मध्यप्रदेश: बदले सियासी हालात, भाजपा के आसान नहीं होगा पिछला परिणाम दोहराना



भोपाल। पांच साल पहले 2014 में जब लोकसभा चुनाव हुए थे, तब मध्यप्रदेश का राजनीतिक मिजाज कुछ और था, जो इन पांच साल में 360 डिग्री से बदल चुका है। प्रशासन के सूत्र भाजपा के शिवराज सिंह चौहान के हाथ में थे। कांग्रेस में कोई बड़ा नेता फ्रंट पर नहीं था, इसलिए चुनाव की घोषणा के दिन से कांग्रेस को दौड़ से बाहर माना जा रहा था। आज सियासी हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। सूत्र शिवराज सिंह चौहान के हाथ से निकलकर कांग्रेस के कमलनाथ के हाथ में आ चुके हैं। चुनौती आज भाजपा के सामने ज्यादा बड़ी हैं। पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस के पास खोने को ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन भाजपा ने 29 में से एक तरफा 27 सीटें लेकर जो रिकार्ड बनाया था, उस पर टिके रहना आसान नहीं होगा। प्रदेश में इस बार चार चरणों में वोट डलेंगे। चुनाव आयोग ने पूरे देश में सुरक्षा बलों की उपलब्धता के लिहाज से यह कार्यक्रम बनाया है।


इतना लंबा चुनाव कार्यक्रम पहले शायद ही कभी आया हो। जितना लंबा चुनाव अभियान होगा, संघर्ष भी उतना ही कड़ा होगा। सियासी समीकरणों पर निगाह डालें तो मध्यप्रदेश में कुल 29 लोकसभा सीटे हैं। इनमें से 19 सामान्य, छह आदिवासी और चार अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। पिछले चुनाव में 29 में से 27 सीटें भाजपा ने जीती थीं। प्रदेश के इतिहास में पहली बार भाजपा को लोकसभा चुनाव में इतनी बड़ी सफलता मिली थी। भाजपा ने लगभग 54 फीसदी वोट पाकर यह कामयाबी हासिल की थी। 2013 के विधानसभा चुनावों में मत प्रतिशत के हिसाब से भाजपा को कुल 45.19 फीसदी वोट मिले थे। कांग्रेस को भी ठीक-ठाक 36.79 फीसदी वोट मिले। इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट चार फीसदी घटा, सीटें 55 कम हो गईं और चौथी बार सत्ता में आने की उसकी हसरत अधूरी रह गई।


इसके विपरीत कांग्रेस पिछले लोकसभा चुनाव में सबसे खराब प्रदर्शन करते हुए 35 फीसदी वोट पाकर दो सीटों पर सिमट गई थी। पिछले विधानसभा चुनाव में 36.50 प्रतिशत वोट लाकर वह 58 विधानसभा सीटें ही जीत पाई थी। इस बार उसने वोट बढ़ाए साढ़े तीन फीसदी और सीटें 56 बढाईं। इन चुनावों में हालांकि वह भाजपा से दशमलव एक फीसदी वोट कम लाई, लेकिन भाजपा के मुकाबले पांच सीटें ज्यादा लाकर अल्पमत में होने के बावजूद वह सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों के सहारे सरकार बनाने में कामयाब रही। ताजा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उम्मीद है कि वह कम से कम एक दर्जन सीटों पर कामयाब हो सकती है। इस उम्मीद का आधार है विधानसभा चुनाव में 14 लोकसभा सीटों में उसका भाजपा से बढ़त बनाना। ये सीटे हैं धार, झाबुआ, खरगोन, खंडवा, छिंदवाडा, मंडला, बालाघाट, शाजापुर, जबलपुर, भिंड, मुरैना, ग्वालियर, राजगढ़, गुना। पिछले लोकसभा चुनाव में देश में अलग किस्म का राजनीतिक जुनून था, जो इस बार दिखाई नहीं दे रहा है, इसलिए पिछले चुनाव परिणाम को दोहराना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। इससे उलटकांग्रेस का नेटवर्क एक बार फिर सक्रिय हो गया है। 

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