विंध्य में कांग्रेस की जमीन इसलिए खिसकी..!



राहुल गांधी गुरुवार को रीवा में कांग्रेस के चुनावी अभियान को फायनल टच देंगे। रीवा और सतना लोकसभा सीट के लिए 6 मई को वोट पड़ने हैं। कांग्रेस मुद्दतों बाद अपनी खोई हुई जमीन को वापस पाने के लिए हाड़तोड़ कोशिश कर रही है। पहले चरण में सीधी व शहड़ोल सीट के लिए 29 अप्रैल को वोटिंग हो चुकी है। पिछले चुनाव के मुकाबले सीधी में 13 प्रतिशत और शहड़ोल में 12 प्रतिशत वोट ज्यादा पड़े। बढ़े हुए वोटों को लेकर चुनाव पंडित भले ही अपना कोई आँकलन लगाएं लेकिन यहां असल मुकाबला विधानसभा चुनाव की भाँति मौन और मुखर वोटरों के बीच है। बूथ प्रबंधन और प्रचार के मामले में इस बार कांग्रेस आगे है। भाजपा में पहली बार स्थानीय नेता कांग्रेस के तर्ज पर भितरघात पर भितरघात करते नजर आए, सीधी में भी शहड़ोल में भी।  मुखर मतदाताओं में साठ से सत्तर प्रतिशत कांग्रेस की ओर दिखे तो मौन मतदाताओं का मिजाज भाँपना आसान नहीं रहा। यदि इनका रुख मुखर मतदाताओं से विपरीत जाएगा तो समझिए परिणाम वही निकलेंगे जो विधानसभा में निकल चुके हैं। बहरहाल रीवा के एसएएफ के जिस ग्राउण्ड से राहुल सतना-रीवा के मतदाताओं को संबोधित करेंगे उसी ग्राउण्ड से पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी बतौर प्रधानमंत्री जनसभा को संबोधित कर चुके हैं।  1989 में राजीव गांधी ने इसी ग्राउण्ड से वह चर्चित वक्तव्य दिया था कि केंद्र से 100 रूपये चलते हैं और यहां आते-आते वे 15 पैसे रह जाते हैं। 91 के चुनाव की सभा को राजीव गांधी ने पद्मधर पार्क में संबोधित किया था


44 डिग्री के आग उगलते तापमान में यहां जुटने वाली भीड़ से यह संकेत निकलेगा कि इस बार कांग्रेस का जोर कितना बढ़ा और चढ़ा है।  हफ्ते भर पहले मायावती की इसी ग्राउण्ड में हुई सभा फ्लाप हो चुकी है। 4 मई को अमित शाह की सभा है पर वह यहां से 18 किमी दूर गोविंदगढ़ के पोलो ग्राउण्ड में। संभव है भाजपा ने मायावती की फ्लाप भीड़ से सबक लिया हो। इस लिहाज से कांग्रेस के इस सभा की सफलता और विफलता दोनों से ही संदेश निकलेंगे जिसपर प्रेक्षकों की नजर रहेगी। राहुल गांधी का विधानसभा चुनाव के दौरान रीवा-सतना जिले में रोडशो हुआ था। इस शो का परिणाम फ्लाप रहा क्योंकि रीवा की सभी आठों सीटें भाजपा की झोली में जा गिरीं।  राहुल गाँधी के दिमाग में यह सवाल जरूर कुलबुलाएगा कि ऐसा क्यों हुआ? तब उन्हें यह बात याद दिलाने की जरूरत पड़ेगी कि विधानसभा चुनाव की सिरमौर चौराहे कि उस नुक्कड़ सभा में आपने अपने पिता राजीव गांधी की प्रतिमा के आगे यह ऐलान किया था कि विधानसभा में पैराशूट कैंडिडेट लैंड नहीं करेंगे। लेकिन आपके दिल्ली लौटते ही मध्यप्रदेश कांग्रेस के दफ्तर में ऐसी खिचड़ी पकी कि पैराशूट लैंडर प्रत्याशियों का तांता सा लग गया।  इसी रीवा जिले में रीवा, मनगँवा और देवतालाब विधानसभा क्षेत्र से वो प्रत्याशी उतारे गए जो तीन महीने पहले तक कांग्रेस का नाश मनाते रहे। सीधी के सिंगरौली से भी ऐसा ही प्रत्याशी उतारा गया। सिर्फ सतना विधानसभा क्षेत्र के पैराशूट लैंडर ने चुनाव जीतकर लाज रखी जो इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की खुलेआम कब्र खोद रहा है। मुश्किल यह है कि कांग्रेस आलाकमान इस गाढ़े वक्त में भी ठकुरसुहाती से मुक्त नहीं है।


कांग्रेस के पुनरोदय की संभावनाओं के बीच यह जान लेना जरूरी है कि जो विंध्य कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ था, जिस विंध्य ने 77 व 90 में कांग्रेस विरोधी लहर के खिलाफ सीना ताने खड़ा था उसकी आज ऐसी दुर्गति क्यों हुई? वो नेता और उनके वंशज आज कहाँ और किस हाल में हैं जो कभी विंध्य की कांग्रेस के पर्याय थे..। दरअसल कांग्रेस की दुर्गति इन राजनीतिक परिवारों की दुर्गति और उपेक्षा का गुणनफल है। कांग्रेस ने कभी अपने इतिहास से सबक नहीं लिया न दिल्ली न भोपाल और न हीं नीचे जमीन पर। इसीलिए पाँव के नीचे की जमीन खिसक गई और पता ही नहीं चला। आज इसे संक्षेप में जानिए। बघेलखण्ड कांग्रेस की बुनियाद रखने वाले तीन पुरोधा थे सरदार राजभानु सिंह तिवारी, कप्तान अवधेशप्रताप सिंह और भैय्या यादवेन्द्र सिंह। इस तिकड़ी के साथ बाद में जुड़े शहडोल से पंडित शंभूनाथ शुक्ल और सतना से शिवानंद जी। नेहरू जी ने सतना से आनंदचंद्र जोशी और बैरिस्टर गुलशेर अहमद को अपनी पसंद के साथ जोड़ा। राजभानु सिंह तिवारी (मनिकवार) रीवा के पहले सांसद हुए और उनके बेटे ब्रजराज सिंह तिवारी विधायक। एक समय ऐसा था कि सिंह तिवारियों का मतलब ही रीवा की कांग्रेस थी। राघवेन्द्र सिंह तिवारी भी इन्हीं के बीच से निकले लेकिन सबसे ज्यादा धाक थी शत्रुघ्न सिंह तिवारी की। सत्तर के दशक तक इनकी धाक प्रदेश भर में थी। इनके वंशजों ने राजनीति में जोर आजमाइश की लेकिन किनारे लगते गए। आज कोई नाम लेवा नहीं।  इस राजनीतिक परिवार की आखिरी टिकट 1993 में गुढ़ विधानसभा से ब्रजभूषण शुक्ल को मिली। ये सिंह तिवारियों के भांजे और दामाद हैं। इन्हें अब संगठन लायक भी नहीं समझा जाता।


कप्तान अवधेश प्रताप सिंह के पौत्र हर्ष सिंह, ध्रुवनारायण सिंह, को भाजपा ने मंत्री विधायक बनाया इनके प्रपौत्र विक्रम सिंह आज रामपुर बाघेलान से विधायक हैं। कांग्रेस में रहते हुए हर्ष सिंह को टिकट के लाले पड़ते थे और भाजपा उन्हें घर बैठे टिकट दे आई। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री व बिहार के राज्यपाल रहे परम मेधावी नेता गोविंदनारायण सिंह को उमर के चौथेपन में भाजपा की सदस्यता लेना पड़ी। यादवेंद्र सिंह के पुत्र वीरेन्द्र सिंह का हाल ही में निधन हुआ, ये और इनकी पत्नी जिंदगी भर कांग्रेस को सीने से चिपकाए रहीं। इनके जीते जी ही लोग भूल गए। वीरेन्द्र सिंह के निधन पर कोई बड़ा कांग्रेसी उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचा हो ऐसी बात मेरी जानकारी में नहीं आई। यादवेंद्र सिंह बघेलखण्ड कांग्रेस के अध्यक्ष व विंध्यप्रदेश के गृहमंत्री भी रहे हैं। रीवा से ही एक नाम कुँवर रुक्मणीरमण प्रताप सिंह का रहा। ये 52 से ही विधानसभा की चुनावी राजनीति में रहे।   मनगँवा से ये कांग्रेस के पाँच बार विधायक रहे। इनकी पत्नी भी विधायक चुनीं गईं। मध्यप्रदेश में विधानपुरुष का पहला खिताब इन्हीं को मिला। विधायिका बनाम कार्यपालिका जैसी चर्चित पुस्तक लिखी। एक बार पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र और राजीव गाँधी के बीच संवाद दूत का भी काम किया। पर उपेक्षा से आहत होकर 93 में भाजपा की सदस्यता लेली थी। इनके पुत्र अरुण प्रताप सिंह ने राजनीति में कुछ दिलचस्पी दिखाई पर राजनीतिक दुरभिसंधि ने इन्हें घर बैठकर वकालत करने के लिए विवश कर दिया। पंडित शंभूनाथ शुक्ल कभी कांग्रेस के जाज्वल्यमान नक्षत्र थे। विंध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।


मध्यप्रदेश बनने के बाद 67 तक प्रदेश के कैबिनेट मंत्री। 67 में इन्हें रीवा लोकसभा सीट से दिल्ली भेजा गया। आखिरी दिनों में यह गत बनी कि टिकट के लाले पड़ गए और इन्हें अवधेश प्रताप सिंह विवि. का पहला कुलपति बनकर ही संतोष करना पड़ा। ये नेता के साथ प्रखर संपादक भी रहे। इनके वंशज बाद में भाजपा मय हो गए। सतना के जिन बैरिस्टर गुलशेर अहमद की भोपाल से लेकर दिल्ली तक तूती बोलती थी उन्हें कांग्रेस के राजनीतिक चक्रव्यूह में घेरकर ऐसा मारा गया कि आखिरी समय गुमनामी में रह गए। एक बार विधायक और मंत्री रह चुके उनके बेटे सईद अहमद के नामपर अब तो टिकट के लिए विचार तक नहीं होता।  इंग्लैंड से बैरिस्टरी पढ़कर लौटे गुलशेर अहमद को पं.नेहरू ने 57 में राज्यसभा भेजा। इसके बाद ये अमरपाटन से एक चुनाव के अंतर में विधायक चुने जाते रहे। 72 से 77 तक ये मध्यप्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष रहे। 80 में सतना से चुनकर लोकसभा पहुँचे। 84 में इनके ऊपर भोपाल के अजीज कुरैशी को चढ़ाकर इनके राजनीतिक अंत की कोशिश की गई.. फिर भी बचे रहे।  नरसिंह राव ने इन्हें हिमाचल का राज्यपाल बना दिया। गुटीय क्षत्रपों को ये राज्यपाली भी नहीं सुहाई लिहाजा राजनीति के चक्रव्यूह में ऐसे उलझाया कि बेटे के विधायकी चुनाव के बीच ही राज्यपाली चली गई। पं.नेहरू की कैबिनेट में उपमंत्री रहे सतना के आनंद चंद्र जोशी सतना व सीधी से कुलमिलाकर तीनबार सांसद रहे..पर अब इनका कोई वैसे ही जिक्र नहीं करता जैसा कि संत राजनेता व विंध्यप्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष रहे शिवानंद जी का।  गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर कह गए हैं जो पीढी अपने पुरखों के योगदान की अवहेलना करती है वह भविष्य के गर्त में समा जाती है। कांग्रेस को फिर से अपनी जमीन वापस लाना है तो पुरखों की उपेक्षा और विस्मरण के अपराध का प्रायश्चित करना होगा..लेकिन अब वक्त कहाँ बचा..!

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जयराम शुक्ला

जयराम शुक्ला मध्यप्रदेश की पत्रकारिता के एक सशक्त हस्ताक्षर। राजनीति से लेकर समसामयिक विषयों पर आपकी जबरदस्त पकड़ है। लेखन शैली की विशेषता शुक्ला जी का एक अलग स्थान तय करती है। विंध्य में पत्रकारिता की पहचान और मध्यप्रदेश में वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार जयराम शुक्ला ने मुख्यधारा के तमाम बड़े अखबारों को अपने अनुभव से संवारा है।



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