सिंधिया के चुनाव लड़ने के संकेत से कांग्रेस में बढ़ सकती है कलह



जावरा में रोड़ शो के दौरान सिंधिया ने कहा, वे उज्जैन संभाग की किसी सीट से लड़ सकते हैं चुनाव  प्रदेश कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने खुद के विधानसभा चुनाव लड़ने का संकेत देकर कांग्रेस में एक नई उठापठक की भूमिका तैयार कर दी है। दो दिन पहले मंदसौर संसदीय क्षेत्र में अपने रोड़ शो के दौरान जावरा में सिंधिया ने संकेत दिए है कि वे उज्जैन संभाग की किसी विधानसभा सीट से अगले चुनाव में मैदान में उतर सकते हैं। जावरा सिंधिया परिवार के खास रहे स्वर्गीय महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा का विधानसभा क्षेत्र है। कालूखेड़ा जावरा के नजदीक का एक ग्रामीण क्षेत्र हैं और महेन्द्र सिंह यहां के मूल निवासी थे। हालांकि 2008 में जावरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे कालूखेड़ा को 2013 में अशोकनगर की चंदेरी सीट पर जाकर चुनाव लड़ना पड़ा था। अशोक नगर और चंदेरी ज्योतिरादित्य सिंधिया के संसदीय क्षेत्र गुना के हिस्से हैं। गुना सिंधिया परिवार का ग्वालियर से भी ज्यादा मजबूत गढ़ रहा है। उज्जैन संभाग का बहुत बड़ा हिस्सा अतीत में ग्वालियर रियासत का हिस्सा रहा है। हालांकि जावरा में जहां सिंधिया ने खुद के चुनाव लड़ने के संकेत दिए है, वो नवाब जावरा का राजशाही इलाका था।


उज्जैन संभाग में सिंधिया राजघराने का असर तो रहा है लेकिन वो कभी बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं रहा है। मंदसौर संसदीय क्षेत्र जिसका अधिकांश क्षेत्र ग्वालियर रियासत का हिस्सा रहा है लेकिन यहां कभी सिंधियाओं का ऐसा असर नहीं रहा है जैसा ग्वालियर, शिवपुरी या गुना में दिखाई देता रहा है। सिंधिया ने जब भी यहां से अपने किसी समर्थक को संसदीय क्षेत्र का चुनाव लड़ाया, उसे हार का ही सामना करना पड़ा। इनमें महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा और राजेन्द्र सिंह गौतम दोनों चुनाव हारे हैं। यहां से जावरा के ही निवासी डा. लक्ष्मीनारायण पांडे करीब नौ बार संसद में पहुंचे हैं। इतने अरसे में केवल भंवरलाल नाहटा, बालकवि बैरागी और मीनाक्षी नटराजन को एक-एक बार कांग्रेस से सांसद निर्वाचित होने का मौका मिला है। कांग्रेस के यह तीनों उम्मीदवार भी डा. पांडे को ही हरा कर लोकसभा में पहुुंचे थे। बहरहाल, सिंधिया के इस संकेत से कांग्रेस में घमासान मचना तय है। असल में यह माना जा रहा है कि कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में सिंधिया के मुख्यमंत्री बनने की संभावना ज्यादा है। हालांकि कांग्रेस ने अभी तक प्रदेश में घोषित तौर पर किसी का भी मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के तौर पर जनता के बीच नाम आगे नहीं बढ़ाया है।


लेकिन सिधिंया के इस संकेत से कमलनाथ को भी विधानसभा चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी करना पड़ सकती है। कमलनाथ भी मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार हैं। हालांकि विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस के किसी भी प्रदेशाध्यक्ष ने विधानसभा चुनाव लड़ने से परहेज किया है। 2008 में सुरेश पचौरी ने विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा था तो 2013 में कांतिलाल भूरिया ने भी अध्यक्ष रहते हुए हाथ नहीं अजमाया था। सुरेश पचौरी को 2013 में कांग्रेस ने भोजपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा दिया था। यह पचौरी का विधानसभा चुनाव लड़ने का पहला मौका था। वे अपने प्रतिद्वंद्वी भाजपा उम्मीदवार सुरेन्द्र पटवा से करीब 18 हजार मतों के अंतर से हार गए थे। इस समय कांग्रेस में क्योंकि कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर प्रतिद्वंद्विता सिंधिया और कमलनाथ के बीच साफ तौर पर दिख रही है। लेकिन यह दोनों नेता विधानसभा का चुनाव लड़ते हैं तो बाकी महात्वाकांक्षी नेता भी मैदान में उतरने की जोर अजमाईश कर सकते हैं। इनमें पिछला चुनाव हारे सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया, अरूण यादव, मीनाक्षी नटराजन, प्रेमचंद गुड्डू जैसे कई नेता विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए हाथपैर मार सकते हैं। हालांकि इस समय कांग्रेस को अगर प्रदेश में भाजपा से मुकाबला करना है तो उसका एकजुट होकर चुनाव लड़ना जरूरी है लेकिन जिस तरह से सिंधिया ने खुद संकेत दिए हैं, वो कांग्रेस की कलह को बढ़ा सकते हैं।

loading...



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति