तेरा निजाम है, सिल दे जुबाने-कायर को....



‘तिरा निजाम है, सिल दे जुबाने-शायर को। ये ऐहतियात जरूरी है, इस बहर के लिए।’ अमर लेखक दुष्यंत कुमार की यह पंक्ति शिद्दत से किसी बार-बार दोहरायी जाने वाली प्रार्थना की तरह याद आ रही है। इनमें मामूली रद्दोबदल के जरिये हमारी फरियाद है देश के चुनाव आयोग से। न्यायपालिका से। चुनाव का वक्त है और आयोग के निजाम यानी हुकूमत की ताकत से कोई इनकार नहीं कर सकता। न्यायपालिका की हुकूमत पवित्र एवं व्यवस्था पर यकीन बनाए रखने वाले तत्व की तरह सभी के सामने है। तो इन दो शक्तियों से एक गुजारिश है, ‘तेरा निजाम है, सिल दे जुबाने-कायर को


ये ऐहतियात जरूरी है इस बहर के लिए।’  यहां ‘बहर’ अर्थात दुनिया से हमारा आशय भारत के महान लोकतंत्र से है। जहां उन कायरों की जुबान को पूरी ताकत से सिल देना अब बहुत जरूरी हो गया है, जो सियासत के मैदान में अपनी कमजोरी को जुबानी बवासीर के जरिये ताकत के रूप में पेश करने का गंदा खेल खेलने पर आमादा हैं। आवश्यक हो गया है कि मोहम्मद आजम खान जैसों के मुंह में कानूनी कार्यवाही के तीर ठूंसकर उन्हें बंद किया जाए।


इस कार्रवाई का विस्तार हर उस शख्स तक अनंतकाल के लिए किया जाना चाहिए, जो सार्वजनिक जीवन में अपनी गंदी सोच के भयावह प्रदूषण का  प्रसार करने पर तुला हुआ है।  देश की राजनीति यूं भी अधोपतन के चरम तक पहुंच चुकी है। इस माहौल में नैतिकता का तत्व तलाशना चील के घोंसले में मांस की खोज जैसा निरर्थक प्रयत्न बन चुका है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में मोहम्मद आजम खान जैसी घोर अनैतिकता तो भोजन करते समय किसी का मल दिख जाने जैसी असहनीय है। बात सिर्फ आजम की नहीं है।


भोपाल के एक राजनीतिक शायर भी पूर्व में एक महिला के लिए इसी तरह की अभद्र टिप्पणी का परिचय देकर  अपनी  नीयत का मंजर सार्वजनिक कर चुके हैं। मायावती हों या प्रियंका गांधी या फिर हों स्मृति ईरानी तथा अन्य नेत्रियां, इनकी राजनीतिक ताकत से घबराकर भी जिस तरह कई लांछित आचरण किये गये, वह इसी बात का द्योतक हैं कि ‘यत्र नायेस्तु पूज्यंते...’ वाला यह देश चंद राजनीतिक हितों की होड़ में किस कदर रसातल की ओर जा रहा है।  शबनम मौसी तब मध्यप्रदेश विधानसभा की सदस्य थीं।


देश की इस पहली किन्नर विधायक पर आरोप लगा कि वह विधानसभा परिसर में एक विधायक के पीछे चप्पल लेकर उसे मारने दौड़ी थीं। एक टीवी चैनल की ओर से तब मैंने शबनम की  प्रतिक्रिया ली थी। उन्होंने कैमरा बंद करवा कर लगभग रोते हुए बताया कि विधायक के किन-किन जहरीले कथन के चलते उन्हें यह रूप अपनाना पड़ा। वह सुनकर मैं दंग रह गया था। हां, इस चप्पल कांड के बाद उक्त विधायक की ओर से शबनम को फिर कभी कोई शिकायत नहीं हुई। ऐसे आचरण की बहती काली गंगा को देखकर लगता है कि शबनम ने जो किया, आज उसके विस्तार की जरूरत है। दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने भोपाल में एक बार कहा था, ‘महिलाएं चंडी बनकर अपने अधिकार छीन लें।’ अब आवश्यकता इस बात की भी है कि महिलाएं चंडी बनकर बदजुबानों के मुंह से उनकी जुबान भी छीन लें। आशय कानून हाथ में लेने के लिए दुष्प्रेरित करने का नहीं है। आशय यह कि किसी भी तरह आजम खान जैसी मानसिकता पर विराम लगाना ही होगा, फिर वह वैसे न सही तो ऐसे ही सही।

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रत्नाकर त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी की गिनती प्रदेश के उन वरिष्ठ पत्रकारों में होती है जिन्हें लेखनी का धनी माना जा सकता है। राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर सहित कई अखबारों और ई टीवी तक अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने वाले रत्नाकर प्रदेश के उन गिने चुने संपादकों में से एक है जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान उनकी लेखनी से है।



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