कांग्रेस में अब कांग्रेस का ही कौन बचा है....?



(क्या कांग्रेस की खोई सत्ता लौटा सकता है जातिवाद का दूसरा और अंतिम हिस्सा) कमलनाथ अगर छिंदवाड़ा पर ही गौर कर लेंगे तो जातियों, समाजों और समुदायों से उनके मिलने जुलने का फायदा या नुकसान उनकी समझ में आ सकता है। 1990 पहला अवसर था। छिंदवाड़ा जैसे मजबूत किले में, जो उसने इमरजेंसी की इंदिरा विरोधी लहर में भी नहीं हारा था, उस छिंदवाड़ा की सभी आठों विधानसभा सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की। इसके बाद फिर छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र में हर विधानसभा चुनाव में भाजपा की हिस्सेदारी रही है, कभी कम तो कभी ज्यादा। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में वो कांग्रेस पर लगातार भारी साबित हो रही है। 1990 के बाद 2003 ऐसा दूसरा मौका था जब विधानसभा में छिंदवाड़ा का कोई नामलेवा भी बाकी नहीं था। एक सीट को छोड़कर कमलनाथ के संसदीय क्षेत्र की सभी विधानसभा सीटें भाजपा ने जीती थी। जो एक सीट उसने नहीं जीती थी, वहां गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का उम्मीदवार जीता था। अब अगर छिंदवाड़ा जैसे मजबूत गढ़ में कांग्रेस के कमजोर होने के कारणों पर कमलनाथ ने कभी गौर किया हो। उसका विश्लेषण किया हो तो उन्हें समझ में आना चाहिए कि वे सिर्फ और सिर्फ बेवजह की कवायद कर रहे हैं। नवम्बर,2018 में इसका हासिल कुछ नहीं होगा। कमलनाथ ने कोई विश्लेषण किया होता तो जाहिर है कांग्रेस की आज जैसी पतली हालत नहीं होती। आखिर कमलनाथ की गिनती पार्टी के राष्टÑीय नेताओं और गांधी परिवार के नजदीकी नेताओं में होती है। इसलिए इस विश्लेषण पर अपन सिर खपा लेते हैं। राजीव गांधी के दौर में राम मंदिर का ताला खुलने और भाजपा के राम मंदिर आंदोलन के बाद मुसलमानों का कांग्रेस से भरोसा लगातार उठता चला गया। फिर राजीव गांधी के ही दौर में शाहबानो प्रकरण में भी कांग्रेस ने भले ही राम मंदिर मसले से उपजे असंतोष को थामने के लिए कट्टरपंथी मुस्लिमों को खुश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल दिया। इससे एक नुकसान कांग्रेस को यह हुआ कि जो प्रगतिशील मुस्लिम हैं, वो भी नाराज हुए। और कांग्रेस से मुस्लिमों का जो भरोसा उठा तो आज तक दोबारा कायम नहीं हो पाया। भले ही फिर सोनिया गांधी बटाला हाउस एनकाउंटर में मारे गए आतंकवादी के घर आजमगढ़ तक हो आईं हो। या फिर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के तौर पर यह कह चुके हों कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमोंं का है।


या फिर कांग्रेस ने खुद यह माना हो कि उसकी दुर्गति का कारण उसकी प्रो मुस्लिम राजनीति रही है। हर जगह मुस्लिम मतदाताओं ने दूसरे विकल्प तलाश लिए। जहां अब भी, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में उनके पास कांग्रेस का कोई विकल्प नहीं है, उनके वोटिंग परसेंटज में कमी आई है। क्या इसका एक कारण यह नहीं है कि पूरे देश में कांग्रेस के पास ऐसा एक भी अल्पसंख्यक नेता नहीं है, जो मुस्लिम समुदाय में अपना असर रखता हो, अपनी बात समझा सकता हो। इंदिरा गांधी के दौर में कम से कम कुछ राज्यों में तो अल्पसंख्यक मुख्यमंत्री भी कांग्रेस देती रही थी। लेकिन इंदिरा गांधी के अवसान के बाद खोजिए एक भी ऐसा नाम, राष्टÑीय स्तर पर ही नहीं राज्यों में भी। कांग्रेस में स्वाभाविक मुस्लिम नेतृत्व खत्म होता चला गया है। क्या मध्यप्रदेश में कांग्रेस के पास कोई एक ऐसा मुस्लिम नेता है जिसका असर पूरे प्रदेश के मुस्लिमों में हो? कमलनाथ इस सवाल पर गौर करेंगे तो उन्हें समझ में आएगा कि वे जो कवायद कर रहे हैं उसका कोई सार्थक नतीजा सामने नहीं आएगा। अब कमलनाथ का संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा तो आदिवासी बहुल है। क्या कभी कमलनाथ ने गौर किया कि आदिवासी कांग्रेस से दूर क्यों होते चले जा रहे हैं। ऐसा कोई अकेला छिंदवाड़ा या मध्यप्रदेश में तो हुआ नहीं है। पूरे देश का ही किस्सा है। मध्यप्रदेश की तमाम आदिवासी सीटों पर भाजपा मजबूत हुई। और मध्यप्रदेश ही क्यों, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और पूर्वोत्तर के आदिवासी राज्यों तक आज भाजपा मजबूत है या हो रही है। कांग्रेस की हालत क्या है? क्या कांग्रेस के पास प्रदेशों में या देश में ऐसे आदिवासी नेता हैं, जिनका अपने समुदाय में कोई असर हो? क्या कांतिलाल भूरिया या बाला बच्चन वास्तविक मायनों में आदिवासियों के प्रदेश स्तरीय नेता हैं? आप को गौर करना पड़ेगा कि आपने अतीत में शिवभानु सिंह सोलंकी, जमुना देवी, प्यारेलाल कंवर, अरविंद नेताम जैसे नेताओं का क्या हश्र किया है? आदिवासी मुख्यमंत्री के नारे उछाले लेकिन क्या कभी इनमें से किसी को भी शासन करने योग्य समझा। जाने दीजिए, लेकिन राहुल गांधी की टीम के माने जाने वाले डिंडोरी के युवा आदिवासी नेता ओमकार सिंह मरकाम को ही पार्टी और समुदाय में आगे बढ़ाने के लिए क्या किया। अब कांग्रेस से बाहर आदिवासियों का एक सशक्त संगठन खड़ा हो गया है जय आदिवासी युवा संगठन।


डा. हीरालाल अलावा के इस संगठन ने भाजपा को भी चिंता में डाल रखा है तो कांग्रेस की कल्पना कीजिए। इस संगठन ने विधानसभा चुनाव में अस्सी सीटों पर मैदान में उतरने का एलान किया है। इससे भाजपा को उतना नुकसान नहीं होगा जितना कांग्रेस को। अब कमलनाथ बेचारे क्या कर पाएंगे यदि कांतिलाल भूरिया या बाला बच्चन उनके पास आदिवासियों के किसी प्रतिनिधि मंडल को लेकर आ भी जाएं। क्योंकि आदिवासियों के बीच से भी कांग्रेस ने किसी को कभी कहां उभरने दिया है। अब कांग्रेस के परम्परागत समर्थक रहे दलित मतदाताओं पर बात करें। कांग्रेस ने उनका भरोसा उठे जमाना बीत गया है। देश में दलितों के नेता के तौर जो पहचान रामविलास पासवान की है या रामदास अठावले की है या फिर मायावती की है, इस स्तर के किसी दलित नेता को कांग्रेस में जानते हैं क्या कमलनाथ। एक सुशील कुमार श्ािंदे हुआ करते थे या फिर मीरा कुमार। इनका जमीनी असर कितना और कहां हैं? जगजीवन राम के स्तर का कोई दलित नेता कांग्रेस में क्यों नहीं पनप पाया। इसी का जवाब तो हैं ये लोकसभा की चवालीस सीटें। कांग्रेस ने एक बार जिसका भरोसा खोया तो लगता नहीं है कि वो उसे वापस हासिल करने के प्रयास भी करती कभी नजर आई है। इमरजेंसी के  बाद इंदिरा गांधी ने सड़क मार्ग से पूरे देश को नापा था। लोगों में अपना भरोसा लौटाने के तमाम जतन किए थे। अब कांग्रेस में लगता ही नहीं कि किसी में इंदिरा गांधी के कोई गुण बाकी रह गए हों? समाज का गरीब तबका भी कांग्रेस का परम्परागत समर्थक हुआ करता था। लेकिन शिवराज सिंह चौहान जैसे मुख्यमंत्री ने तो मध्यप्रदेश में ब्राह्मण बनियों की इस पार्टी की पूरी पहचान बदल कर ही प्रो गरीब कर दी है। प्रधानमंत्री के तौर नरेन्द्र मोदी भी खुद ऐसे ही कदम उठा रहे हैं। जाहिर है, मनरेगा के बारे में मोदी ने भले ही उसे यूपीए सरकार का पाप कहा हो लेकिन खुद मोदी सरकार ने इसका बजट बढ़ाया है। कांग्रेस में अब स्वाभाविक नेतृत्व उभारने का कोई तरीका ही नहीं बचा है। इसलिए या तो नेताओं के परिवारजन ही आगे आ रहे हैं या फिर गणेश परिक्रमा करने वाले नेताओं की भीड़ है। राहुल गांधी ने भले ही कांग्रेस के सिपाही कार्यक्रम कभी चालू किया था, अब तो शायद वे भी इसे भूल चुके हैं। इसलिए अब हैं कहां कोई कांग्रेस में कांग्रेस का सिपाही। कार्यकर्ता तो कमलनाथ का है, दिग्विजय सिंह का है, सिंधिया का है, पचौरी का है या फिर और किसी का है तो वो है गांधी परिवार। कांग्रेस का तो कांग्रेस में कोई बाकी ही नहीं है। क्या करेंगे कमलनाथ? (समाप्त)

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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