नाथ को बधाई और सिंधिया को साधुवाद



तो आखिरकार कमलनाथ छिंदवाड़ा सहित समूचे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गये। बधाई। इस बात की भी बधाई कि भारी बहुमत पाने के अपार मौकों को न भुना पाने के बावजूद राहुल गांधी ने उनकी यह चिर-संचित अभिलाषा पूरी कर दी। साधुवाद के पात्र हैं, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जिन्होंने दिल्ली दरबार के निर्णय को सिर झुकाकर शिरोधार्य किया है, उस सच्चे कांग्रेसी की प्रजाति की तरह, जो इस पार्टी में कम से कम मध्यप्रदेश में तो विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी है। इस लिहाज से ‘महाराज’ का यह बलिदान और सराहनीय हो जाता है। बलिदान की बात चली तो एक फिल्म याद आ गई। शीर्षक था, ‘बदला और बलिदान।’ ज्योतिरादित्य ने इस चुनाव में शिवराज से अपने साथ-साथ अपने पूर्वजों के अपमान का भी बदला ले लिया। सिंधिया राजघराने को लेकर शिवराज ने बीते कम से कम दो साल में जमकर आग उगली थी। जाहिर है कि वह जूनियर सिंधिया की प्रदेश में पहले बढ़ी सक्रियता और फिर पांव पसारती ताकत से डरे हुए थे। इसलिए यह चुनाव भाजपा ने ‘शिवराज बनाम महाराज’ कर दिया था। ग्वालियर-चंबल सहित अपने प्रभाव वाले अन्य क्षेत्रों में सिंधिया ने भाजपा को जमकर नुकसान पहुंचाया।


बदला पूरा हुआ तो मुख्यमंत्री पद के लिए बलिदान भी दे दिया। सिंधिया के समर्थक भले ही उनके मुख्यमंत्री न बन पाने का मलाल पाले बैठे होंगे, किंतु जयविलास पैलेस की दीवारों का स्पर्श कर सिंधिया अवश्य ही इस बात की खुशी मनाएंगे कि राजघराने के खिलाफ उठी आवाज को कम से कम पांच साल के लिए खामोश कर दिया गया है। शिवराज ने बतौर चौकीदार अपना पहला अस्त्र कल ही चल दिया। कहा कि अब उन्हें दस दिन के भीतर राज्य में किसानों का कर्ज माफ होने का इंतजार है। शपथ ग्रहण के बाद कमलनाथ जब विधवा की मांग की तरह सूना राज्य का खजाना देखेंगे तो एकबारगी उनकी पेशानी पर बल पड़ना तय है। क्योंकि कर्ज माफी की सूरत में खजाने का सन्नाटा और भयावह रूप ले लेगा। लेकिन उन्हें इसके खिलाफ जतन करना ही होगा। क्योंकि मोदी सरकार लाखों-करोड़ों का कर्ज माफ करने की योजना पर काम शुरू कर चुकी है। कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में अधिक से अधिक सीट लेनी है, तो राहुल गांधी की घोषणा को उसे अमली जामा पहनाना ही होगा। रीते हुए खजाने के मुहाने पर चुनौती से भरा यह जामा थामे नाथ उस शायर की याद दिला रहे हैं, जिसने लिखा था, ‘पीछे बंधे हैं हाथ और शर्त है सफर की।


किससे कहें कि पांव के कांटे निकाल दे?’ वस्तुत: पांव के यही कांटे नाथ के सिर पर रखे गए ताज में भी साफ दिख रहे हैं। फिर भी समर्थक यह सोचकर तसल्ली कर सकते हैं कि कुबेरमयी छवि और अतीत के उससे जुड़ कई सफल उदाहरण के चलते उनका नेता इस दिशा में भी कुछ ठोस कर ही गुजरेगा। गांधी की घोषणा के अनुरूप नाथ किसानों के लिए ‘दस का दम’ दिखाने का जतन करेंगे, लेकिन उनके लिए यह चुनौती भी मुंहबाये खड़ी है कि किसी तरह चुनाव जीतने और फिर जोड़तोड़ कर बहुमत हासिल करने के प्रयास में पार्टी का फूला दम काबू किया जाए। क्योंकि यह तथ्य उनसे भी नहीं छिपा है कि पार्टी का वोट प्रतिशत राज्य में गिरा है। लोकसभा चुनाव तक भाजपा इस दिशा में निश्चित ही और सेंध लगाएगी। नाथ को यह भी देखना होगा कि किस तरह वह हालात बनाए जाएं, जिनसे आम चुनाव तक पार्टी मोदी सरकार के लिए पनपे एंटी-इन्कम्बैंसी फैक्टर का वास्तविक लाभ उठा सके। मध्यप्रदेश के चुनाव में नाथ यदि यह लाभ उठा सके होते तो कांग्रेस को आसानी से 120 से ज्यादा सीट मिलना तय था, किंतु ऐसा नहीं किया गया। अब आम चुनाव के लिए उन्हें ऐसा करना ही होगा और इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय कार्यक्रम को याद कर कहें तो नाथ के पास कड़ी मेहनत के अलावा अब और कोई चारा नहीं बचा है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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