शख्सियत: बटुकेश्वर दत्त



जन्म : 18 नवंबर, 1910 निधन : 20 जुलाई, 1965 भारतीय स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त का जन्म बंगाल के औरी गांव में हुआ था। उन्हें लोग बट्टू दत्त और मोहन के नाम से भी जानते थे। जब उन्होंने सेंट्रल असेंबली पर बम फेंका, तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, तो वे देश भर में चर्चित हो गए थे। उन्होंने कानपुर के पीपीएन कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपबल्किन आर्मी चंद्रशेखर आजाद ने 1928 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपबल्किन आर्मी की स्थापन की। उसमें बटुकेश्वर दत्त भी एक महत्त्वपूर्ण सदस्य के रूप में जुड़े। उन्होंने इस संगठन में रह कर कई क्रांतिकारी कार्य किए। वे संगठन की गतिविधियों में सीधे तौर पर शामिल थे। आगरा में बम फैक्ट्री भगत सिंह, सुखदेव, और राजगुरु की टोली में चौथे सदस्य बटुकेश्वर दत्त थे, जिन्हें फांसी नहीं, बल्कि काला पानी की सजा दी गई। उन्होंने संसद पर भगत सिंह के साथ बम ही नहीं फेंका था, बल्कि उस समय आगरा में एक बम फैक्ट्री स्थापित की गई थी जिसमें बटुकेश्वर ने बहुत सहयोग दिया। उन्होंने वहां से बम बनाना सीखा।


इसके बाद उन्होंने कई और क्रांतिकारी कार्य किए। यहीं से प्रशिक्षण लेने के बाद बटुकेश्वर दत्त ने संसद पर बम फेंका था। चूंकि भगत सिंह पर सांडर्स की हत्या का आरोप भी था, इसलिए उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई, पर बटुकेश्वर दत्त को काला पानी की सजा। बटुकेश्वर दत्त जब निराश हुए संसद पर बम फेंकने के बाद बटुकेश्वर को फांसी नहीं हुई, तो वे बहुत निराश हुए। उन्होंने भगत सिंह को पत्र लिखा- ‘वतन पर शहीद होना ज्यादा फख्र की बात है।’ भगत सिंह ने उनको जवाब में लिखा- वे दुनिया को ये दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते, बल्कि जीवित रह कर जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर तरह की यातना भी सहन कर सकते हैं। उपेक्षा के शिकार पेशे से मजिस्ट्रेट अनिल वर्मा ने बटुकेश्वर दत्त पर एक किताब लिखी, जिसमें उन्होंने बताया है कि 1945 में उन्हें रिहाई मिलने के बाद उन्होंने विवाह कर लिया। आजाद देश में उनके सामने कोई और उद्देश्य नहीं था। उन्होंने विवाह किया और अपनी गृहस्थी जमाने में लग गए। पर आजाद भारत में उन्हें बेहतर रोजगार के लिए दर-दर भटकना पड़ा।


उन्हें सिगरेट कंपनी में एजंट के रूप में और फिर गाइड का काम करना पड़ा। बाद में उन्होंने डबलरोटी और बिस्कुट का कारखाना खोला, लेकिन वह भी ठीक से नहीं चला। उन्हें 1964 में विधान परिषद का सदस्य बनाया गया, लेकिन जीवनयापन में सुधार नहीं आया। आजादी के बाद बटुकेश्वर दत्त को उपेक्षा का जीवन जीना पड़ा। सपने में भी नहीं सोचा था 1964 में बटुकेश्वर बीमार पड़ गए। तब पटना के सरकारी अस्पताल में उनका इलाज कराया गया। वहां उनके उपचार में लापरवाही बरती गई। क्रांतिकारी चमनलाल ने एक लेख में लिखा कि इस देश में कोई क्रांतिकारी पैदा ही नहीं होना चाहिए। इस लेख की प्रतिक्रिया यह हुई कि पंजाब सरकार ने उन्हें इलाज के लिए दिल्ली भेजा। सफदरजंग अस्पताल में उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस दिल्ली की असेंबली में मैंने बम फेंक कर इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए थे वहां मैं अपाहिज की तरह लाया जाऊंगा। निधन 1965 में बटुकेश्वर दत्त का कैंसर की वजह से निधन हो गया। दत्त की अंतिम इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार भगत सिंह की समाधि के बगल में किया गया।

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