ताकतवर से टकराकर ही ताकत पायी ममता ने



ममता बनर्जी एक बार फिर चर्चा में हैं। पश्चिम बंगाल में अमित शाह की रैली में राज्य पुलिस के अड़ंगे के चलते। इससे पहले जारी आम चुनाव में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे टकराव का कोई मौका नहीं छोड़ा। दरअसल, यह बनर्जी की खास  शैली है। उन्होंने हमेशा से अपने से ताकतवर व्यक्ति/संस्था को ही चुनौती दी। खास बात यह कि अधिकांश मामलों में अंतत: वह आगे बढ़ने में ही कामयाब रहीं। आइए ममता के इस उग्र स्वभाव और उसके नतीजे वाले रोचक सफर पर एक नजर डालते हैं-  - कांग्रेस में रहते हुए ममता ने खासा कद हासिल किया। वह बार देश की रेल मंत्री रहीं। इस मंत्रालय के साथ ही वह कोयला मंत्रालय संभालने वाली भी पहली महिला मंत्री हैं। इस दौरान पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी का शासन था। ऐसी सरकार, जिसके लिए यह मशहूर था कि वह हार नहीं सकती और यह कुख्याती भी उसके खाते में थी कि विरोधी को परास्त करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है


ममता ने राज्य में सीधे वामपंथी शासन से संघर्ष शुरू किया। वह भी तब, जब राज्य के अधिकांश कांग्रेसी दिग्गज भी माकपा के नाम से कांपते थे।  - कभी कांग्रेस तो कभी एनडीए की सवारी का आनंद लेते हुए ममता ने कहीं ओर का ही लक्ष्य तय कर रखा था। आज की तारीख में यह साफ महसूस किया जा सकता है कि उनकी नजर प्रधानमंत्री पद की ओर थी। लेकिन इसके लिए बहुत मजबूत आधार जरूरी था। इसलिए ममता ने तृणमूल कांग्रेस पार्टी की स्थापना की।  - वामपंथी शासन के दौरान पश्चिम बंगाल में सिंगूर तथा नंदीग्राम जैसे मामले हुए। दोनो में विवाद लोगों की जमीन लिए जाने का था। सिंगूर से टाटा जैसा आर्थिक रूप से शक्तिशाली औद्योगिक घराना जुड़ा हुआ था। इधर, नंदीग्राम की जमीन इंडोनेशिया के सलीम  ग्रुप को दी जाना थी। सिंगूर में ममता  ने जमीन आवंटन के खिलाफ लम्बी लड़ाई लड़कर राज्य के किसानों का विश्वास हासिल किया।


नंदीग्राम में पुलिस की गोली से चौदह लोगों की मौत के बाद राज्य सरकार के विरुद्ध ममता एक बार फिर सक्रिय रहीं। इससे हुआ यह कि राज्य में वामपंथी शासन के खिलाफ झगड़ालू प्रवृत्ति की एक क्षमता वाला चेहरा सामने आ गया। नतीजा यह कि ममता ने राज्य की 29 साल पुरानी वामपंथी सरकार को हटा दिया। बीते आठ साल से वह इस राज्य की मुख्यमंत्री हैं।  - ममता की बहुत बड़ी ताकत यह कि वह अपने समर्थकों का अंत तक साथ देती हैं। पश्चिम बंगाल में अवैध रूप से रह रहे लाखों बंगलादेशियों को शरण प्रदान करने के मसले पर उन्होंने नेशनल सिटीजन रजिस्टर के विरोध में मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। सारदा तथा रोजवैली जैसे कुख्यात आर्थिक घोटाले में संलिप्तता के आरोपी अपने मंत्रियों के हक में वह आज भी सीना तानकर खड़ी हुई हैं। यह तो याद ही होगा कि हाल ही में कोलकाता के तत्कालीन पुलिस आयुक्त राजीव कुमार के सीबीआई से टकराव पर खुद ममता धरने पर बैठ गयी थीं।


  - ममता की किलर इंस्टिंक्ट भयावह होने की हद तक प्रभावी है। वह किसी भी कीमत पर अपनी निंदा नहीं सुन सकतीं। तीन साल पहले एक टीवी चैनल द्वारा राज्य के दंगा प्रभावित इलाकों की रिपोर्टिंग करने पर ममता ने उसके रिपोर्टर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करवा दिया था। क्योंकि इस खबर में बताया गया था कि दंगे में ममता सरकार की भूमिका संदिग्ध है।  - तमाम आलोचनाओं एवं अदालती लड़ाई में लगातार हार के बावजूद ममता की बतौर मुख्यमंत्री कोशिश रही है कि वह राज्य में मोहर्रम के ताजियों के विजर्सन के लिए दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन  रोक दें। प्रदेश के एक बेहद पुराने शिव मंदिर का संचालन अपने कट्टर मुस्लिम समर्थक को देकर उन्होंने सनसनी फैला दी थी। ममता ने बीते साल रामनवमी के जुलूस पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि इससे राज्य का साम्प्रदायिक सौहार्द्र खराब होगा।  यानी ममता तुष्टिकरण की राजनीति में भी महारत हासिल कर चुकी हैं।


  - बनर्जी को आप शॉर्ट टैम्पर्ड भी कह सकते हैं। तुनकमिजाजी के चलते एक 1998 में उन्होंने संसद में समाजवादी पार्टी के सांसद दरोगा प्रसाद सरोज को कॉलर पकड़कर गर्भगृह से बाहर धक्का दे दिया था।  - ममता निणुण अवसरवादी भी हैं। सांसद  रहते हुए उन्होंने पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की थी। मुख्यमंत्री बनने के बाद अब वह इन घुसपैठियों की मसीहा बन बैठी हैं। बता दें कि मामला वोट का है, क्योंकि अधिकांश घुसपैठियो के नाम गलत तरीके से मतदाता सूची में दर्ज करवाए जा चुके हैं।  - इस चुनाव में नजारा रोचक है। कांग्रेस अपनी दम पर स्पष्ट बहुमत हासिल करती नजर नहीं आ रही। भाजपा-विरोधी दलों की सरकार बनने के आसार हैं। यह हालात गये साल से ही दिखने लगे थे। ममता ने तब ही से मोदी के खिलाफ लड़ाकू तेवर और तीखे कर दिये। बीच चुनाव उन्होंने मोदी को थप्पड़ मारने की बात तक कह दी। वह कांग्रेस के खिलाफ भी लगातार आग उगल रही हैं। जाहिर है कि ममता का लक्ष्य विपक्षी दलों की सरकार बनने की सूरत में इसके नेतृत्व का है। 

loading...



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति