क्या कांग्रेस की खोई सत्ता लौटा सकता है जातिवाद



क्या गुजरात की तर्ज पर कांग्रेस मध्यप्रदेश में जातिवादी राजनीति को उभार कर कोई राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है? क्या गुजरात की तरह मध्यप्रदेश में ऐसे कोई तत्व मौजूद हैं जो कांग्रेस की सत्ता में वापसी की उम्मीदों को जातिवाद के उफान में परवान चढ़ा सकते हैं? यह सवाल इसलिए कि प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष कमलनाथ इन दिनों लगातार अलग-अलग जाति और समाजों के लोगों से मिलकर उन्हें पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का भरोसा दिला रहे हैं। जातिगत समीकरणों का आम तौर पर सभी राजनीतिक दल चुनाव के दौरान ध्यान रखते हैं। पर बावजूद इसके उम्मीदवार के चयन में उसके जीतने की क्षमता सबसे निर्णायक तथ्य है। दलितों और आदिवासियों के लिए तो विधानसभा में सीटों का आरक्षण तय है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल ने शायद ऐसा कोई प्रयोग आज तक नहीं किया कि किसी सामान्य सीट से किसी आदिवासी नेता या दलित नेता को उम्मीदवार के तौर पर उतारा हो। लिहाजा, जातिवाद का सारा जोर पिछड़ी और अगड़ी जातियों को लुभाने के लिए ही होता रहा है। मध्यप्रदेश में आज तक तो जातियों या समुदायों के किसी काम्बीनेशन से ऐसा कोई समीकरण नहीं बन पाया है, जो किसी नेता को या राजनीतिक दल को सत्ता की चौखट तक पहुंचा सका हो। जैसा कि आम तौर पर उत्तरप्रदेश या बिहार में देखने में आता रहा है। बिहार में यादव और मुस्लिम गठजोड़ या दलित, मुस्लिम और अन्य पिछड़े वर्गों की बदौलत समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी सत्ता हासिल कर चुके हैं। या फिर बिहार में लालू यादव ने यादव,मुस्लिम गठजोड़ से डेढ़ दशक तक लगातार सत्ता को बनाए रखा। या फिर दलित और अति पिछड़े तबके के साथ अल्पसंख्यकों के सहयोग से नीतिश कुमार ने अपनी राजनीति को चमकाया। गुजरात में भाजपा और नरेन्द्र मोदी के उदय से पहले माधव सिंह सोलंकी ने खाम (क्षत्रिय, दलित, आदिवासी और मुस्लिम) जातियों के गठजोड़ से अपनी और कांग्रेस की सत्ता को स्थायित्व दिया था। लेकिन ऐसे तमाम स्थानों पर हिन्दूत्व के आधार पर जातियों को एक कर भारतीय जनता पार्टी ने जो सफलताएं हासिल की है, उसका तोड़ ले-देकर भाजपा विरोधी तमाम राजनीतिक दल जातिवादी समीकरणों में ढुंढ़ने की कोशिश करते रहे हैं।


इस मामले में मध्यप्रदेश की फितरत अलग है। कास्ट पॉलिटिक्स का थोड़ा बहुत असर उत्तरप्रदेश से सटे इलाकों में हैं। विंध्य, चंबल और बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों में जातिवाद का जोर तो हैं पर वो भी अलग तरह का है। ऐसे स्थानों में विंध्य में यदि ब्राह्मणों और ठाकुरों में परस्पर प्रतिद्वंद्विता है तो दलितों और पिछड़ों के बीच का क्लेश अलग है। ग्वालियर चंबल संभाग में भी दलित जातियों और पिछड़ों के झगड़े ज्यादा हैं। बुंदेलखंड में यह स्थिति ठाकुर वर्सेस दलित की रही है। लेकिन एकदम ऐसा कुछ नहीं है जिसका कोई बड़ा राजनीतिक लाभ किसी दल या नेता के खाते में जमा होता हो। इसलिए पहली बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जैसे पद पर आए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ को पहले तो पार्टी के पराभव पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। वो भी सिर्फ मध्यप्रदेश नहीं बल्कि देश भर के संदर्भ में। उसी में मध्यप्रदेश के प्रश्नों का भी समाधान मिल जाएगा। और अगर इन प्रश्नों को हल करने में कमलनाथ को कामयाबी मिल जाती है तो आज तो नहीं लेकिन मेहनत करके कांग्रेस मुख्यधारा की राजनीति में वापसी कर सकती है। मुख्यधारा में कहने का आशय है कि आज कांग्रेस सत्ता से बाहर होकर विपक्ष को नेतृत्व नहीं दे पा रही है बल्कि उसे क्षेत्रीय दलों के पिछलग्गू की संज्ञा हासिल हो रही है। इसलिए कमलनाथ के सामने पहला सवाल यह होना चाहिए कि आखिर कांग्रेस लोकसभा में 44 यानि दहाई में जैसे शर्मनाक आंकड़े तक कैसे अटक कर रह गई? उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे देश के बड़े राज्यों की सत्ता में, इन राज्यों में उसके राजनीतिक वर्चस्व को आखिर ग्रहण लगा तो क्यों लगा? जहां उसकी सीधी लड़ाई भाजपा से होती है, ऐसे राज्यों में गुजरात में दो दशक तो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में डेढ़ दशक से उसका सत्ता से विरह टूट क्यों नहीं पा रहा है? पूरे देश में जहां उसका कोई ताकतवर प्रतिद्वंद्वी आजादी के तीन दशकों तक पैदा नहीं हो पाया वहां ऐसा क्या हुआ कि दक्षिण के राज्यों से लेकर उत्तरपूर्व के राज्यों में छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल उसे सालों सत्ता से बाहर खदेड़े हुए हैं।


जो कांग्रेस गठबंधन की राजनीति पर कटाक्ष करते हुए , हम देंगे स्थिर सरकार और सरकार चलाना आता है के गर्वोक्त नारे दिया करती थी, वो आज हाल ही के सालों में वास्तविक तौर पर राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उभरी भाजपा से पार पाने के लिए गठबंधनों का हिस्सा बनने के पीछे क्यों भाग रही है? इस पराभव तक आने के लिए कहां-कहां गलतियां करती गर्इं कांग्रेस? इन सवालों के उत्तर खोजे बिना कमलनाथ के लिए इस बात के कोई मायने नहीं होंगे कि वे कितने समाजों या कितनी जातियों के प्रतिनिधिमंडलों से मिल कर उन्हें समुचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का भरोसा दिला पाएं हैं। सत्तर साल के कमलनाथ का कोई योगदान नहीं होगा लेकिन इतना तो कमलनाथ जानते ही होंगे कि स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने के कारण आजाद भारत में कांग्रेस का व्यापक समर्थन था। आखिर देश को आजादी दिलाने का श्रेय तो कांग्रेस के खाते में स्थायी तौर पर दर्ज है। अब ये बात अलग हो सकती है कि आजादी के बाद की कांग्रेस और आज की कांग्रेस में कितना बदलाव हो चुका है। जवाहर लाल नेहरू के बाद कांग्रेस कितनी बार टूटी है। उसका स्वरूप कैसे बदला है। यह  तो संजय गांधी के साथ जवानी की दहलीज तक जाते-जाते कमलनाथ ने देखा ही होगा। जब तक इंदिरा गांधी रहीं, तब तक भी इंदिरा गांधी, कांग्रेस और जनता के कांग्रेस पर भरोसे को कमलनाथ ने महसूस किया होगा। अपातकाल के बाद पहली  बार केन्द्र की सत्ता से कांग्रेस की बेदखली। इंदिरा  गांधी की अलोकप्रियता। और तीन ही साल में इंदिरा गांधी की लोकप्रियता के साथ सत्ता में वापसी को कमलनाथ ने देखा ही है। आखिर ये वो ही तो दौर था न जब कमलनाथ मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा से सांसद बन कर कांग्रेस की मुख्यधारा में आए थे। तब से अब तक मध्यप्रदेश में कमलनाथ की छवि कांग्रेस में किंग मेकर की रही है। क्या कमलनाथ इस बात को महसूस कर पाएंगे कि कांग्रेस की आज की हालत में उन जैसे नेताओं का भी कोई खास योगदान है? कमलनाथ, कांग्रेस में डायरेक्ट लैंड हुए नेता हैं जिन्होंने 1980 में एक जनाधार वाले नेता का हक मारा था। वो हवा में उड़ने के शौकिन संजय गांधी के बाल सखा थे इसलिए हवा में ही उड़ते हुए उन्होंने अपने लिए छिंदवाड़ा को पसंद किया था, जहां कांग्रेस का पुख्ता आधार था। छिंदवाड़ा में इसके बाद कमलनाथ का आधार भले ही मजबूती से कायम है लेकिन कांग्रेस का तो कमजोर हुआ है। (जारी)

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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