कांग्रेस का शर्मनाक सत्य



अब इसके अलावा और क्या कहा जा सकता है। मध्यप्रदेश में जिन राजनीतिक दलों की दो कौड़ी की औकात नहीं है वे भी अब गठबंधन के लिए कांग्रेस को गरियाने लगे हैं। शरद पंवार है तो मध्यप्रदेश के ही लेकिन उनके जनाधार का आधार इस राज्य से उठे बरसों हो गए। बहुजन समाजवादी पार्टी कांग्रेस को आख्ां दिखा रही है, इसे तो थोड़ा समझा जा सकता है। लेकिन फूल सिंह बरैया की लोकक्रांति दल, गोंडवान गणतंत्र पार्टी या कम्युनिस्टों के दोनों संगठन माकपा और भाकपा भी कांग्रेस से गठबंधन की बात कर रहे हैं तो मध्यप्रदेश में तो यह कांग्रेस के लिए वाकई शर्मनाक स्थिति है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच पिछले लगभग तीन दशक से आमने-सामने का सीधा मुकाबला है। प्रदेश से समाजवादियों का असर खत्म होने के बाद से ही कांग्रेस और भाजपा में सीधी लड़ाई होती रही है। प्रदेश में 1990 तक भाजपा को जरूर गठबंधन की राजनीति करना पड़ रही थी। 1990 में उसका जनता दल के साथ आखिरी बार समझौता हुआ था। तब प्रदेश की 320 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने जनता दल के लिए 32 सीटें छोड़ी थी। हालांकि तब पहली बार भाजपा ने प्रदेश में अपने बूते पर सुंदरलाल पटवा के नेतृत्व में बहुमत की सरकार बनाई थी। उसके बाद तो भाजपा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। समाजवादियों का जिन क्षेत्रों में राजनीतिक असर था उनमें से विंध्य, महाकौशल और चंबल संभाग लगभग सभी जगह पिछले तीन दशकों में भाजपा ने अपने को बहुत ताकतवर कर लिया है। यहां के पुराने समाजवादी नेता भी या तो भाजपा में समाहित हो गए या फिर कुछ कांग्रेस में चले गए। लिहाजा, इनका अब कोई नाम लेवा भी नहीं हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों का जहां तक सवाल है, अविभाजित मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ और कभी इंदौर के कुछ क्षेत्रों में उसका असर था लेकिन अब तो वो कहीं बाकी ही नहीं है। बावजूद इसके शरद यादव और फूल सिंह बरैया ने गुरूवार को अगर भोपाल में यह कहा है कि तीसरे मोर्चा के दलों को कांग्रेस से गठबंधन कर भाजपा की सरकार को प्रदेश से हटाना चाहिए तो यह हास्यास्पद ही है और कांग्रेस को इन दलों के सहयोग की जरूरत पड़ रही है तो यह कांग्रेस के लिए वाकई शर्मनाक सत्य है। बहुजन समाज पार्टी तो फिर भी प्रदेश में कम से कम छह से सात फीसदी वोटों पर अपना असर रखती है। लेकिन समाजवादी पार्टी का भी प्रदेश में कोई आधार नहीं है।


उसने 2003 और 2008 में जो सीटें जीती भी थीं तो इसलिए नहीं कि उसका कोई वोट आधार मध्यप्रदेश में मौजूद था। असल में उसके टिकट पर चुनाव लड़े नेताओं ने अपने व्यक्तिगत प्रभाव से इन सीटों पर जीत हासिल की थी। अब अगर पूर्व कांगे्रसी राजेन्द्र भारती दतिया में सपा से चुनाव जीते थे तो यह उनका अपना वोट और क्षेत्र में पकड़ थी। नारायण त्रिपाठी अगर मैहर से सपा के टिकट पर चुनाव जीते थे तो वो खुद अपने आधार पर। अब वे कांग्रेस से होते हुए भाजपा में शामिल हो चुके हैं। पिपरिया से अर्जुन पलिया ने जीत दर्ज की थी तो वो खुद उनका प्रभाव था। इसलिए अगर कांग्रेस समाजवादी पार्टी से कोई गठबंधन करेगी तो यह उसके लिए खुद को धोखा देने जैसा ही होगा। कहा तो यही जा रहा था कि कमलनाथ और मायावती की कैमेस्ट्री अच्छी है। इसलिए कमलनाथ को भरोसा है कि बसपा के साथ मध्यप्रदेश में कांग्रेस का गठबंधन आसानी से हो जाएगा। लेकिन बसपा जिस तरह मोल भाव करती आ रही है और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी महाकौशल में कांग्रेस का गणित बिगाड़ती आ रही है तो यह कांग्रेस के लिए एक तरफ कुआ और दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति होगी। जिस तरह की शर्त मायावती मध्यप्रदेश में मुसीबतों से घिरी कांगे्रस के सामने रख रही हंै, उन्हें स्वीकार करना भी कांग्रेस के लिए कम मुश्किल भरा नहीं है।  कांग्रेस असफलता के लगातार सफर के चलते लड़खड़ा चुकी है। उसे बैसाखी की जरूरत है। मध्यप्रदेश में चार विधायकों वाली बसपा से उसे आशाएं हैं। लेकिन बहनजी  ने कांग्रेस से भाईचारे के लिए जो सम्मान मांगा है, वह देश के सबसे बुजुर्ग राजनीतिक दल के लिए उलझन और शर्म का प्रतीक बन गया है।  बसपा ने जो कुछ किया, उसे कई दृष्टांतों में अपनी पर आ जाना कहा जा सकता है। जबकि कांग्रेस के साथ जो कुछ हो रहा है, वह किए को भुगतना वाला मामला है। बसपा को सम्मान के नाम पर मध्यप्रदेश में करीब चालीस सीट चाहिए। जाहिर है कि इनमें वह जगह शामिल हैं, जहां कांग्रेस की मदद से वह जीत का सपना देख रही है। आज की स्थिति में राज्य में कांग्रेस भी लगभग इतनी ही सीटों पर मजबूत दिख रही है। तो क्या वह इस सौदे को स्वीकार कर पाएगी? खासतौर से तब, जबकि इस बात की पूरी आशंका है कि सीटों के बंटवारे के चलते पार्टी के भीतर बगावत हो सकती है।


फिर, मध्यप्रदेश में किसी तरह मामला संभल भी गया तो क्या छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस को बसपा के साथ की जरूरत है? वह भी तब, जब दोनो ही जगह यह पार्टी मध्यप्रदेश की तुलना में कुछ मजबूत स्थिति में दिख रही है।  कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के बीच आलाकमान स्तर पर गठबंधन की खबरों से दोनों पार्टियोें में एक बैचेनी भी है। कांग्रेस के नेताओं को लग रहा है कि कम से कम तीस सीटों पर उसके नेताओं को चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलेगा तो ऐसे मेंं टिकट के वास्तविक दावेदार बगावत कर सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो सत्तारूढ़ भाजपा जिस तरह करती आ रही है, ऐसे नेताओं को अपना सकती है। उधर बसपा के नेताओं को लग रहा है कि गठबंधन से पार्टी को तो कोई फायदा नहीं होगा लेकिन कांग्रेस को उसका लाभ मिल जाएगा। बसपा की खासियत है कि वह अपने समर्थक वोटों को गठबंधन वाली पार्टी के पक्ष में बदल सकती है लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि कांग्रेस से गठबंधन की सूरत में कांग्रेस के वोट बसपा की झोली में आ ही जाएंगे। वो भाजपा की तरफ भी टर्नआउट हो सकते हैं। हालांकि 1998 में दिग्विजय सिंह ने बसपा से जो रणनीतिक गठबंधन किया था, उसका कांग्रेस को लाभ मिला था। उस चुनाव में जीती तो बसपा ने भी अब तक की सबसे ज्यादा सीटें थी। तब बसपा को ग्यारह विधानसभा सभा सीटों मे जीत हासिल हुई थी। लेकिन उसके जीते हुए अधिकांश उम्मीदवारों मेंं प्रभावशाली पिछड़ी जातियोें के नेता शामिल थे जो बसपा के परम्परागत वोटों के दम पर विधानसभा में पहुंच गए थे। बाद में विधानसभा के इसी कार्यकाल में बसपा के विधायक टूट कर कांग्रेस में शामिल हुए। उनमें से एक एदल सिंह कंसाना तो फिर दिग्विजय सिंह की सरकार में भी राज्यमंत्री के तौर पर शामिल किए गए थे। निश्चित तौर पर बसपा का यह अनुभव खराब रहा था। दिग्विजय सिंह को भी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ अलग हो जाने के कारण बसपा में तोड़फोड़ करना पड़ी थी। जाहिर है, बीते 15 सालों में कांग्रेस के साथ-साथ बसपा भी मध्यप्रदेश में कमजोर हुई है। और बसपा, कांग्रेस के साथ अपने पुराने अनुभवों को भी भूली नहीं होगी। उत्तरप्रदेश में अभी उसकी जो हालत हो रही है और अपने अस्तित्व की जो लड़ाई उसे लड़नी पड़ रही है, उसके कारण मध्यप्रदेश में वो कांग्रेस से तालमेल को राजी हो सकती है। लेकिन बाकी दल जो गठबंधन की वकालत कर रहे हैं, उनमें से कईयों का तो अब वजूद ही बाकी नहीं है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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