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यह दिग्विजय के लिए ‘समय का बूमरैंग’ है...!

। नाथ के कथन की टाइमिंग पर गौर कीजिए। यह लगभग पक्का है कि विकल्प की स्वतंत्रता की सूरत में दिग्विजय राजगढ़ का ही चयन करते। किंतु मुख्यमंत्री ने ऐसा होने से पहले ही उनकी इच्छा के आगे तगड़ा स्पीड ब्रेकर खड़ा कर दिया  आगे पढ़ें

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भाजपा के ‘शत्रु’ का टिकट कटना तय, फिर कहां होगा अगला ठिकाना

स्वयं सिन्हा ने भाजपा छोड़ने का हाल में संकेत देते हुए ट्वीट किया, ‘जनता से किए गए वादे अभी पूरे होने बाकी हैं...मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफिल में लेकिन हम न होंगे।’ ट्वीट में उनका संकेत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरफ है।  आगे पढ़ें

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अभिनंदन जी! बचा लीजिये मेरी नींद को सर्जिकल स्ट्राइक से

अभिनंदन, यदि आप पंजे में जा छिपे तो भी मंजर अनूठा होगा। आप बोलोगे, ‘अरे भैया! मोदीजी ने मेरे प्लेन का फ्यूल चुराकर अंबानी को दे दिया था। इसलिए प्लेन गिर पड़ा। चौकीदार पेट्रोल का चोर भी निकला।’  आगे पढ़ें

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नाथ के हाथों सेफ नहीं 'हाथ', कांग्रेस के किसान कार्ड को भाजपा ने लपका, न कर्जमाफी,न दिया कर्मचारियों-युवाओं को भत्ता

किसानों का कर्जा माफ नहीं किया जा सका है। सिर्फ कागजी कार्यवाही से किसान खुश नहीं है। बता दें कि किसानों को दो लाख रूपए तक कर्जा माफ किया जाना था। अभी तक सिर्फ बैंकों से डिफाल्टर किसानों की सूची ही जारी की गई है और जो किसान सूचियों में स्थान नहीं पा सके उनसे आवेदन भरवाए गए हंै। कई किसानों को कार्यक्रमों के जरिए कर्जमाफी के प्रमाणपत्र दिए तो गए हैं,मगर वास्तविकता इससे एकदम उलट है, क्योंकि कर्जमाफी की राशि किसानों के केसीसी खातों में स्थानांतरित नहीं की गई है। समय पर कर्जमाफी न होने से किसान खफा हैं। राजनीति विश्लेषक मानते हैं कि ये किसान भाजपा के पाले में जा सकते हैं,जिससे कांग्रेस को अत्यधिक नुकसान हो सकता है। read more  आगे पढ़ें

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नोबल ले लो, नोबल...रस्ते का माल सस्ते में

म्यामां के वह 'शांतिप्रिय' नागरिक भी क्यों नहीं इस पुरस्कार के लिए दावा करें। क्योंकि यदि वह नहीं होते तो क्या यह संभव था कि लाखों रोहिंग्या '...जैसे कोई जहाज को पंछी, पुनि जहाज पे आवे... ...' की तर्ज पर अपने मुल्क बंगलादेश को प्यार से याद कर उसकी ओर कदम बढ़ा पाते!  आगे पढ़ें

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कुछ कांग्रेसी रहेंगे लाभ में, कांग्रेस का नुकसान तय

बात भाजपा के फायदे की करें। दिग्विजय की बदौलत उसे पूर्व में भी लाभ मिलता रहा है। ऐसा ही इस बार भी होता दिख रहा है। कांपते हुए बहुमत वाली सरकार हिलती दिख रही है। वह गिरेगी नहीं। आज की तारीख में यह तय है। लेकिन हिलने की इस प्रक्रिया की लहलहाती फसल लोकसभा चुनाव में काटी जा सकती है। इसीलिए प्रमुख विपक्षी दल ने ढाई मुख्यमंत्री वाली सरकार का खलिहान तैयार कर लिया है। बड़ा शोर था कर्ज बांटने के नाम पर हुए घोटाले का। भाजपा मुश्किल में दिखती थी। नाथ और उनके मंत्री गोविंद सिंह लगातार इस दल को आंख दिखा रहे थे। लेकिन विधानसभा का सत्र केवल कांग्रेसी अंतर्द्धंद्ध की भेंट चढ़ गया। कर्ज का मर्ज भले ही चला जाए। किंतु भाजपा के ऊपर सवार हो रहा पुरानी करतूतों का एक मर्ज फिलहाल कहीं दूर जा छिपा है।  आगे पढ़ें

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आखिर, किससे खतरा था अलगाववादियों को?

सच कहें तो वोटवादी राजनीति में पगे भारत में अलगाववादियों के लिए किसी किस्म का खतरा रहा ही नहीं। लेकिन सरकारें हर साल उनकी हिफाजत के नाम पर दस करोड़ रुपया फूंकती चली गयीं। क्योंकि गणित वोट का था, सरकारी पैसे की बर्बादी का नहीं। लेकिन पुलवामा कांड के बाद सुरक्षा वापस लेने का क्या कोई असर होगा? नहीं। दुर्भाग्य से वैसा असर तो शायद ही हो पाए, जैसा यह देश देखना चाहता है। उसे कश्मीर में रहकर पाकिस्तान की हिमायत करने वालों के डर से पीले पड़े चेहरे देखने की चाहत है। मुल्क-विरोधी अघोषित सहोदरों के जिस्म और रूह पर कानून एवं व्यवस्था के डंडे से लगी चोट उभरती नजर आने की उसकी इच्छा है। यकीनन इसे आप प्रतिशोध का अतिरेक कह सकते हैं, लेकिन अतिरेक और कैसा-कैसा होता है, यह भी तो जान लीजिए। अतिरेक वह भी है, जिसमें घाटी में तैनात सेना के किसी जवान का सिर फोड़कर उसे मरने की हालत में पहुंचा दिया जाए। यह प्रक्रिया वह भी होती है, जिसके तहत निर्दोष लोगों का सरेराह नरसंहार करने वालों को आजादी के लड़ाके कहकर महिमामंडित किया जाता है।read more  आगे पढ़ें

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कमलनाथ और शिवराज का अंतर

मैं यह कह सकता हूं कि शिवराज सिंह चौहान से मेरी अच्छी पहचान और दोस्ती रही है। उन्हीं के कहे के मुताबिक मैं उन लोगों में से एक हूं जो शिवराज के दिल में रहता हैं। पर पिछले तेरह साल में मैं उनसे तेरह बार भी शायद ही मिला हूं। और जब मिला भी तो उन्हें चंद मिनटों बाद घड़ी की तरफ देखते पाया। मुख्यमंत्री के साथ ऐसा हो सकता है। यारी दोस्ती क्या करें, आखिर पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी का मामला जो ठहरा। पर अब तक मैं कमलनाथ से जब भी मिला हूं, वे पर्याप्त बतियाएं, खुल कर बोले और घड़ी उन्हें देखनी नहीं पड़ी, क्योंकि मैं जब भी मिला वे व्यस्त होने के बावजूद फुर्सत में थे। पता नहीं कैसे राजनीतिज्ञ है कमलनाथ, बहुत बेलाग बोलते हैँ और खुल कर सामने आते हैं। बोल दिया आफ दि रिकार्ड तो मान लेते हैं कि ऐसा ही होगा। शिवराज के पास आफ दि रिकार्ड और आन दि रिकार्ड कुछ है ही नहीं। मीडिया के अपने मित्रों में शिवराज अकेले में बहुत असहज दिखते हैं। सार्वजनिक तौर पर वे सहज हैं।  आगे पढ़ें

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नाथ को बधाई और सिंधिया को साधुवाद

ज्योतिरादित्य ने इस चुनाव में शिवराज से अपने साथ-साथ अपने पूर्वजों के अपमान का भी बदला ले लिया। सिंधिया राजघराने को लेकर शिवराज ने बीते कम से कम दो साल में जमकर आग उगली थी। जाहिर है कि वह जूनियर सिंधिया की प्रदेश में पहले बढ़ी सक्रियता और फिर पांव पसारती ताकत से डरे हुए थे। इसलिए यह चुनाव भाजपा ने ‘शिवराज बनाम महाराज’ कर दिया था। ग्वालियर-चंबल सहित अपने प्रभाव वाले अन्य क्षेत्रों में सिंधिया ने भाजपा को जमकर नुकसान पहुंचाया। बदला पूरा हुआ तो मुख्यमंत्री पद के लिए बलिदान भी दे दिया। सिंधिया के समर्थक भले ही उनके मुख्यमंत्री न बन पाने का मलाल पाले बैठे होंगे, किंतु जयविलास पैलेस की दीवारों का स्पर्श कर सिंधिया अवश्य ही इस बात की खुशी मनाएंगे कि राजघराने के खिलाफ उठी आवाज को कम से कम पांच साल के लिए खामोश कर दिया गया है। read more  आगे पढ़ें

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नेताओं की सिर-फुटौव्वल का इंतजाम कर गए राहुल

पहले से ही मजबूत जगहों पर गांधी के जाने का क्या तुक था। उन्हें वहां जाना चाहिए था, जहां पार्टी इन तीन सीटों की तुलना में कमजोर है। कांग्रेस की बीते पंद्रह साल की दशा और दिशा के चलते गांधी को ऐसी सीटें ढूंढने में कोई समय भी नहीं लगता। लेकिन आमंत्रण देने और कार्यक्रम तय करने वालों की मनमर्जी के चलते इन सभाओं का कोई खास असर होता नजर नहीं आता। अब कांग्रेस में गांधी के खिलाफ भला कोई क्या बोलेगा। इसलिए कमजोर स्थिति वाले प्रत्याशी लाठी लेकर उन कर्णधारों को ही ढूंढते रह जाएंगे, जिन्होंने गांधी को बुलाया था।  आगे पढ़ें

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