तुझ को मालुम है कल क्या होगा...?



जो लोग दक्षिण के राज्यों के चरित्र को जानते हैं और खासकर कर्नाटक के। उन लोगों को राहुल गांधी का केरल के वायनाड से भी  लोकसभा चुनाव लड़ना एक पुरानी कहावत जैसा लग सकता है। कहावत है, 'चौबे जी छब्बे जी बनने चले थे और दुबे जी बनकर  लौटे।' और आसान समझना हो तो...' न खुदा ही मिला न विसाल-ए- सनम, न इधर के हुए न उधर के हुए' से समझ जाईए। कांग्रेस के  रणनीतिकार राहुल को उत्तरप्रदेश की परम्परागत अमेठी सीट के अलावा केरल की कर्नाटक से लगी सीट वायनाड से भी चुनाव लडवा  रहे हैं। वायनाड से राहुल के लड़ने का एलान रविवार को किया गया है। इसका जो घोषित कारण बताया जा रहा है वो यह है कि राहुल   को यहां से लड़ा कर कांग्रेस दक्षिण को साधने जा रही है। और दबा हुआ कारण जो समझ में आ रहा है, वो यह कि अमेठी में स्मृति  ईरानी राहुल को कड़ी टक्कर दे रही हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल बमुश्किल यहां से एक लाख से कुछ ज्यादा वोटों से चुनाव  जीत पाए थे। इस बार तो स्मृति ईरानी पूरे पांच साल अमेठी में सक्रिय रही हैं। रही बात दक्षिण के राज्यों को साधने की तो वहां धरातल पर कांग्रेस के पास साधने के लिए कर्नाटक और केरल के  अलावा तो कुछ है  नहीं। तमिलनाडू, तेलंगाना और आंध्र में कांग्रेस कहीं दौड़ में ही नहीं है। दूसरा, वायनाड कर्नाटक से लगा हुआ लोकसभा क्षेत्र है।  कर्नाटक की एक खासियत यह भी है कि यहां के लोग दक्षिण के बाकी राज्यों की तुलना में अपने को ज्यादा श्रेष्ठ मानते हैं। लिहाजा,  कर्नाटक जहां कांग्रेस लड़ाई में मौजूद हैं, वहां राहुल का केरल से चुनाव लड़ना विपरीत असर डाल सकता है।


अतीत को याद करेंगे  तो इंदिरा गांधी ने दक्षिण में कर्नाटक के चिकमंगलूर और सोनिया गांधी ने भी कर्नाटक के बेल्लारी को दूसरी सीट के तौर पर पसंद  किया था। राहूल पहले कांग्रेसी है जो केरल में जाकर दूसरी सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं। केरल वामपंथियों का गढ़ है। और माकपा के  महासचिव प्रकाश कारत ने स्पष्ट कर दिया है कि माकपा कोई वैसी रियायत देने के मूड में नहीं है जैसी रियायत उत्तरप्रदेश में सपा और  बसपा के महागठबंधन ने कांग्रेस को अमेठी और रायबरेली की राहुल और सोनिया की परम्परागत सीट पर दी है। जाहिर है कर्नाटक के  श्रेष्ठ दक्षिण भारतीय कांग्रेस समर्थकों को अगर राहुल का केरल से लड़ना पसंद नहीं आया तो कांग्रेस को कर्नाटक में भी नुकसान हो  सकता है। और सभी जानते हैं कि कर्नाटक में अब भाजपा भी कोई पैर जमाती पार्टी नहीं रह गई है। वायनाड लोकसभा सीट को कांग्रेस का मजबूत गढ़ बताया जा रहा है। इस लोकसभा क्षेत्र का अस्तित्व परीसीमन के बाद 2009 में  हुआ है। यानि यहां कुल दो लोकसभा चुनावों का इतिहास है। 2009 में तो कांग्रेस उम्मीदवार ने यहां सीपीआई के उम्मीवार को दो  लाख से ज्यादा वोटों से चुनाव हराया था। और 2014 के लोकसभा चुनाव में यही कांग्रेस उम्मीदवार मात्र बीस हजार वोटों से चुनाव  जीत पाया था। इसमें मजेदार तथ्य यह है कि इस चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार को अस्सी हजार से ज्यादा वोट हासिल हुए थे। जातीय समीकरण की बात करें तो यहां 49.48% हिंदू, 28.65% मुस्लिम समुदाय और 21.34% ईसाई समुदाय की आबादी निवास  करती है।


जिले की कुल जनसंख्या में अनुसूचित जाति (एससी) की आबादी 3.99 फीसदी और अनुसूचित जनजाति (एसटी) की  तादाद 18.53 फीसदी है। जिले की कुल आबादी में से 96.14 प्रतिशत लोग शहरी इलाकों में और 3.86 प्रतिशत लोग ग्रामीण इलाकों  में रहते हैं। अब केरल के चर्चित सबरीमाला मंदिर विवाद जिसने केरल के हिन्दू समुदाय को उद्वेलित कर रखा है, वहां के हिन्दुओं का  रूख क्या हो सकता है? व्यवहार में यह भी एक तथ्य है कि दक्षिण भारत के हिन्दू, उत्तर भारतीय हिन्दूओं की तुलना में कहीं ज्यादा  कट्टर रूख रखते हैं। सबरीमाला विवाद पर केरल में अकेले भाजपा ने ही अय्यपा भक्तों का खुलकर पक्ष लिया है। और फिर शायद  राहुल के रणनीतिकारों ने इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया लगता है कि इसी सीट पर दूसरे लोकसभा चुनाव में भाजपा ने नौ फीसदी से  ज्यादा वोट हासिल कर लिए थे। फिर केरल में मुस्लिम और ईसाई मतों का समर्थन वामपंथियों और कांग्रेस दोनों तरफ बंट सकता है। केरल में वामपंथी गठबंधन और कांग्रेस गठबंधन में ही अब तक मुख्य मुकाबला होता रहा है। भाजपा अब तक यहां केवल अपना   वोट प्रतिशत बढ़ाने की लड़ाई लड़ती आ रही थी। लेकिन सबरीमाला विवाद में उसके हिन्दुओं के समर्थन में खुलकर आने का नतीजा  क्या होगा, इसका असर 2019 के चुनाव में ही पता लगेगा। राहुल ने दूसरी सीट बहुत सोचसमझकर तो निश्चित ही चुनी होगी लेकिन  हो सकता है कि उन्हें इस बार इस दूसरी सीट पर भी कड़ा मुकाबला करना पड़ जाए। तो विसाले सनम को जो दूसरा हिस्सा है,'रहे दिल  में हमारे ये रंज-ओ-अलम, न इधर के हुए न उधर के हुए' की आशंका तो बरकरार रहेगी। और नजीर अकबराबादी तो ये भी फरमा गए  हैं, 'तू जो कल आने को कहता है 'नजीर', तुझ को मालूम है कल क्या होगा।' अब राजनीति तो अनिश्चितताओं का ही खेल है।  है कि  नहीं।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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