तो सवाल यह है कि सवालों से डरता कौन है?



डर,एक स्वाभाविक भावना है ’ कोई ईश्वर से डरता है, कोई पिताजी से, कोई पत्नी से डरता है तो कोई बॉस से ’ दरअसल हम किसी से नहीं डरते, हम डरते हैं 'सवाल ' से ,प्रश्न से,  मनन कीजिए कि दुनिया में यदि कुछ भयंकर है तो वो सवाल है और कुछ मुश्किल है वह है जवाब देना । कयामत के दिन ईश्वर को जवाब देना है,घर जाकर पिताजी को या पत्नी को। बॉस या मालिक नामक प्राणी का तो अस्तित्व ही जवाब मांगने पर टिका हुआ है । क्या, कब, कैसे ,कहां, क्यों ,भाषा के लिहाज से केवल प्रश्नवाचक शब्द है पर असल में यह मारक अस्त्र है जो किसी का भी आत्मविश्वास खंडित कर सकते हैं । सवाल करने वाले की प्रश्नवाचक मुद्रा, तनी भवे, क्रोधित आँखें, फुले नथुने,  अकड़ी गर्दन की हैसियत किसी मिसाइल के लांच पैड से कम नहीं होती ।कड़क आवाज में जब सवाल की मिसाइल चलती है तो 'सीधा-सीधा दिल पर निशाना लगता है '’ जवाब देने वाला, 'भोली सी सूरत, आंखों में सुस्ती, दूर खड़ा घबराए " की स्थिति में होता है े जैसे ही सवाल का यह बादल फटता है, सारे जवाब साफ हो जाते हैं।   सवाल की एक समस्या यह भी है कि वह कभी अकेला नहीं आता ।साथ में छोटा सवाल, बड़ा सवाल, पैसों का सवाल, प्यार का सवाल, घर  का सवाल, इज्जत का सवाल, जिंदगी का सवाल और कुछ नहीं तो देश का सवाल, साथ में लाता है ।  सीन कुछ यू बनता है की एक तरफ सवाल पर सवाल और सवालों की बौछार तो दूसरी तरफ चुप्पी, हैरानी,असमंजस और किंकर्तव्यविमूढ़ता (इस शब्द का अर्थ पूछ कर आपको जवाब देने की तकलीफ नही दूँगा, वैसे मुझे भी पता नही है) ऐसी ही किसी स्थिति में जनाब अमजद इस्लाम अमजद ने लिखा होगा " मेरी उम्र में ना सिमट सके, तेरे पास इतने सवाल थे,  मेरे पास जितने जवाब थे, तेरी एक निगाह में आ गए ।" वैसे कुछ सवाल काम के होते हैं, कुछ काम के लिए होते हैं और बाकी बस होते हैं।


  काम के सवालों को काम से या परिणाम से और कभी कभी मौन से संतुष्ट किया जा सकता है पर असल तकलीफ बस यूं ही होने वाले सवालों से होती है । हमारे यहां बातचीत का यह तरीका आम है कि आप एक प्रश्न करें जैसे "और, क्या हाल चाल है?   फिर वह जवाब के साथ सवाल करें," ठीक है, तुम सुनाओ ? फिर आप इस पर जवाबी हमला करें। फिर यही प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाए और घंटे 2 घंटे तक बातचीत का सिलसिला बना रहे । अद्भुत संयोग है कि परमाणु बम की संरचना में भी प्रक्रिया कुछ कुछ ऐसी ही है।  वहां भी कहते हैं, परमाणु टूटने की प्रक्रिया होती है मतलब परमाणु कई हिस्सों में टूटते हैं और घातक ऊर्जा उत्पन्न होती है । इसीलिए यह कहना गलत ना होगा कि सवाल की प्रकृति,  परमाणु बम जितनी घातक होती है।  सवाल का असर, किसी भी तीर, तलवार , गोली, बम से अधिक होता है । यकीन ना हो तो आंखें बंद करके, एक बार याद कीजिए "कैसी लग रही हूं?" सिहरन हुई ना!  जबकि इस प्रश्न का जवाब, शाश्वत सत्य है, अटल है, दीवाल पर लिखी इबारत की तरह स्पष्ट है यूनिवर्सल ट्रुथ है की " अच्छी लग रही हो "। क्योकि जिंदगी बिग बी की तरह बडे दिल वाली नही होती कि  जवाब के चार विकल्प दे या लाइफ लाइन की सुविधा दे।  यहाँ सवाल के साथ अपनी आबरू भी इसी में है कि जवाब 'ठाकुर सुहाती' मतलब उनके मन का हो ।युधिष्ठिर तो ज्ञानी पुरुष थे, "नरो वा कुंजारो वा' बोलकर झूठ बोलने से साफ बच गए ।आप तो यह भी नहीं कर सकते क्योंकि जगजाहिर है कि "तेरी आंखें सवाल करती है, मेरी हिम्मत जवाब देती है ।" लगभग ऐसी ही स्थिति सारे  जवाबदार  लोगों के साथ उत्पन्न होती है ।कभी घर में, कभी बाहर,।  सवाल  समय ,मौसम, परिस्थिति के अनुसार, जीवन के हर बिंदु पर अपना डेरा जमाए रहते हैं ।


इसकी शुरूआत जन्म के पहले से हो जाती है जब "लड़का होगा या लड़की?' का प्रश्न आता है ।जन्म हो जाए तो 'मामा पर गया या बुआ पर?' के प्रश्न से लेकर ,आदमी की शव यात्रा तक जहां लोग, 'कैसे मरे? कब मरे ?क्या छोड़ गए ?तक के सवाल आपके साथ रहते हैं।  सवाल करने और जवाब देने का सिलसिला न जाने कब से चल रहा है। सवाल वह ब्रह्मास्त्र है ,जिसे चला कर, आप किसी को भी दिक्कत में डाल सकते हैं जैसे यही कि "क्या चल रहा है ?" अब सामने वाला सोचे समझे, जवाब खोजे और आप की खिदमत में पेश करें कि 'भैया यह चल रहा है'। दिनभर चैनलों पर जवाब मांगते एंकर से लेकर चौराहे पर रुक कर पता पूछने वाले तक हर आदमी को सवाल ही आगे बढ़ा रहा है।  हमारा देश  हमेशा से  'प्रश्न प्रधान' रहा है , वह तो बतौर इंप्रेशन  हमने 'कृषि प्रधान'  कहलाना शुरू किया । उदारमना  हिंदुस्तानी, कभी यक्ष को जवाब देता है तो कभी ईश्वर से प्रश्न कर बैठता है  कि "खुश तो बहुत होगे तुम?' यह सवाल जवाब  हमारी संस्कृति है ।  कुरुक्षेत्र में स्वयं श्रीकृष्ण सारथी हैं,  युद्ध की तैयारी है , पर मेरा भाई अर्जुन यहाँ भी नही मानता, भगवान श्री कृष्ण से  सवाल पर सवाल करता है और सांस्कृतिक  उदारता का चरम देखिए, भगवान, युग दृष्टा बन कर हर प्रश्न का जवाब देते हैं, "भगवत गीता के रूप में'।  हमारी संस्कृति में, सृष्टि को बनाने वाले, चलाने वाले से सवाल करना भी आसान था । सही सवाल उठाने का यह साहस, यह जिम्मेदारी, इतने सालों में कही लुप्त सी हो गयी है। बस यूंही सवाल तो हम रोज ही करते है पर कायदे के नही क्योकि ऐसे सवालों के जवाब भी हम देना नही चाहते। कहते हैं यह कलयुग है। यहां अपने मन का जवाब तो सबको पसंद है पर सवाल करना नही,क्योंकि सवाल से सब डरते हैं, मैं,आप, ये, वो और वह सब, जवाब देना जिसकी  जिम्मेदारी है।

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विश्वास व्यास

विश्वास व्यास, शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय विश्वास व्यास शौकिया लेखन करते हैं। मूलत: उनका कार्यक्षेत्र इंदौर है और मंदसौर जिले के सीतामऊ कस्बे में पैरामाउंट अकादमी का भी वे संचालन कर रहे हैं। लिखने की कई विद्याआें में विश्वास पारंगत हैं



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