केवल गणित का नहीं है मामला



आइये भोपाल लोकसभा सीट को आइना दिखाएं। आप पाएंगे कि इसमें करीब चार लाख मुस्लिम मतदाता हैं। आप यह भी पाएंगे कि इतनी बड़ी तादाद के बावजूद इसी वर्ग के मंसूर अली खां पटौदी, आरिफ बेग और साजिद अली इस सीट से बुरी तरह चुनाव हारे। वह भी कांग्रेस के प्रत्याशी होते हुए। बीते तीस साल के दर्पण में एक और तथ्य रोचक है। सुरेश पचौरी, कैलाश कुण्डल अग्हिोत्री और पीसी शर्मा एक मुगालते के साथ चुनावी मैदान में उतरे। वह यह कि मुस्लिम मत तो कांग्रेसी होने के नाते उन्हें मिलने ही हैं, ब्राहृणों के थोकबंद मत भी उनकी झोली में जाएंगे। यह मुगालता इन प्रत्याशियों का पानी उतारते हुए उतरा। इसी दल से प्रत्याशी बने सुरेंद्र सिंह ठाकुर अल्पसंख्यकों के साथ-साथ राजपूत और पिछड़े समुदाय से भी भारी समर्थन की आशा लगाए हुए थे, जो अंतत: उनके लिए निराशा साबित हुई।  ऐसे समीकरणों और उनके स्थापित असर के बीच दिग्विजय सिंह के समर्थक एक बार फिर मुस्लिम के अनिवार्य मतों के अलावा अन्य समीकरणों की ओर टकटकी लगाकर देख रहे हैं। तो क्या इसे मृग मरीचिका वाला मामला नहीं कह सकते! राम मंदिर आंदोलन और उसके बाद सन 1992 में विवादास्पद ढांचे के विध्वंस के बाद से मुस्लिम कांग्रेस से नाराज हैं और भाजपा के प्रति नफरत से भरे हुए हैं। मुस्लिमों को देश भर में जहां भी कांगे्रस का विकल्प मिला वे उन्होंने उसे अपनाया। ममता बैनजी, मुलायम, लालू सहित तमाम क्षेत्रीय पार्टियों का एक बड़ा वोट आधार मुस्लिम भी बने हैं। जहां मुस्लिमों के पास कांग्रेस का विकल्प नहीं है वहां वे मन मारकर या तो वह कांग्रेस को ही वोट देते हैं या फिर निराशा के चलते वोट देने जाते ही नहीं।


इन दो विकल्प के बीच ही उस यक्ष प्रश्न का उत्तर छिपा हुआ है, जो कांग्रेस को बीते तीन दशक से भोपाल सीट पर सताता आ रहा है। मैदान में क्योंकि  दिग्विजय सिंह हैं तो मुस्लिम मत के थोकबंद रूप से कांग्रेस की झोली में गिरने के आसार ज्यादा हैं। इसलिए भी कि इस वर्ग के बीच नरेंद्र मोदी को लेकर घनघोर असंतोष का माहौल है। कांग्रेस कहीं न कहीं इस नाराजगी को अपनी ओर करने में नाकाम रही है लेकिन दिग्विजय को भोपाल से मैदान में उतार कर कांग्रेस ने एक चांस तो लिया है। दिग्विजय सिंह की जीतने की क्षमता को देखते हुए इस बार मुस्लिम मतदान ज्यादा हो सकता है। पर दिग्विजय सिंह की छवि के साथ इसके अपने खतरे भी कम नहीं हैं। अब भले ही दिग्विजय सिंह अपने खालिस और सनातनी हिन्दू होने का दम भरें या आरिफ अकील उन्हें यह प्रमाण पत्र प्रदान करें, क्या हिन्दू वोटर को भी राजा साहब रास आएंगे?   भोपाल का मामला केवल जातिगत गणित का नहीं है। शायद भाजपा इसे भांप चुकी है और कांगे्रस इस दिशा में नादानों जैसा आचरण कर रही है। इस सीट पर बहुत बड़ी संख्या में कर्मचारी वोट निर्णायक है। वह तबका, जो दिग्विजय सिंह के प्रति आज भी अविश्वास तथा क्रोध से भरा हुआ है। अगला वोट युवाओं का है। इस वर्ग पर सन 2014 से छाया नरेंद्र मोदी का जादू अब भी कायम है। नोटबंदी तथा जीएसटी को लेकर व्यापारी वर्ग भले ही मोदी से नाखुश हो, लेकिन प्रदेश भाजपा का संगठन इनके बीच गहरी पैठ बनाए रखने में अब तक सफल है। महिलाओं पर शिवराज सरकार का जादू कायम है और धु्रवीकरण की सूरत में एकजुट होकर भाजपा के पक्ष में मतदान करने की रवायत इस सीट पर खत्म नहीं हो सकी है।


इसलिए दिग्विजय की जीत के लिए जातिगत गणित को आधार मानकर आश्वस्त होने वालों ज्यादा गहराई से सोचना होगा। वोट पाने की कोशिश जब तक 'मिस्टर बंटाढार' और 'बंटाढार रिटर्न्स' की छवि को तोड़ने वाली नहीं होगी, तब तक इस सीट पर तीन दशक से सियासी वैधव्य झेल रही कांग्रेस की सूनी मांग में सिंदूर दिख पाने की कल्पना बेमानी है।  इधर, दिग्विजय सिंह कब आत्माघाती तेवर अपना लें कहना मुश्किल है। हालिया एक बयान में उन्होंने कहा है कि भाजपा और उसके नेता उनसे डरते हैं। यह हास्यास्पद है। उस चिड़िया की तरह जो अपने पैर ऊपर की ओर करके सोती है। जनश्रुति है कि ऐसा कर वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि यदि रात को आसमान गिर पड़ा तो वह अपने पैर पर उसे थाम लेगी। यही दिग्विजय सिंह की सोच बन गयी दिखती है। वह  भाजपा के लिए डर नहीं, बल्कि सहूलियत का माध्यम बन चुके हैं। ओसाम जी से लेकर पुलवामा दुर्घटना, भगवा आतंकवाद, जाकिर हुसैन से लेकर लंबी फेहरिस्त है जिसे भाजपा भोपाल के लोगों को याद कराना चाहेगी। भाजपा दिग्विजय के ऐसे तेवरों में उनके दस साल के कार्यकाल की असफलताओं का तड़का लगाने में हर बार कामयाब रही है। राज्य में लगातार तीन चुनाव जीतते समय भाजपा के लिए यह सबसे लाभ का सौदा होता रहा कि दिग्विजय की विफलताओं को गिनाकर उन्हें अपने हक में भुना ले। लिहाजा उनसे यह उम्मीद बेमानी है कि इस उम्र में वह अपने स्वभाव में तब्दीली ला सकें। भाजपा इसका लाभ उठाने से नहीं चूकेगी। अब देखने वाली बात यह है कि राजनीतिक वानप्रस्थ से ऐन पहले इस विराट चुनौती को स्वीकारने वाले दिग्विजय क्या कोई करिश्मा कर पाएंगे? वो कर सकते हैं इसमें संशय नहीं है लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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