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कमलनाथ और शिवराज का अंतर

मैं यह कह सकता हूं कि शिवराज सिंह चौहान से मेरी अच्छी पहचान और दोस्ती रही है। उन्हीं के कहे के मुताबिक मैं उन लोगों में से एक हूं जो शिवराज के दिल में रहता हैं। पर पिछले तेरह साल में मैं उनसे तेरह बार भी शायद ही मिला हूं। और जब मिला भी तो उन्हें चंद मिनटों बाद घड़ी की तरफ देखते पाया। मुख्यमंत्री के साथ ऐसा हो सकता है। यारी दोस्ती क्या करें, आखिर पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी का मामला जो ठहरा। पर अब तक मैं कमलनाथ से जब भी मिला हूं, वे पर्याप्त बतियाएं, खुल कर बोले और घड़ी उन्हें देखनी नहीं पड़ी, क्योंकि मैं जब भी मिला वे व्यस्त होने के बावजूद फुर्सत में थे। पता नहीं कैसे राजनीतिज्ञ है कमलनाथ, बहुत बेलाग बोलते हैँ और खुल कर सामने आते हैं। बोल दिया आफ दि रिकार्ड तो मान लेते हैं कि ऐसा ही होगा। शिवराज के पास आफ दि रिकार्ड और आन दि रिकार्ड कुछ है ही नहीं। मीडिया के अपने मित्रों में शिवराज अकेले में बहुत असहज दिखते हैं। सार्वजनिक तौर पर वे सहज हैं।  आगे पढ़ें

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नाथ को बधाई और सिंधिया को साधुवाद

ज्योतिरादित्य ने इस चुनाव में शिवराज से अपने साथ-साथ अपने पूर्वजों के अपमान का भी बदला ले लिया। सिंधिया राजघराने को लेकर शिवराज ने बीते कम से कम दो साल में जमकर आग उगली थी। जाहिर है कि वह जूनियर सिंधिया की प्रदेश में पहले बढ़ी सक्रियता और फिर पांव पसारती ताकत से डरे हुए थे। इसलिए यह चुनाव भाजपा ने ‘शिवराज बनाम महाराज’ कर दिया था। ग्वालियर-चंबल सहित अपने प्रभाव वाले अन्य क्षेत्रों में सिंधिया ने भाजपा को जमकर नुकसान पहुंचाया। बदला पूरा हुआ तो मुख्यमंत्री पद के लिए बलिदान भी दे दिया। सिंधिया के समर्थक भले ही उनके मुख्यमंत्री न बन पाने का मलाल पाले बैठे होंगे, किंतु जयविलास पैलेस की दीवारों का स्पर्श कर सिंधिया अवश्य ही इस बात की खुशी मनाएंगे कि राजघराने के खिलाफ उठी आवाज को कम से कम पांच साल के लिए खामोश कर दिया गया है। read more  आगे पढ़ें

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नेताओं की सिर-फुटौव्वल का इंतजाम कर गए राहुल

पहले से ही मजबूत जगहों पर गांधी के जाने का क्या तुक था। उन्हें वहां जाना चाहिए था, जहां पार्टी इन तीन सीटों की तुलना में कमजोर है। कांग्रेस की बीते पंद्रह साल की दशा और दिशा के चलते गांधी को ऐसी सीटें ढूंढने में कोई समय भी नहीं लगता। लेकिन आमंत्रण देने और कार्यक्रम तय करने वालों की मनमर्जी के चलते इन सभाओं का कोई खास असर होता नजर नहीं आता। अब कांग्रेस में गांधी के खिलाफ भला कोई क्या बोलेगा। इसलिए कमजोर स्थिति वाले प्रत्याशी लाठी लेकर उन कर्णधारों को ही ढूंढते रह जाएंगे, जिन्होंने गांधी को बुलाया था।  आगे पढ़ें

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तेलंगाना चुनाव: महिलाओं को टिकट देने के मामले में सभी राजनीतिक दल पीछे

संसद में महिला आरक्षण बिल का समर्थन करने वाले मुख्य राजनीतिक दल तेलंगाना विधानसभा चुनाव में महिलाओं को टिकट देने में पीछे नजर आ रहे हैं। कांग्रेस की 100 उम्मीदवारों सूची में सिर्फ 11 महिलाओं का नाम शामिल है  आगे पढ़ें

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ये सत्ता का पैसा बोल रहा है या अमित शाह का अविश्वास.....

अब ये शिवराज सिंह चौहान या नरेन्द्र सिंह तोमर कैसे भूल सकते हैं कि कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवाल (ये प्रतीक हैं, नाम तो कई और भी हो सकते हैं) ने पीरगेट के साधारण से कार्यालय में बैठकर कैसे पार्टी को प्रदेश में कांग्रेस का सशक्त विकल्प बनाया। निश्चित तौर पर तीन बार की सरकार होने के बाद भाजपा के सामने चुनौतियां बड़ी हैं। मीडिया का भी विस्तार हुआ है। लेकिन ऐसा भी तो नहीं हुआ है कि पार्टी को बाईस कमरों वाला एक पूरा होटल किराए पर लेकर मीडिया सेंटर बनाना पड़ गया। ये सत्ता का पैसा बोल रहा है? अमित शाह का अविश्वास बोल रहा है? या अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की धमक ने मध्यप्रदेश की सशक्त भाजपा के सफल नेताओं का सारा व्यक्तित्व ही लिजजिला कर छोड़ा है।read more  आगे पढ़ें

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राफेल पर कुछ धीरज धरे कांग्रेस

कल की ही बात लीजिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस सौदे को लेकर तमाम जानकारी सरकार से तलब की। राहुल गांधी ने तुरंत कोर्ट को भी लपेटे में ले लिया। प्रकारांतर से कहा कि यह सब मोदी की सहूलियत के लिए किया जा रहा है। किसी प्रतिष्ठित संस्था पर कांग्रेस के इस तरह से सार्वजनिक आक्षेप का यह पहला मौका नहीं है। यह पार्टी पूर्व में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भी इसी तरह अंगुली उठा चुकी है। मामला हर बार शोर मचाने जैसा होता है। कई प्रहसन इतने फूहड़ कि एक फिल्म का शीर्षक ‘चोर मचाए शोर’ याद आ जाता है। read more  आगे पढ़ें

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सिंधिया के चुनाव लड़ने के संकेत से कांग्रेस में बढ़ सकती है कलह

सिंधिया के इस संकेत से कांग्रेस में घमासान मचना तय है। असल में यह माना जा रहा है कि कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में सिंधिया के मुख्यमंत्री बनने की संभावना ज्यादा है। हालांकि कांग्रेस ने अभी तक प्रदेश में घोषित तौर पर किसी का भी मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार के तौर पर जनता के बीच नाम आगे नहीं बढ़ाया है। लेकिन सिधिंया के इस संकेत से कमलनाथ को भी विधानसभा चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी करना पड़ सकती है। कमलनाथ भी मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार हैं। हालांकि विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस के किसी भी प्रदेशाध्यक्ष ने विधानसभा चुनाव लड़ने से परहेज किया है।read more  आगे पढ़ें

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कांग्रेस में अब कांग्रेस का ही कौन बचा है....?

फिर राजीव गांधी के ही दौर में शाहबानो प्रकरण में भी कांग्रेस ने भले ही राम मंदिर मसले से उपजे असंतोष को थामने के लिए कट्टरपंथी मुस्लिमों को खुश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल दिया। इससे एक नुकसान कांग्रेस को यह हुआ कि जो प्रगतिशील मुस्लिम हैं, वो भी नाराज हुए। और कांग्रेस से मुस्लिमों का जो भरोसा उठा तो आज तक दोबारा कायम नहीं हो पाया। भले ही फिर सोनिया गांधी बटाला हाउस एनकाउंटर में मारे गए आतंकवादी के घर आजमगढ़ तक हो आईं हो। या फिर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के तौर पर यह कह चुके हों कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमोंं का है। या फिर कांग्रेस ने खुद यह माना हो कि उसकी दुर्गति का कारण उसकी प्रो मुस्लिम राजनीति रही है। read more  आगे पढ़ें

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क्या कांग्रेस की खोई सत्ता लौटा सकता है जातिवाद

इस मामले में मध्यप्रदेश की फितरत अलग है। कास्ट पॉलिटिक्स का थोड़ा बहुत असर उत्तरप्रदेश से सटे इलाकों में हैं। विंध्य, चंबल और बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों में जातिवाद का जोर तो हैं पर वो भी अलग तरह का है। ऐसे स्थानों में विंध्य में यदि ब्राह्मणों और ठाकुरों में परस्पर प्रतिद्वंद्विता है तो दलितों और पिछड़ों के बीच का क्लेश अलग है। ग्वालियर चंबल संभाग में भी दलित जातियों और पिछड़ों के झगड़े ज्यादा हैं। बुंदेलखंड में यह स्थिति ठाकुर वर्सेस दलित की रही है। लेकिन एकदम ऐसा कुछ नहीं है जिसका कोई बड़ा राजनीतिक लाभ किसी दल या नेता के खाते में जमा होता हो। इसलिए पहली बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जैसे पद पर आए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ को पहले तो पार्टी के पराभव पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। read more  आगे पढ़ें

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कांग्रेस का शर्मनाक सत्य

बावजूद इसके शरद यादव और फूल सिंह बरैया ने गुरूवार को अगर भोपाल में यह कहा है कि तीसरे मोर्चा के दलों को कांग्रेस से गठबंधन कर भाजपा की सरकार को प्रदेश से हटाना चाहिए तो यह हास्यास्पद ही है और कांग्रेस को इन दलों के सहयोग की जरूरत पड़ रही है तो यह कांग्रेस के लिए वाकई शर्मनाक सत्य है। बहुजन समाज पार्टी तो फिर भी प्रदेश में कम से कम छह से सात फीसदी वोटों पर अपना असर रखती है। लेकिन समाजवादी पार्टी का भी प्रदेश में कोई आधार नहीं है। उसने 2003 और 2008 में जो सीटें जीती भी थीं तो इसलिए नहीं कि उसका कोई वोट आधार मध्यप्रदेश में मौजूद था। असल में उसके टिकट पर चुनाव लड़े नेताओं ने अपने व्यक्तिगत प्रभाव से इन सीटों पर जीत हासिल की थी। read more  आगे पढ़ें

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