ये सत्ता का पैसा बोल रहा है या अमित शाह का अविश्वास.....



इस कहानी का संबंध निश्चित तौर पर संबित पात्रा से ही है। वो ही, जो हमेशा शाम को समाचार चैनलों पर सारी भाजपा का बोझ कंधों पर उठाए दहाड़ मारते रहते हैं। तो कहानी यह है कि मुगलों के एक बादशाह ने हिन्दुस्तान के किसी राजा पर हमला किया और उसके राज्य को जीत लिया। हारे राजा ने सरेंडर कर दिया। अब नए बादशाह का दरबार लगा। मुगल राजा को जोर की प्यास लगी। उसने समर्पित राजा से पानी पिलवाने के लिए कहा। तत्काल एक दरबारी ने खड़े होकर घोषणा करना शुरू कर दिया...अज्जीमोशान शहंशाह की खितमद में पानी पेश किया जाए। इसके तत्काल बाद राजकीय धुन बजने लग गई। बादशाह को बड़ा अजीब लगा। उसने इसे रोकते हुए कहा, 'क्या तमाशा है। बंद करो।' फिर बादशाह ने ताली बजाई। तुरंत एक नौकर प्रकट हुआ। बादशाह ने उससे पानी लाने के लिए कहा। पानी आया। प्यासे बादशाह को सब्र तो था नहीं लिहाजा, उसने अपने सिर का ताज उतारा, उसमें पानी उडेला और गटागट पी गया। जब उसकी प्यास बुझी तो उसने हारे हुए राजा से कहा, बस तुम्हारी हार का कारण मेरी समझ में आ गया। अब मध्यप्रदेश में भाजपा जिसका संगठन पूरी पार्टी में आज तक सबसे मजबूत माना जाता है। उसके हाल को बेहाल करने का जिम्मा दिल्ली के 'आधारहीन अंचभों' ने अपने कंधों पर उठा लिया है। यह हकीकत अपनी जगह सही है कि भाजपा पिछले 15 साल से राज्य की सत्ता में है। सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी होगी ही। मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ माहौल होगा ही। सरकार के विरोध में और भी फेक्टर होंगे ही। इसके बाद भी कहीं से कहीं तक ऐसा तो बिल्कुल नहीं लग रहा हैै कि भाजपा के चौथी बार सत्ता में वापसी के आसार खत्म हो ही गए हैं। संबित पात्रा तो नहीं जानते हैं लेकिन शिवराज सिंह चौहान, नरेन्द्र सिंह तोमर, राकेश सिंह और सुहास भगत तो जानते ही होंगे कि 2003 में दिवंगत अनिल माधव दवे ने लिंक रोड़ एक पर गौरीशंकर शेजवार के बंगले के आउट हाउस से ही बैठकर दिग्विजय सिंह और कांग्रेस सरकार के खिलाफ 'आॅपरेशन जावली' को सफलता से संचालित कर कांग्रेस की शर्मनाक हार का इतिहास रच दिया था। उसके बाद 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव भी दीनदयाल परिसर की दूसरी मंजिल के दो कमरों में बैठ कर ही लड़े गए।


शिवराज सिंह की यात्रा से लेकर चुनाव और मीडिया प्रबंधन सबका सफल संचालन अपनी सीमित टीम और भाजपा के असीमित भरोसे के कार्यकर्ताओं और नेताआें की बदौलत करके लगातार तीन बार सरकार बनाने का इतिहास रचा। तब भी दिल्ली से कोई प्रमोद महाजन, अरूण जेटली या अनंत कुमार यहां हाईकमान का दखल रखते थे। लेकिन दिल्ली का ऐसा दखल भाजपा ने कभी नहीं देखा। निरीह होकर दिल्ली का यह दखल देखने का भाजपा के लिए यह पहला मौका है। अब ये शिवराज सिंह चौहान या नरेन्द्र सिंह तोमर कैसे भूल सकते हैं कि कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवाल (ये प्रतीक हैं, नाम तो कई और भी हो सकते हैं) ने पीरगेट के साधारण से कार्यालय में बैठकर कैसे पार्टी को प्रदेश में कांग्रेस का सशक्त विकल्प बनाया। निश्चित तौर पर तीन बार की सरकार होने के बाद भाजपा के सामने चुनौतियां बड़ी हैं। मीडिया का भी विस्तार हुआ है। लेकिन ऐसा भी तो नहीं हुआ है कि पार्टी को बाईस कमरों वाला एक पूरा होटल किराए पर लेकर मीडिया सेंटर बनाना पड़ गया। ये सत्ता का पैसा बोल रहा है? अमित शाह का अविश्वास बोल रहा है? या अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की धमक ने मध्यप्रदेश की सशक्त भाजपा के सफल नेताओं का सारा व्यक्तित्व ही लिजजिला कर छोड़ा है। शिवराज सिंह और नरेन्द्र सिंह तोमर दोनों जानते हैं कि यही नरेन्द्र मोदी 1998 में भी बड़ी धमक के साथ मध्यप्रदेश के प्रभारी बन कर आए थे। लेकिन तब कुशाभाऊ भी थे, प्यारेलाल खंडेलवाल भी थे, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, लखीराम अग्रवाल, विक्रम वर्मा भी थे, इन सबके आपसी विरोधाभास भी थे। लेकिन नरेन्द्र मोदी की तब मध्यप्रदेश के नेतृत्व के सामने चल नहीं पाई थी। इससे और पीछे जाएं तो भाजपा के दबंग नेता सुंदरसिंह भंडारी भी मध्यप्रदेश में भाजपा नेताओं की आपसी घमासान के दौर में प्रभारी बन कर आए थे लेकिन उन्हें भी यहां से रूसवा होकर जाना पड़ा था। अब आज मध्यप्रदेश भाजपा का वर्तमान जो भी नेतृत्व है, वो अपने पूर्वजों की इस दबंगई को बिसरा गया लगता है। वरना लड़ाई तो मुगल बादशाह के साधारण तरीके से लड़ कर भी जीती जा सकती थी। लड़ाई लड़ने के माद्दा से जीती जाती है। तामझाम और शानशौकत से नहीं। कहीं यह तामझाम हारे हुए राजा का प्रतीक न बन जाए। अब बात करें प्रचार की उदंड शैली की।


माननीय राष्ट्रीय प्रवक्ता को प्रेस काम्पलेक्स में कांग्रेस के अखबार नेशनल हैराल्ड की जमीन पर मॉल बनाना बड़ा भारी चुनावी मुद्दा लगा। इसलिए उडीसा के इस दिल्ली बेस्ड आधारहीन अचंभे से नेता को इस मसले पर पत्रकारों को बातचीत के लिए विशाल मेगामार्ट के समाने सड़क पर बुला कर प्रोपेगंडा करना बेहतर लगा। वो भी चुनाव आचार संहिता के दौरान और अनुमति मिले समय से पहले। कांग्रेस की इस जमीन पर क्या कुछ गलत हुआ, यह भोपाल की मीडिया के लिए कोई नई कहानी तो है नहीं। इसलिए सवाल यह उठाया गया कि जो कुछ भी गलत था तो उसे 15 साल में भाजपा की सरकार ने ठीक करके अनुचित तरीके से बनाई गई इस इमारत को गिराया क्यों नहीं? याद करें, अभी दो-चार दिन पहले इसी सरकार के प्रशासन ने इंदौर में एक बड़े अवैध निर्माण को ढहा दिया था, जबकि वो रहवासी क्षेत्र था। संबित पात्रा तो इस नेशनल हेराल्ड को दिल्ली की अदालत में चल रहे राहुल, सोनिया के खिलाफ चल रहे मामले से जोड़कर सनसनी फैलाना चाह रहे थे। मीडिया के सवालों से हार कर उन्हें मैदान छोड़ना पड़ा। हो सकता है दिल्ली के मीडिया के लिए संबित पात्रा 'यूज टू' हों। वहां उन्हें 'लाजवाब करने वाला हाजिर जवाब' प्रवक्ता माना जाता हो। लेकिन भोपाल के मीडिया ने एक स्थानीय वैध की तरह राजा के उस लड़के की बीमारी पहचान ली जिसे दुनिया भर के वैध ठीक नहीं कर पा रहे थे। तो अब इस कहानी से 'कथा ए संबित पात्रा' का दि एंड। एक राजा का राजकुमार बीमार पड़ गया। उसकी बीमारी ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही थी। दुनिया भर के वैध आकर उसे देखते, अपना इलाज करते लेकिन फर्क नहीं पड़ता था। एक दिन एक स्थानीय वैध ने राजा से गुुहार लगाई कि उसे राजकुमार का इलाज करने की इजाजत दी जाए। राजा ने 'ओके' कर दिया। वैध ने राजा से अनुरोध किया कि उसे रानी से अकेले में बात करने की इजाजत दी जाए। राजा ने मरता क्या न करता के अंदाज में इजाजत दे दी। वैध ने रानी से सीधा सवाल पूछा, 'बताओ वास्तव में यह किसका लड़का है?' अब लड़का था तो रानी का ही। लिहाजा उसने सच बताते हुए कहा कि यह भिश्ती का लड़का है जो राजमहल के कपड़े धोता है। वैध, बीमार राजकुमार के पास गया। उससे कड़क अंदाज में कहा, 'उठ बे भिश्ती की औलाद।' बस क्या था, राजकुमार ठीक। तो भैया, भाजपा के आलीशान मीडिया प्रबंधकों सुन लो, पाला स्थानीय वैध से ही पड़ना है।  

loading...

प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति