लोकसभा चुनाव: वोटों का ट्रांसफर बीएसपी-एसपी के लिए होगी असली चुनौती



लखनऊ। आगरा के रहने वाले दलित नेता रविंद्र पारस वाल्मिकी इन दिनों बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। वाल्मिकी ने करीब 24 साल बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) में गुजारे लेकिन अब उन्हें पहली बार अपने भाषण का अंत 'जय भीम, जय भारत' से नहीं करना पड़ रहा है। समाजवादी पार्टी के साथ हुए अलायंस का सम्मान करने के लिए उन्हें अब इसके बाद वाल्मिकी को 'जय लोहिया, जय समाजवाद' भी कहना पड़ रहा है


   बीएसपी नेताओं की तरह ही एसपी के नेताओं को भी नारे लगाने पड़ रहे हैं जो समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया को अपना आदर्श मानते हैं। एसपी के नेता और कार्यकर्ता दलितों के आदर्श बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर, कांशीराम और मायावती का नाम लेने के बाद ही भाषण की शुरूआत कर रहे हैं। यह कुछ उसी तरह से है जैसे दोनों ही दलों के झंडे एक-दूसरे से मिल गए हैं।


  आपसी मतभेदों को भुलाकर एसपी-बीएसपी के एक साथ आ जाने के बाद एक-दूसरे के आदर्श नेताओं के प्रति स्नेह के प्रदर्शन के बीच लाख टके का सवाल अभी भी बना हुआ है। क्या वे अपने वोटों (एसपी का यादव और बीएसपी का जाटव) को ट्रांसफर कर पाएंगे या नहीं। हालांकि दोनों दलों के बीच दोस्ती से अलायंस का विरोध करने वाले शांत हो गए हैं।


  करीब दो दशक तक एक-दूसरे के शत्रु रहने वाले दोनों ही दलों के लिए वोटों का आपस में ट्रांसफर किया जाना बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। यह आश्चर्य वाली बात नहीं है कि जब 1995 में मायावती पर एसपी कार्यकर्ताओं के हमले की बात होती है तो वाल्मिकी इसे दिलों का गठबंधन बताते हैं। उन्होंने कहा, 'हम आगे बढ़ गए हैं। वस्तुत: यह एक ऐसा गठबंधन है जो जनता के दबाव में हुआ है।


हमें एक-दूसरे के महापुरुषों का सम्मान करना है।'  दोनों दलों के नेता चाहे जो कहें लेकिन इस 'सम्मान' को जमीनी स्तर पर दिलाना आसान नहीं है। वह भी तब जब सूबे में यादवों और जाटवों के बीच शत्रुता का इतिहास रहा है। इटावा के कोठी बिचारपुरा गांव के जाटव किसान राम दास कहते हैं कि मायावती ने एसपी के साथ गठबंधन करके दलितों की आकांक्षाओं का अपमान किया है। उन्होंने कहा, 'एसपी के शासनकाल में गुंडे खुलेआम घूमते थे। और यदि गुंडाराज वापस आने जा रहा है तो दलित न्याय के लिए किसके पास जाएंगे।'  

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