शख्सियत: इनकी सोच थी रिमोट कंट्रोल सिस्टम, मार्कोनी से होती है तुलना



जगदीशचंद्र बोस पहले ऐसे वैज्ञानिक थे, जिन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों के अध्ययन पर काम किया। आज देश उन्हें मार्कोनी के साथ रेडियो का सह-आविष्कारक मानता है। वे बोस ही थे, जिन्होंने पहली बार बताया कि विद्युत चुंबकीय तरंगें किसी सुदूर स्थल तक हवा के सहारे पहुंच सकती हैं। उनका यही सिद्धांत बाद में रिमोट कंट्रोल सिस्टम का सैद्धांतिक आधार बना। व्यक्तिगत जीवन बंगाल के ढाका में जन्मे बोस बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनके पिता भगवानचंद्र बोस ब्रह्म समाज के नेता थे। बोस की शुरुआती शिक्षा गांव के ही विद्यालय में हुई


उनके पिता का मानना था कि किसी भी भाषा को सीखने से पहले अपनी मातृभाषा सीखनी चाहिए। इसलिए बोस को शुरुआती शिक्षा एक बांग्ला विद्यालय में दिलाई। बोस बचपन में अपने मित्रों से पक्षियों, पेड़-पौधों आदि की कहानियां सुनते थे। इस तरह उनमें वनस्तपति विज्ञान के प्रति रुचि जागी। बोस बाद में कलकत्ता आ गए और सेंट जेवियर स्कूल में दाखिला लिया। वहां से स्नातक की डिग्री ली। वे चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए। मगर स्वास्थ खराब रहने की वजह से चिकित्सक बनने का विचार छोड़ दिया।


वे कैंब्रिज के क्राइस्ट महाविद्यालय गए और वहां उन्हें भौतिकी के प्रोफेसर फादर लाफोंट ने भौतिकशास्त्र के अध्ययन के लिए प्रेरित किया। भारत वापसी जगदीशचंद्र बोस 1885 में भारत वापस आ गए और भौतिकी के सहायक प्राध्यापक के रूप में प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढ़ाने लगे। उस समय भारतीय शिक्षकों को अंग्रेज शिक्षकों की तुलना में एक तिहाई वेतन दिया जाता था। जगदीशचंद्र बोस ने इसका विरोध किया और बिना वेतन के तीन साल तक काम करते रहे। बोस एक अच्छे शिक्षक थे। वे पढ़ाते समय कई तरह के प्रयोग कराया करते थे।


रेडियो तरंगों की खोज जगदीशचंद्र बोस पहले ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो तरंगों का पता लगाने के लिए सेमीकंडक्टर जंक्शन का इस्तेमाल किया। इस पद्धति में कई माइक्रोवेव घटकों की खोज की थी। इसके बाद अगले पचास साल तक मिलीमीटर लंबाई की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों पर कोई शोध कार्य नहीं हुआ था। वे अपने समय से बहुत आगे सोच रहे थे। यही कारण था कि उन्होंने विभिन्न आविष्कार किए। वनस्पति विज्ञान में रुचि बोस को बचपन से ही पेड़-पौधों में रुचि थी।


उन्होंने ऐसे संवेदनशील यंत्र बनाए, जो पौधों में भौतिक, रासायनिक, यांत्रिक या विद्युतीय स्तर की अति सूक्ष्म जैविक क्रियाओं को भी दर्ज कर सकते थे। जब बोस को यह मालूम हुआ कि पौधों में हो रहे विकास को भी दर्ज किया जा सकता है। तब क्रेस्कोग्राफ नामक यंत्र बनाया, जिससे पौधों की गति को मापा जा सकता था। यह यंत्र पौधे की गति माप सकता था। बोस ने यह भी सिद्ध किया कि जैसे मनुष्य को दर्द होता है वैसे ही पौधे को भी दर्द होता है। इस बात की पुष्टि उन्होंने एक पौधे में जहर का इंजेक्शन लगा कर की। उन्होंने जब उस पौधे में जहर का इंजेक्शन लगाया तो पौधा मुरझा गया। इससे उन्होंने माना कि पौधों को भी दर्द होता है। बोस इंस्टीट्यूट जगदीशचंद्र बोस ने ऐसे समय में वैज्ञानिक आविष्कार किए जब देश में वैज्ञानिक चेतना शून्य थी। बोस ने अपना पूरा शोधकार्य बिना किसी अच्छे उपकरण और प्रयोगशाला के किए थे। बोस चाहते थे कि देश में एक अच्छी प्रयोगशाला खुले। उन्हीं की सोच का परिणाम है बोस इंस्टीट्यूट। यह विज्ञान में शोध के लिए एक प्रमुख केंद्र है।

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