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विंध्य में कांग्रेस की जमीन इसलिए खिसकी..!

राहुल गांधी का विधानसभा चुनाव के दौरान रीवा-सतना जिले में रोडशो हुआ था। इस शो का परिणाम फ्लाप रहा क्योंकि रीवा की सभी आठों सीटें भाजपा की झोली में जा गिरीं। राहुल गाँधी के दिमाग में यह सवाल जरूर कुलबुलाएगा कि ऐसा क्यों हुआ? तब उन्हें यह बात याद दिलाने की जरूरत पड़ेगी कि विधानसभा चुनाव की सिरमौर चौराहे कि उस नुक्कड़ सभा में आपने अपने पिता राजीव गांधी की प्रतिमा के आगे यह ऐलान किया था कि विधानसभा में पैराशूट कैंडिडेट लैंड नहीं करेंगे। लेकिन आपके दिल्ली लौटते ही मध्यप्रदेश कांग्रेस के दफ्तर में ऐसी खिचड़ी पकी कि पैराशूट लैंडर प्रत्याशियों का तांता सा लग गया। इसी रीवा जिले में रीवा, मनगँवा और देवतालाब विधानसभा क्षेत्र से वो प्रत्याशी उतारे गए जो तीन महीने पहले तक कांग्रेस का नाश मनाते रहे। सीधी के सिंगरौली से भी ऐसा ही प्रत्याशी उतारा गया। सिर्फ सतना विधानसभा क्षेत्र के पैराशूट लैंडर ने चुनाव जीतकर लाज रखी जो इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की खुलेआम कब्र खोद रहा है। मुश्किल यह है कि कांग्रेस आलाकमान इस गाढ़े वक्त में भी ठकुरसुहाती से मुक्त नहीं है। read more  आगे पढ़ें

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तेरा निजाम है, सिल दे जुबाने-कायर को....

इस माहौल में नैतिकता का तत्व तलाशना चील के घोंसले में मांस की खोज जैसा निरर्थक प्रयत्न बन चुका है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में मोहम्मद आजम खान जैसी घोर अनैतिकता तो भोजन करते समय किसी का मल दिख जाने जैसी असहनीय है।  आगे पढ़ें

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तेरा निजाम है, सिल दे जुबाने-कायर को....

देश की राजनीति यूं भी अधोपतन के चरम तक पहुंच चुकी है। इस माहौल में नैतिकता का तत्व तलाशना चील के घोंसले में मांस की खोज जैसा निरर्थक प्रयत्न बन चुका है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में मोहम्मद आजम खान जैसी घोर अनैतिकता तो भोजन करते समय किसी का मल दिख जाने जैसी असहनीय है।  आगे पढ़ें

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तुझ को मालुम है कल क्या होगा...?

वायनाड लोकसभा सीट को कांग्रेस का मजबूत गढ़ बताया जा रहा है। इस लोकसभा क्षेत्र का अस्तित्व परीसीमन के बाद 2009 में हुआ है। यानि यहां कुल दो लोकसभा चुनावों का इतिहास है। 2009 में तो कांग्रेस उम्मीदवार ने यहां सीपीआई के उम्मीवार को दो लाख से ज्यादा वोटों से चुनाव हराया था। और 2014 के लोकसभा चुनाव में यही कांग्रेस उम्मीदवार मात्र बीस हजार वोटों से चुनाव जीत पाया था। इसमें मजेदार तथ्य यह है कि इस चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार को अस्सी हजार से ज्यादा वोट हासिल हुए थे। जातीय समीकरण की बात करें तो यहां 49.48% हिंदू, 28.65% मुस्लिम समुदाय और 21.34% ईसाई समुदाय की आबादी निवास करती है। जिले की कुल जनसंख्या में अनुसूचित जाति (एससी) की आबादी 3.99 फीसदी और अनुसूचित जनजाति (एसटी) की तादाद 18.53 फीसदी है। जिले की कुल आबादी में से 96.14 प्रतिशत लोग शहरी इलाकों में और 3.86 प्रतिशत लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।  आगे पढ़ें

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केवल गणित का नहीं है मामला

दिग्विजय सिंह कब आत्माघाती तेवर अपना लें कहना मुश्किल है। हालिया एक बयान में उन्होंने कहा है कि भाजपा और उसके नेता उनसे डरते हैं। यह हास्यास्पद है। उस चिड़िया की तरह जो अपने पैर ऊपर की ओर करके सोती है। जनश्रुति है कि ऐसा कर वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि यदि रात को आसमान गिर पड़ा तो वह अपने पैर पर उसे थाम लेगी। यही दिग्विजय सिंह की सोच बन गयी दिखती है। वह भाजपा के लिए डर नहीं, बल्कि सहूलियत का माध्यम बन चुके हैं। ओसाम जी से लेकर पुलवामा दुर्घटना, भगवा आतंकवाद, जाकिर हुसैन से लेकर लंबी फेहरिस्त है जिसे भाजपा भोपाल के लोगों को याद कराना चाहेगी। भाजपा दिग्विजय के ऐसे तेवरों में उनके दस साल के कार्यकाल की असफलताओं का तड़का लगाने में हर बार कामयाब रही है। राज्य में लगातार तीन चुनाव जीतते समय भाजपा के लिए यह सबसे लाभ का सौदा होता रहा कि दिग्विजय की विफलताओं को गिनाकर उन्हें अपने हक में भुना ले। लिहाजा उनसे यह उम्मीद बेमानी है कि इस उम्र में वह अपने स्वभाव में तब्दीली ला सकें। भाजपा इसका लाभ उठाने से नहीं चूकेगी। अब देखने वाली बात यह है कि राजनीतिक वानप्रस्थ से ऐन पहले इस विराट चुनौती को स्वीकारने वाले दिग्विजय क्या कोई करिश्मा कर पाएंगे? वो कर सकते हैं इसमें संशय नहीं है लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। read more  आगे पढ़ें

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आखिर, इन दोपायों की फितरत का दोष किसके सिर मढ़ें...!

आखिर इस सबका दोषी कौन है! क्या मूलत: यह गलती सेना के उन चालीस शूरवीर जवानों की है, जो उस साल शहीद हो गये, जब देश आम चुनाव की तैयारी में लगा हुआ था! क्योंकि और कोई तो गलत नजर आता ही नहीं। हरिप्रसाद शान से कांग्रेस की शान बने हुए हैं। पुलवामा आतंकी हमले को हादसा बताने वाले दिग्विजय मजे में लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। प्रोफेसर रामगोपाल के बचाव में भतीजे अखिलेश यादव ट्विटर पर मोर्चा खोल बैठे हैं तो सैम पित्रोदा केवल इस मायने में अकेले नजर आए कि उनकी पार्टी ने उनके बयान से पल्ला झाड़ लिया है।  आगे पढ़ें

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यह दिग्विजय के लिए ‘समय का बूमरैंग’ है...!

। नाथ के कथन की टाइमिंग पर गौर कीजिए। यह लगभग पक्का है कि विकल्प की स्वतंत्रता की सूरत में दिग्विजय राजगढ़ का ही चयन करते। किंतु मुख्यमंत्री ने ऐसा होने से पहले ही उनकी इच्छा के आगे तगड़ा स्पीड ब्रेकर खड़ा कर दिया  आगे पढ़ें

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भाजपा के ‘शत्रु’ का टिकट कटना तय, फिर कहां होगा अगला ठिकाना

स्वयं सिन्हा ने भाजपा छोड़ने का हाल में संकेत देते हुए ट्वीट किया, ‘जनता से किए गए वादे अभी पूरे होने बाकी हैं...मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफिल में लेकिन हम न होंगे।’ ट्वीट में उनका संकेत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरफ है।  आगे पढ़ें

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अभिनंदन जी! बचा लीजिये मेरी नींद को सर्जिकल स्ट्राइक से

अभिनंदन, यदि आप पंजे में जा छिपे तो भी मंजर अनूठा होगा। आप बोलोगे, ‘अरे भैया! मोदीजी ने मेरे प्लेन का फ्यूल चुराकर अंबानी को दे दिया था। इसलिए प्लेन गिर पड़ा। चौकीदार पेट्रोल का चोर भी निकला।’  आगे पढ़ें

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नाथ के हाथों सेफ नहीं 'हाथ', कांग्रेस के किसान कार्ड को भाजपा ने लपका, न कर्जमाफी,न दिया कर्मचारियों-युवाओं को भत्ता

किसानों का कर्जा माफ नहीं किया जा सका है। सिर्फ कागजी कार्यवाही से किसान खुश नहीं है। बता दें कि किसानों को दो लाख रूपए तक कर्जा माफ किया जाना था। अभी तक सिर्फ बैंकों से डिफाल्टर किसानों की सूची ही जारी की गई है और जो किसान सूचियों में स्थान नहीं पा सके उनसे आवेदन भरवाए गए हंै। कई किसानों को कार्यक्रमों के जरिए कर्जमाफी के प्रमाणपत्र दिए तो गए हैं,मगर वास्तविकता इससे एकदम उलट है, क्योंकि कर्जमाफी की राशि किसानों के केसीसी खातों में स्थानांतरित नहीं की गई है। समय पर कर्जमाफी न होने से किसान खफा हैं। राजनीति विश्लेषक मानते हैं कि ये किसान भाजपा के पाले में जा सकते हैं,जिससे कांग्रेस को अत्यधिक नुकसान हो सकता है। read more  आगे पढ़ें

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