कमलनाथ और शिवराज का अंतर



अब मैं एक साधारण सा पत्रकार और कहां कमलनाथ? मध्यप्रदेश के नए मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश के ही छिंदवाड़ा से दस बार सांसद कि लोकसभा में प्रोटेम स्पीकर के तहत सांसदों को शपथ दिला चुके। कांग्रेस के सीनियर मोस्ट राजनेता। और इतने सीनियर कि कांग्रेस की कई पीढ़िÞयां भूल चूकी हो लेकिन सोनिया और राहुल के राज में नए कांग्रेसियों को संजय गांधी कौन थे, यह याद दिलाने की कुब्बत तक रखने वाले सीनियर। संजय गांधी के बाल सखा, जिन्हें राजीव गांधी के आगमन के बाद कांग्रेसी भले ही भूल गए हों लेकिन कमलनाथ को तो अपना दोस्त हमेशा याद है। तो कह लीजिए, यारबाज। लेकिन अपनी कोई यारी नहीं। मुझे पता भी नहीं कि कमलनाथ कि मीडिया में किस से क्या यारी है? मैं उनसे चार-छह दफा मिला हूं। उनके साथ हेलीकाप्टर में भी घूमा हूं। और उनसे जब भी मिला हूं, बड़े आराम से घंटे भर उनसे बतियाया भी हूं, इसके बावजूद कह सकता हूं कि कमलनाथ मुझे नहीं ही जानते होंगे। लेकिन क्योंकि अब माननीय अवधेश बजाज साहब ने कहा है तो मुझे कमलनाथ को जानने की कोशिश करना पड़ना रही है। कमलनाथ मध्यप्रदेश के नहीं हैं। यह मैँ कोई अकेला नहीं जानता, सभी जानते हैं। बावजूद इसके वे संजय गांधी के आग्रह पर राजनीति में आए और कांग्रेस के लिए देश की सबसे सुरक्षित सीट छिंदवाड़ा को उनके लिए चुना गया तो आप तारीफ कर सकते हैं कि न तो कमलनाथ ने छिंदवाड़ा से कभी मुंह मोड़ा ना ही छिंदवाड़ा ने उनसे। पता नहीं कमलनाथ ने इस बात से कोई सबक सीखा या नहीं कि छिंदवाड़ा उन्हें जितना चाहता है तो उसने यह भी जताया कि न तो वह कांग्रेस का गुलाम है न ही कमलनाथ का। इसी छिंदवाड़ा ने उन्हें केवल इसलिए जीवन का पहला और अब तक का आखिरी चुनाव हरवाया क्योंकि वहां लोगों को यह पसंद नहीं आया कि कमलनाथ यह कह सके कि 'मैं चाहे ये करू, मैं चाहे वो करू, मेरी मर्जी...। इसलिए जब 1996 में कमलनाथ पर भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते तत्कालीन कांग्रेसाध्यक्ष और प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने उन्हें टिकट नहीं दी तो कमलनाथ ने अपनी पत्नी अलका नाथ को यहां से टिकट दिलवाया। वे जीती। लेकिन जब साल भर बाद ही कमलनाथ आरोपों से मुक्त हुए तो वे धैर्य नहीं दिखा पाए। पत्नी से लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिलवाया ताकि खुद लोकसभा में पहुंच सके। जनता ने इसे नकार दिया और तब कमलनाथ पर भाजपा के वरिष्ठ नेता सुंदरलाल पटवा ने विजय हासिल की। यह इकलौता मौका था छिंदवाड़ा का कमलनाथ से मुंह मोड़ने का। इसके बाद फिर लोकसभा में छिंदवाड़ा कमलनाथ का हो गया। पर विधानसभा में उसने कभी कांग्रेस को कमलनाथ जैसी तवज्जों नहीं दी। कई बार कांग्रेस के इस गढ़ में भाजपा ने बाजी मारी है।


लेकिन इस बार क्योंकि कमलनाथ दांव पर थे तो पूरे छिंदवाड़ा ने विधानसभा में भी कमलनाथ का साथ दिया। छिंदवाड़ा और कमलनाथ की यारी दो तरफा है पर सम्मानजनक। इसे कमलनाथ को हमेशा याद रखना चाहिए।  कमलनाथ सहज हैं और सरल भी। बहुत जल्दी खुलते हैं और बेबाकी से अपनी बात रखते हैं और सामने वाले की सुन भी लेते हैं। यहां कन्फ्यूजन की कोई गुंजाइश नहीं है। सहज और सरल का विश्लेषण अब तक पूर्व हो चुके मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए इस्तेमाल होता रहा है। पर फर्क है कमलनाथ के सहज-सरल होने और शिवराज के सहज-सरल होने में। कह सकते हैं परवरिश, रूतबे और राजनीति के स्तर का यह अंतर है। कमलनाथ सोने का चम्मच लेकर दुनिया में आएं हैं। शिवराज बिल्कुल उलट विपरीत दुनिया से। एक ने सीधे राजनीति में संसद से कदम रखा। दूसरे ने जमीन तैयार की। एक पांव-पावं वाले भैया से हवा में उड़ने तक पहुंचा। पता नहीं दूसरा हवा से जमीन पर कितना आ पाएगा? एक की सहजता सार्वभौमिक है, दूसरे ने कई दांव पेंचों मेंं अपनी सरलता को बदल लिया है। मैं यह कह सकता हूं कि शिवराज सिंह चौहान से मेरी अच्छी पहचान और दोस्ती रही है। उन्हीं के कहे के मुताबिक मैं उन लोगों में से एक हूं जो शिवराज के दिल में रहता हैं। पर पिछले तेरह साल में मैं उनसे तेरह बार भी शायद ही मिला हूं। और जब मिला भी तो उन्हें चंद मिनटों बाद घड़ी की तरफ देखते पाया। मुख्यमंत्री के साथ ऐसा हो सकता है। यारी दोस्ती क्या करें, आखिर पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी का मामला जो ठहरा। पर अब तक मैं कमलनाथ से जब भी मिला हूं, वे पर्याप्त बतियाएं, खुल कर बोले और घड़ी उन्हें देखनी नहीं पड़ी, क्योंकि मैं जब भी मिला वे व्यस्त होने के बावजूद फुर्सत में थे। पता नहीं कैसे राजनीतिज्ञ है कमलनाथ, बहुत बेलाग बोलते हैँ और खुल कर सामने आते हैं। बोल दिया आफ दि रिकार्ड तो मान लेते हैं कि ऐसा ही होगा। शिवराज के पास आफ दि रिकार्ड और आन दि रिकार्ड कुछ है ही नहीं। मीडिया के अपने मित्रों में शिवराज अकेले में बहुत असहज दिखते हैं। सार्वजनिक तौर पर वे सहज हैं। कमलनाथ और शिवराज की चुनौतियों का स्तर बहुत अलग है। कमलनाथ का कांग्रेस में कद बहुत बड़ा है। शिवराज ने बड़ा कद हासिल किया है। शिवराज को अपने संगठन में काम करने का पर्याप्त अनुभव रहा है, इसलिए वे सत्ता और संगठन दोनों में तालमेल बना कर अपनों पर अहसान करने वालों का अहसान उतारते हुए बड़े कद तक पहुंचे हैं। कमलनाथ के मामले में उलटा है, उनके लोगों पर अहसान हैं। उन्हें शायद ही किसी का अहसान उतारना हो। सत्ता उनके लिए कभी अपरिचित नहीं रही। मुख्यमंत्री वे पहली बार बन रहे हैं, और उम्मीद है कि वे विधायक भी पहली ही बार बनेंगे।


आगे की भविष्यवाणी करने का कोई मतलब नहीं? कमलनाथ सक्षम हैं, इस पर शक करने का कोई कारण नहीं है। कमलनाथ को तलवार की धार पर चलने लायक सरकार मिली है। सशक्त से भी सशक्त विपक्ष सामने बैठा है। भले ही पन्द्रह साल सत्ता में रह लिए हों लेकिन विरोध करना इस विपक्ष की जन्मघूटी में मिला है। सत्ता में रहना या जाना, उनके लिए बड़ी बात नहीं है। वे चौबीस घंटे राजनीति करने के लिए बने हैं। कांग्रेस की यह फितरत नहीं है। इसलिए कमलनाथ को बहुत चौकन्ना रहना होगा और इतना ही चौकन्ना रहना उन्हें अपने विधायकों और मंत्रियों को भी सीखाना होगा। पिछले पन्द्रह साल में यह कहना गलत नहीं होगा कि इतना काबिल विपक्ष मध्यप्रदेश ने नहीं देखा है जितना कमलनाथ के मुख्यमंत्रीत्व कार्यकाल में देखने को मिलेगा। हां, कमलनाथ की दिक्कत पार्टी के अपने अंतर्विरोध जरूर होंगे। मंत्रिमंडल के गठन में अभी दिख रहा है और टिकटों के बंटवारें में महीने भर पहले दिख चुका है। भाजपा ने यदि अपनी लड़ाई भाजपा से लड़ी है तो कांग्रेस के साथ भी इससे अलग कहां हुआ हैं? शायद इसलिए ही सत्ता का फैसला बहुत कुछ किस्मत से ही हुआ है। कमलनाथ की सरकार पर अभी दिग्विजय सिंह का ठप्पा लगा हुआ है। अभी कमलनाथ और दिग्विजय सिंह एक हैं। प्रतिद्वंद्वी ज्योतिरादित्य सिंधिया नजर आ रहे हैं। पर राजनीति, राजनीति होती है। कमलनाथ भले ही जल्दी खुलते हो या सहज हों, पर हैं तो राजनीतिज्ञ ही। कमलनाथ के साथ बस अच्छी एक यही बात है कि क्योंकि मध्यप्रदेश उनका मूल नहीं है, भले ही उनकी सारी राजनीति दून स्कूल और संजय गांधी के बाद मध्यप्रदेश की ही रही है लेकिन फिर भी वे अब तक तो दिल्ली और छिंदवाड़ा तक ही सीमित रहे हैं। पर अब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं तो उनकी राजनीति से भला कौन अछूता रह पाएगा। सो पहले की राजनीति अलग है और मुख्यमंत्री बनने के बाद की कमलनाथ की राजनीति अलग होना चाहिए। कमलनाथ बहुत दंभ से कहते रहे हैं कि कमलनाथ की चक्की बहुत बारिक पीसती है। चक्की और बारीक पीसाई का संदर्भ हम आम तौर पर अनाज और वो भी गेहूं के तौर पर ही लेते हैं। तो जो ज्यादा बारीक पिसा जाए वो मैदा होती है, और हमारी जलवायु में वो आसानी से पचती नहीं है। कमलनाथ की चक्की के सारे संदर्भ अब तक दिल्ली और छिंदवाड़ा से जुड़े रहे हैं। मध्यप्रदेश इस चक्की की पिसाई को पहली बार देखेगा। कमलनाथ की सारी राजनीतिक दीक्षा अब तक राष्ट्रीय राजनीति की रही है। जहां राजनीति और नौकरशाही का कद दोनों अलग रहते आएं हैं। अब मध्यप्रदेश अकेला छिंदवाड़ा तो है नहीं। यहां पचास जिले हैं। पर फिर भी, कमलनाथ जी से ही जितना जाना है, उम्मीद कर सकते हैं नौकरशाही को वे चला लेंगे, नौकरशाही उन्हें नहीं चला पाएगी। बिल्कुल उलटा है ना शिवराज से।   बिच्छू डॉट कॉम में दिसंबर के द्वितीय अंक में प्रकाशित

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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