा है. यह हाल के ताज़ा चलन की भी सूचना है. जो सरकार विरोधी हो, उसे माओवादी बता दो. इस आधार पर आप कहीं दलितों को घेरते हैं, कहीं गांधीवादियों को, कहीं बाज़ार-विरोधियों को, कहीं उन सामाजिक कार्यकर्ताओं को जो मानवाधिकार में अपनी सहज आस्था से यह महसूस करते हैं कि नक्सल कहे जाने वाले इलाक़ों में माओवाद को रोकने के नाम पर जो नाजायज़ हिंसा हो रही है, उसका विरोध ज़रूरी है. लेकिन यह ताजा चलन किसी शून्य से नहीं, एक डर से पैदा हुआ है. यह बहुत स्पष्ट है कि कभी कांग्रेस से मायूस और अब बीजेपी से नाराज़ रही शक्तियां तरह-तरह से एकजूट होने की कोशिश कर रही हैं. नीले और लाल को मिलाने की कोशिश, जय भीम को जयश्रीराम के मुक़ाबले खड़ा करके उसे लाल सलाम से जोड़ने की कोशिश, खेती-किसानी, बेदख़ली और ज़मीन की मिल्कियत और खदानों-पर्यावरण की फिक्र के अलग-अलग बिंदु मिलकर वह वैचारिक रेखा बना रहे हैं जो बीजेपी के लिए लक्ष्मण रेखा साबित हो सकती है. अंबेडकरवादी, मार्क्सवादी, तरह-तरह के समाजवादी अब कहीं ज़्यादा मज़बूती से गोलबंद हो रहे हैं. अभी यह गोलबंदी छोटी है क्योंकि अभी इसके मुकाबले राष्ट्रवाद का खुमार और विकास का भरोसा कहीं ज़्यादा बड़ा है. लेकिन एक बार वह भरोसा कमज़ोर पड़ा और ख़ुमार उतरा तो संभव है, बहुत सारे लोग विकल्प के लिए इस तरफ भी आएंगे. यह विकल्प तैयार करने की जगह नरेंद्र मोदी को मार कर बीजेपी के वर्चस्व का ख़ात्मा करने की भोली ख़ामखयाली दरअसल विकल्प की इस संभावना को नुक़सान ही पहुंचाएगी. इसलिए अगर वाकई ऐसी कोई चिट्ठी लिखी गई है तो उसकी तीखी आलोचना ज़रूरी है- सिर्फ रणनीतिक सयानेपन के लिहाज से नहीं, इस नैतिक और मानवीय समझ के हिसाब से भी कि अंततः सच्चा लोकतंत्र ऐसी हिंसा के निषेध से ही बनेगा. लेकिन इसी लोकतंत्र का तकाज़ा है कि हम उन लोगों के हक़ का सवाल भी उठाएं जिन्हें पुलिस किन्हीं और मक़सदों से, किन्हीं और इशारों पर, घेरने-फंसाने का उपक्रम कर सकती है. यह बहुत मुश्किल समय है, संभव है और भी मुश्किल समय आए, लेकिन इम्तिहान की घड़ियां यही होती हैं.  आगे पढ़ें

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किम जोंग उन की ताकत और डोनाल्ड ट्रंप की सियासत

नई दिल्ली: क्या किम जोंग उन ने ऐटमी परीक्षण न किए होते, तो डोनाल्ड ट्रंप उन्हें इतनी इज़्ज़त बख़्शते कि उनसे सिंगापुर जाकर मुलाकात करते...? अपने विरोधियों से अमेरिका इतने नेक व्यवहार के लिए नहीं जाना जाता. लीबिया के कर्नल गद्दाफ़ी ने अमेरिका पर भरोसा कर ऐटमी परीक्षण पर काम बंद कर दिया था. इसके बाद कर्नल गद्दाफ़ी का क्या हाल हुआ, यह सब जानते हैं. इराक ने भी ऐटमी कार्यक्रम शुरू नहीं किए थे, लेकिन डब्ल्यूएमडी - यानी सामूहिक विनाश के हथियारों - की तलाश के नाम पर अमेरिका ने इराक पर हमला कर उसे इस तरह तहस-नहस कर डाला कि वह अब तक इस हमले से उबर नहीं पाया है. दूसरी तरफ़ ईरान ने अमेरिका की परवाह किए बिना ऐटमी प्रयोग और परीक्षण जारी रखे. इस्राइल के जासूसों ने बहुत कोशिश की कि ईरान यह काम न कर सके. उसके वैज्ञानिकों की हत्या की, नकली कंपनी बनाकर उसको घटिया सामान बेच दिया, लेकिन ईरान फिर भी छिपकर परीक्षण की तैयारी करता रहा. परीक्षण हुए और अमेरिका का रुख बदल गया. जबकि यह वह ईरान है, जिसने ओसामा बिन लादेन के परिवार को सबसे लंबी शरण दी. कैथी स्कॉट क्लार्क और ऐड्रियन लेवी की किताब 'एक्साइल' में इसका बहुत विस्तार से ब्योरा है. लेकिन अमेरिका ने इन सबको भुलाकर ईरान से ऐटमी क़रार का रास्ता अख़्तियार किया. बेशक, अभी वह इस क़रार से पीछे हट गया है, लेकिन ईरान के ख़िलाफ़ किसी शत्रुतापूर्ण कार्रवाई की उसकी हिम्मत नहीं है. किम भी अमेरिका से डरकर अगर ऐटमी कार्यक्रम से पीछे हट जाते तो क्या होता...? अमेरिका एक 'रोग नेशन' को ख़त्म करने के जज़्बे के साथ उत्तर कोरिया पर टूट पड़ता और लोकतंत्र के नाम पर अमेरिकी सैन्य आधिपत्य का एक नंगा नाच चल रहा होता. तो जिस समय भारतीय मीडिया ऐटमी परीक्षण की कोशिश में लगे किम जोंग उन का मज़ाक बना रहा था और उन्हें कभी 'तानाशाह' और कभी 'जोकर' बता रहा था, तब वह चुपचाप दरअसल अपना वजूद बचाने का इंतज़ाम कर रहे थे. जब उन्होंने यह इंतज़ाम कर लिया और बताया कि उनकी बैलेस्टिक मिसाइलें कुछ अमेरिकी शहरों तक मार कर सकती हैं, तो अमेरिका को समझ में आया कि किम का कॉलर पकड़ने से अच्छा उनका हाथ थामना होगा. इसलिए अब डोनाल्ड ट्रंप किम के सारे पाप भुलाकर उन्हें एक महान देशभक्त बता रहे हैं, उनके साथ अपनी मुलाकात को ऐतिहासिक और रचनात्मक बता रहे हैं, ऐटमी निरस्त्रीकरण का वादा कर रहे हैं और अपनी जनता की सुरक्षा और समृद्धि को लेकर किम को मिले अवसर का बखान कर रहे हैं. धीरे-धीरे लोग भूलते चले जाएंगे कि किम ने किस तरह अपने रिश्तेदारों की नृशंसता से हत्या करवाई है, अपने विरोधियों का कैसे सफ़ाया करवाया है, वह अपनी तानाशाही में कैसी क्रूरताएं करते रहे हैं. निस्संदेह इस समझौते के अपने राजनीतिक फलितार्थ हैं. उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच लगातार भड़क उठने वाली जंग शायद इससे कुछ कमज़ोर पड़े. ऐटमी हथियारों की होड़ भी कुछ मंद हो. लेकिन यह पूरी प्रक्रिया एक उदास करने वाले सवाल की ओर इशारा करती है - क्या दुनिया में सिर्फ़ ताक़त का तर्क चलता है...? अगर आप ताकतवर हैं, तो क्या आपके सारे पाप धुल जाते हैं...? अगर आपके पास ऐटम बम है और आप अमेरिका को नुकसान पहुंचा सकते हैं तो अमेरिका आपसे बात करने को तैयार है. लेकिन अगर आप नैतिकता की बात करते हैं, तो आपकी अनदेखी संभव है. परमाणु निरस्त्रीकरण का यह पूरा मुद्दा दरअसल ताकत और नैतिकता के इसी द्वैत का प्रमाण है. दुनिया के सारे संप्रभु देशों में सिर्फ कुछ गिने-चुने परमाणुसंपन्न देशों को ही यह अधिकार क्यों हो कि वे ऐटमी हथियार रखें, बाकी क्यों न रखें - इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है. बरसों तक भारत ने दृढ़तापूर्वक ख़ुद को सीटीबीटी - यानी समग्र परीक्षण प्रतिबंध समझौते - से अलग रखा. भारत का तर्क यही था कि दुनिया के कुछ देशों को ऐटमी विशेषाधिकार नहीं दिए जा सकते - और उनकी कीमत पर बाकी देशों को अपने नाभिकीय बंध्याकरण के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. इसी तर्क को एक नैतिक विस्तार देते हुए भारत ने स्पष्ट किया था कि वह परमाणु परीक्षणों के पक्ष में नहीं है, लेकिन यह अधिकार उसके पास है कि वह जब चाहे, ऐटमी परीक्षण कर ले. 1998 के ऐटमी परीक्षणों के साथ भारत की यह समझ पीछे छूट गई. अब वह परमाणु सौदेबाज़ देशों में शामिल हो गया और उनके क्लब में शामिल होने के लिए जोड़तोड़ करने लगा. ठीक अगले दिन पाकिस्तान ने भी ऐटमी परीक्षण कर भारत की बराबरी कर ली. तब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के इस पराक्रम से अभिभूत देश ने यह नहीं देखा कि दरअसल यह ऐटमी परीक्षण भारत को मज़बूत नहीं, कमज़ोर करता है. इसकी कई वजहें थीं. जो पाकिस्तान पारम्परिक हथियारों में हमसे कोसों पीछे था, वह ऐटमी हथियारों में हमारी बराबरी पर आ गया. ऐटमी हथियार लंबी दूरी के और बड़ी लड़ाइयों के उपकरण तो हो सकते हैं, लेकिन लोअर ट्रेजेक्ट्री के युद्धों में उनका कोई काम नहीं हो सकता. पोखरन के फौरन बाद हुआ करगिल इसकी मिसाल साबित हुआ. करगिल में भारत ने बड़ी तादाद में अपने अफ़सर खोए, जिस ज़मीन को 48 घंटे में ख़ाली कराने की बात थी, उसे छुड़ाने में 48 दिन लग गए, और ऐटमी हथियार ज़खीरों में पड़े रहे. दरअसल ऐटमी हथियार ज़ख़ीरों में पड़े रहने के लिए होते हैं. वे तबाही का वह सामान हैं, जिन्हें कोई भी देश बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर सकता. 1945 के बाद ऐटमी हथियार बस एक-दूसरे को दिखाने के काम ही आए हैं. अमेरिका वियतनाम का युद्ध हार गया, लेकिन ऐटमी हथियार इस्तेमाल नहीं कर सका. सोवियत संघ टूट-फूट गया, उसका ऐटमी ज़ख़ीरा पड़ा रहा. दूसरी तरफ़ जापान और जर्मनी जैसे देश बिना ऐटमी हथियारों के दुनिया पर अपना दबदबा बनाए रखने में कामयाब रहे. चीन का दबदबा भी उसकी आर्थिक हैसियत भी वजह से है, उसके ऐटमी हथियारों की वजह से नहीं. तो दरअसल ऐटमी हथियार कूटनीति और ताकत के खेल में ब्लैकमेलिंग का सामान रह गए हैं. किम इस ब्लैकमेलिंग में कामयाब रहे. अब शांति की राह इसी से निकलनी हो, तो निकले. लेकिन इतिहास का अनुभव बताता है कि ऐसी शांति अमूमन छलावा होती है. एशिया के कई हिस्सों में अमेरिका के शांति-प्रयासों ने दरअसल कितना ख़ून-ख़राबा कराया है, यह भूलने की बात नहीं है.  आगे पढ़ें

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विश्व बालश्रम निषेद दिवस : नोबेल पुरस्कार मिलने से बच्चों का क्या बदला...?

नई दिल्ली: होना तो चाहिए था कि बच्चों के अधिकारों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार मिलने के बाद देश में बच्चों के चेहरों पर मुस्कान खिलती, लेकिन क्या ऐसा हो पाया...? माना कि यह पुरस्कार बाल अधि‍कारों पर अद्भुत काम करने के लि‍ए कैलाश सत्‍यार्थी को मिला, पर स्वागत तो पूरे देश ने किया, हर व्यक्ति ने गौरव महसूस किया. पर क्या पुरस्कार मिलने के बाद यह जिम्मेदारी ओढ़ी कि यह भारीभरकम पुरस्‍कार मि‍लने के बाद अब बच्चों के प्रति हमारी जिम्मेदारी दुनिया के किसी भी दूसरे देश से ज्यादा है. इसलिए ही कम से कम हम अपने बच्चों को उनके वे अधिकार ज़रूर ही सौंपेंगे, जिनका वादा हम सालों से करते आए हैं, पर अधि‍कार दरअसल वादे ही बने हुए हैं, हकीकत नहीं हुए हैं. इसलिए जब-जब बच्चों के अधिकारों को याद करने के दिन आते हैं तो हमें शर्म से अपना सिर नीचा करना पड़ता है, क्योंकि हकीकत हमें फख्र नहीं, शर्म करने पर मजबूर करती है. अंतरराष्ट्रीय बाल श्रमिक दिवस भी ऐसा ही मौका है. भले ही हमें नोबेल पुरस्कार मिल गया हो, लेकिन शर्मनाक है कि देश में बाल मजदूरों की हालत अब भी चिंतनीय बनी हुई है. सरकारी आंखों को बाल मजदूर दिखाई ही नहीं देते हैं, इसलिए वह इस पर लगातार गलत जवाब देते हैं. इसलिए कोई कार्रवाई भी नहीं होती, सब हरा-हरा दिखाई देता है. देश में तकरीबन 1 करोड़ 1 लाख बाल मजदूर हैं. अलबत्ता सरकार इन्हें नहीं मानती. जब बाल मजदूरों की बात आती है तो वह कहती है कि हमारे देश में 43 लाख कामगार ही हैं. वह यह भी दावा करती है कि पिछली जनगणना में यह संख्या 57 लाख थी, जिसे घटाकर 43 लाख तक लाया गया है. सोचने की बात यह है कि यह जो 43 लाख बच्चे हैं, वे 5 से 14 साल तक की उम्र के हैं. 14 साल से 18 साल तक के बच्चों को क्या बाल मजदूर नहीं माना जाना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बच्चों की उम्र की परिभाषा में 18 साल तक की उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना गया है. देश के कई और दूसरे कानूनों में भी बच्चा मतलब 18 से कम उम्र का व्यक्ति. फिर आखिर क्यों जब संसद में बाल मजदूरों के आंकड़े मांगे जाते हैं तो जवाब में 14 से 18 साल तक की उम्र को छिपाकर आंकड़ा पेश कर दिया जाता है, उन्‍हें कि‍शोरावस्‍था में डाल दि‍या जाता है, और उनकी नि‍गरानी भी केवल इस बात के लि‍ए की जाती है कि‍ कहीं वह खतरनाक और जानलेवा कामों में तो नहीं लगे हैं. क्या सरकारों को बाल मजदूरों के सही आंकड़े बताने में शर्म आती है या डर लगता है...? बाल एवं किशोर श्रम प्रतिषेध एवं विनियमन अधिनियम 1986 चौदह साल से कम उम्र के बच्चों के नियोजन एवं कार्य पर प्रतिबंध लगाता है. बाल अपराध को संज्ञेय अपराधों की श्रेणी में डालते हुए इस अधिनियम की धाराओं का पालन करने के लिए उत्तरदायित्व केंद्र एवं राज्य सरकारों पर डाला गया है. इसलिए बाल मजदूरी ऐसा मुद्दा है, जिस पर राज्य और केंद्र सरकारों को मिलकर काम करना है, लेकिन इस पर कार्रवाई के नाम पर जो कुछ पिछले तीन सालों में हुआ है, उससे यह समस्या हल होने वाली नहीं है. वर्ष 2014 से 2016 के बीच देश में 7,08,344 निरीक्षण किए गए. इसमें से केवल 6,920 मामलों में नियोजन शुरू हुआ और केवल 2,200 मामलों में ही दोष सिद्धियां हुईं. इसका क्या मतलब है. यदि जनगणना कहती है कि देश में 5 से 18 साल तक की उम्र वाले तकरीबन 1 करोड़ बच्चे कामगार हैं, और यदि कानून के मुताबिक देश से बाल मजदूरी को खत्म करना है तो क्या सवाल सौ करोड़ की जनसंख्या वाले देश में 2,200 मामलों में कार्रवाई करके इस समस्या को दूर किया जा सकेगा. इस निरीक्षण की संख्या में भी यदि तमिलनाडु राज्य के चार लाख 39 हजार निरीक्षणों की संख्या को घटा दिया जाए तो पता चलेगा कि देश के बाकी राज्य गहरी नींद में सोए हुए हैं. दोष सिद्धि के मामलों में भी केवल पांच राज्य ऐसे हैं, जहां यह आंकड़ा सौ से ज्यादा का है. पंजाब और हरियाणा के 1,400 मामलों को यहां से भी हटा दिया जाए, तो पता चलता है कि बाल मजदूरों को दूर करने के लिए राज्य प्रतिबद्ध नहीं हैं, होता तो वह आंकड़ों में भी तो दिखाई देता. अलबत्ता सरकार पिछले 40 सालों से देश में राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना संचालित कर रही है. इस परियोजना में देश में बाल मजदूरों को शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, मध्याह्न भोजन, छात्रवृत्ति एवं स्वास्थ्य देखरेख की सुविधा उपलब्ध कराती है. इसके लिए देश में विशेष प्रशिक्षण केंद्रों में नामांकन किया जाता है. वर्ष 2014 में 33,984, वर्ष 2015 में 24,927 और वर्ष 16-17 में 43,109 नामांकन किए गए हैं. वर्तमान में इस परियोजना के अंतर्गत विशेष प्रशिक्षण केंद्रों में 1 लाख 11 हजार बाल मजदूरों का नामांकन किया गया है, लेकिन इस योजना में बाल श्रम उन्‍मूलन के लि‍ए प्रचार-प्रसार पर केंद्र सरकार जितना पैसा लगाती है, उस पर गौर किया जाना चाहिए. इस साल सरकार ने इस परियोजना को केवल तकरीबन 9 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया. इससे पहले साल में यह 12 करोड़ रुपये था. सरकारें अपनी फ्लैगशिप योजनाओं के लि‍ए वि‍ज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च करती हैं, लेकि‍न बाल श्रम के प्रति‍ जागरूकता के लि‍ए बजट आवंटन ही नहीं है. बाल मजदूरों का पुनर्वास बेहद कठिन है, वह ऐसी विषम परिस्थितियों से निकलते हैं, जहां उन्हें चुनौतियों से लड़ने के लिए और बेहतर तैयारी की ज़रूरत है. पर सरकारें ऐसा नहीं सोचा करतीं, पुरस्कार मिलने के बाद भी नहीं सोचा करतीं...! बच्चों का विषय नोबेल मिलने के बाद भी हाशिये का विषय क्यों है...?  आगे पढ़ें

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रजनीकांत की छतरी और फिल्‍म 'काला'...

जिस दौर में किसी रोहित वेमुला को हैदराबाद विश्वविद्यालय में आत्महत्या करनी पड़े, जिस दौर में उत्साही गोरक्षकों का हुजूम कहीं अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता हो और कभी दलितों की पीठ उधेड़ता हो, जिस दौर में दलित प्रतिरोध तरह-तरह की शक्लें अख़्तियार कर रहा हो, उस दौर में कोई कारोबारी फिल्म ऐसी भी बन सकती है जैसी 'काला' है. नहीं, काला कोई महान फिल्म नहीं है. यह पूरी तरह रजनीकांत कल्ट की तमिल फिल्म है- इन दिनों टीवी चैनलों पर तमिल मुख्यधारा की जो फिल्में हिंदी में डब करके दिखाई जाती हैं, उनकी याद दिलाने वाली फ़िल्म. अगर कला के पैमानों पर देखें तो मुख्यधारा की ज़्यादातर फिल्मों की तरह यह फिल्म भी आपको निराश कर सकती है. एक महानायक के आसपास बुनी गई अतिनाटकीय घटनाओं से भरी ऐसी फिल्म- जिसके किरदार और उनके रिश्ते भी बहुत दूर तक फिल्मी भावुकता से संचालित हैं. कहानी बस इतनी है कि रजनीकांत धारावी का दादा है जिसके चाहे बिना वहां पत्ता तक नहीं हिलता. कुछ नेता और बिल्डर इस धारावी पर कब्ज़ा करना चाहते हैं- इरादा झोपड़पट्टी गिरा कर बड़ी इमारतें बनाने का है. रजनीकांत इसे रोकने में जुटा है, क्योंकि उसे एहसास है कि नेता-बिल्डर के इस गठजोड़ की क़ीमत धारावी में दशकों से बसे, और इसे बसाने-बनाने वाले लाखों लोगों को चुकानी पड़ेगी. कह सकते हैं, नेता-बिल्डर गठजोड़ के ख़िलाफ़ खड़े किसी नायक की भी कहानी नई नहीं है. लेकिन मुख्यघारा की चालू फिल्में भी कई बार बदलती हवाओं का सुराग देती हैं. इस लिहाज से अचानक 'काला' महत्वपूर्ण हो उठती है. पहली बार शायद किसी कारोबारी फिल्म में हम राजनीति के मौजूदा विमर्श के ख़िलाफ़ एक बारीक़ क़िस्म का मानीख़ेज प्रतिरोध देखते हैं. फिल्म के खलनायक नेता का हर जगह टंगा पोस्टर है- 'मैं देशभक्त हूं और देश की सफ़ाई करना चाहता हूं.' जिस समय देशभक्ति को जीने की इकलौती शर्त बनाया जा रहा हो और स्वच्छता को राष्ट्रीय कोरस में बदला जा रहा हो, उस समय एक फिल्म में दिख रहा ऐसा पोस्टर अपने-आप में बहुत कुछ कह जाता है. यही नहीं, धारावी पर कब्ज़े की लड़ाई में ज़मीन का सवाल भी आता है और दलित अस्मिता का भी. काले कपड़े पहने नायक काला बिल्कुल उजले कपड़ों वाले नाना पाटेकर के रंग संबंधी पूर्वग्रह का मज़ाक उड़ाता है, लोगों से अपने पांव छुलाने के ब्राह्मणत्व को पांव दिखाता है. राम कथा खलनायक के घर कही जा रही है. नायक रावण की तरह पेश किया जा रहा है. यहां चाहें तो एक और दक्षिण भारतीय निर्देशक मणि रत्नम की फिल्म रावण को याद कर सकते हैं. वहां भी नायक रावण की तरह पेश किया गया है. मगर रजनीकांत की फिल्म अपने संकेतों में कहीं आगे जाती है. फिल्म में धारावी में ही पली-बढ़ी, मगर अरसे तक बाहर रही एक नायिका पहले सरकार के साथ मिल कर काम करना चाहती है, लेकिन फिर उसका फासीवादी चेहरा देख सहम जाती है- जहां किसी भी असहमति के लिए अवकाश नहीं है. फिल्म में एक सिपाही जय भीम का नारा लगाता है. हमें शायद पहली बार किसी कारोबारी फिल्म के आंदोलन में यह नारा सुनाई पड़ता है. दरअसल यह जय भीम का नारा है जो दलित चेतना से जुड़े लोगों को फिल्म में सबसे ज़्यादा लुभा रहा है. लेकिन इस फिल्म में दलित प्रश्न का एक और आयाम है. दलितों का मुद्दा अमूमन अस्पृश्यत या वैधता-अवैधता के प्रश्न से जुड़ा मिलता है, लेकिन फिल्म 'काला' में इसे ज़मीन के अधिकार से जोड़ा गया है. फिल्म मोटे तौर पर ही- मगर- याद दिलाती है कि दलदल में डूबे धारावी की अहमियत अचानक इसलिए बढ़ गई है कि आज की तारीख़ में वह मुंबई के बीचो-बीच ऐसी जगह हो गई है जहां से कहीं भी आना-जाना आसान है. आज इस ज़मीन की क़ीमत अरबों में है. इसलिए वहां बसे लोगों को निकालने और उसे बिल्डरों और पूंजीपतियों के हवाले करने की तैयारी है. फिल्म के एक दृश्य में काला एक छतरी के सहारे अपने दुश्मनों से लड़ता है और सबको मार गिराता है. रजनीकांत की यह छतरी अनूठी है- एक अयथार्थवादी छतरी, जो न्योता देती है कि आप इस बेतुके से दृश्य में कोई प्रतीकात्मकता खोजने का उपक्रम करें. तो क्या यह वह छतरी है जिसके तले दबे-कुचले समुदाय आएं तो अपने समय की फासीवादी और सांप्रदायिक सत्ता को पलट सकते हैं? जवाब देना या खोजना बेकार है- यह रजनीकांत की फिल्म है. फिल्म जहां ख़त्म होती है, वहां रंगों के संयोजन से भी एक इशारा है. शुरुआत काले रंग से होती है- काला- यानी गंदगी का रंग, अस्पृश्यता का रंग- लेकिन इसे फिल्म मेहनत और पसीने से जोड़ती है. इसके बाद अचानक स्क्रीन लाल हो उठती है और फिर नीली. निर्देशक पी रंजीत कुछ न कहते हुए भी इशारा कर जाते हैं कि जमीन की लड़ाई अंबेडकर और मार्क्स के अनुयायियों को मिलकर लड़नी पड़ेगी.  आगे पढ़ें

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