पुलवामा के बाद ऐसी देशभक्ति को ओढ़ें या बिछाएं...



पठानकोट-उरी के बाद पुलवामा में जवानों की शहादत। देश भर में राष्ट्रभक्ति का उफान। शहीदों के खून की एक-एक बूंद का बदला लेने के दावे। टीवी, न्यूज पेपर, सोशल मीडिया में देशभक्ति का ज्वार चरम पर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से ईंट का जवाब पत्थर दे देने का दबाव। मोदी के छप्पन इंच सीने से लेकर तत्काल युद्ध की घोषणा की बातें करना। देश मानो इसी काम में लगा हुआ है। बेशक पुलवामा आत्मघाती हमला दुश्मन देश और देश द्रोहियों की करतूत है। आतंकियों को तो हम सबक सिखाते आए हैं। चाहे कारगिल युद्ध हुआ हो या उरी के बाद सर्जिकल स्ट्राइक। लेकिन इस सबके बहाने हम देश में हर दिन हम सबके द्वारा किए जा रहे राष्ट्रद्रोह पर बात करना चाहते हैं। ग्राम पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक कार्यवाही को ठप्प करना देश द्रोह ही तो है। हर दिन हो रहे इस द्रोह का इलाज क्या है। पाकिस्तान और आतंकवाद के खिलाफ तो हम सर्जिकल स्ट्राइक कर देंगे। लेकिन आफिस, अस्पताल, स्कूल, तहसील, पुलिस थानों और तो और ट्रेफिक सिग्नल में रेड लाइट जंप करने वाले द्रोहियों के खिलाफ युद्ध कब होगा। जब भी भारत में आतंकवाद की घटना होती है तब हम इजराइल को जरूर याद करते हैं। इस्लामी देशों के बीच पैदा हुए इजराइल की हालत दांतों के बीच जुबान जैसी है। आबादी उसकी एक करोड़ से भी कम है। मगर मजाल है उसके सैनिकों की तरफ कोई आंख उठाकर देख ले। क्या आईएसआईएस, जैश ए मुहम्मद, तालिबान जैसे तमाम संगठन अमेरिका तक को हिलाकर रखे हों मगर इजराइल की तरफ कोई फटकता नहीं है। इसके पीछे खासबात है वहां का हर नागरिक राष्ट्रवादी है अनुशासन और देशभक्ति इजराइल के नागरिकों की रगों में बहती है। वहां हर लड़के को तीन साल और लड़कियों को दो साल का सैनिक प्रशिक्षण अनिवार्य है। इजराइल सैनिक को कोई पत्थर मारे तो उसे हमलावर पर गोली चलाने का हक है। उसने सुरक्षा और शिक्षा के साथ रिसर्च में भी रिकार्ड बनाया है। समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने का हुनर उसके पास है। हथियारों में दुनिया के आधुनिकतम हथियार उसके पास हैं।


वजह है वहां दुश्मन के हमले के वक्त राष्ट्रवाद नहीं जागता बल्कि वे लोग हमेशा देश के लिए जीते और मरते हैं। दुनिया में देशभक्ति के मामले में जापान भी एक उदाहरण है। लेकिन हम भारत पर ही आते हैं। पुलवामा के बाद देशभक्ति का जो सैलाब उमड़ रहा है उसमें हर रोज राष्ट्रद्रोह करने वाले भी मोमबत्ती जला रहे हैं। पेट्रोल-डीजल से लेकर आटे-दाल तक में मिलावट करने वाले देशभक्ति का जयघोष कर रहे हैं। नकली दवाएं बनाना , नकली दूध से लेकर मुर्दाघर में लाश देने के लिए रिश्वत मांगने वाले भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जिस दिन पुलवामा हादसे की तरह विरोध शुरू हो जाएगा उस दिन न पठानकोट होगा न संसद पर हमला होगा और न कारगिल से लेकर पुलवामा होगा। विधानसभा और लोकसभा में कार्यवाही का हंगामे की भेंट चढ़ जाना क्या देशभक्ति का आचरण है। रक्षा सौदों में दलाली, किसान और जवानों के मामले में गलत नीतियां देशभक्ति के दायरे में तो नहीं आती। सरकारें और तंत्र अगर किसानों और जवानों की खुशहाली की चिंता नहीं कर पा रहा तो ये भी राष्ट्रभक्ति नहीं है। जवान और किसान के बिना देश की कल्पना संभव नहीं है और हम इन दोनों के कल्याण के बारे में बातें ज्यादा और काम कर करते हैं। बदहाल किसान अपनी उपज का बाजार मूल्य मांगते-मांगते इतना मायूस हो रहा है कि वह जीने की बजाए मरना पसंद कर रहा है। जवानों को हमने इतना मजबूर कर दिया है कि उसे गाली देने वाले और पत्थर मारने वालों को वह सबक नहीं सिखा पा रहा है। जम्मू-कश्मीर में मारे गए आतंकियों को वहां की एक पूर्व मुख्यमंत्री शहीद का दर्जा देकर उसको आर्थिक सहायता देती थी। जिन लोगों की जगह सलाखों के पीछे होना चाहिए उन्हें तिरंगे की सलामी दी जाती है क्या ये सब देशभक्ति है। स्कूल और कॉलेजों में ठीक से नहीं पढ़ाने वाले अध्यापक और प्राध्यापक क्या राष्ट्र द्रोह की सीमा में नहीं आते? पाठ्यक्रम पूरा पढ़ाए बिना विद्यार्थियों को परीक्षा में झोंक देना क्या ऐसा नहीं है जैसे आधे-अधूरे हथियारों को लेकर सैनिकों को युद्ध में भेज देना? हम एक पूरी की पूरी पीढ़ी को शिक्षा के मामले में बर्बाद कर रहे हैं।


अस्पतालों में सही जांच और परीक्षण के बिना घटिया दवाएं देना भी देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आता क्या? नकली दवा और घटिया इलाज से जो लोग मर जाते हैं उनका तो पूरा परिवार ही तबाह हो जाता है। ऐसा करने वाले आंतरिक आतंकवादी हैं। ऑफिसों में वेतन पूरा लेना और रोज का काम रोज नहीं निपटाना ये भी आतंकवाद और राष्ट्रद्रोह से कम नहीं है। सीमा पर हो रहे आतंकवाद को तो गोली मारकर, बम से उड़ाकर, सर्जिकल स्ट्राइक करके हम भले ही काबू में कर लें लेकिन नदियों से रेत चोरी करने वाले सड़क के नाम पर पहाड़ों को काटने वाले, विकास के नाम पर जंगल साफ करने वाले देशद्रोहियों पर कब सरकार और समाज गोलियों की बौछारें करेगा और बम की बारिश। मध्यप्रदेश के संदर्भ में ही देखें तो जीवन दायिनी मां नर्मदा नदी को उसके उद्गम अमरकंटक में ही प्रदूषित कर दिया गया है। उसके किनारों के पहाड़ सतपुड़ा और विन्ध्याचंल में पेड़ काटे जा रहे हैं। बारह माह बहने वाली नर्मदा से इतनी रेत निकाली जा रही है कि जगह जगह उसकी धार ही टूटने लगी है। आज नहीं तो कल यह पक्का है हालात नहीं सुधरे तो नर्मदाजी विलुप्त हो जाएंगी। सूख जाएंगी लिखते हुए हमें डर लग रहा है। क्या यह देश द्रोह नहीं है। पुलवामा की घटना ताजी है इसलिए रोज देश द्रोह करने वालों की राष्ट्रभक्ति उबल रही है। लेकिन आफिस,स्कूल,अस्पतालों और थानों में रोज हो रहे राष्ट्र द्रोह को नहीं रोका गया तो पठानकोट-उरी, पुलवामा जैसी घटनाओं पर न तो रोने वाले बचेंगे और न बहने के लिए आंखों में आंसू। इजराइल और जापान की तरह देशभक्ति बातों से नहीं आचरण में होनी चाहिए। जापान में जब परमाणु रिएक्टर में रिसन के कारण रेडिएसन फैल रहा था तब वहां काम करने वालों ने अपने घर जाने के बजाए उसमें उतरकर रेडिएसन को रोकने का काम किया। उनमें से सबको पता था कि वे जीवित नहीं लौटेंगे और बच भी गए तो मरे के समान ही होंगे। इसके बाद भी उन्होंने अपने परिजनों को ईमेल पर घटना की जानकारी दी और बचाव के लिए खुद के रिएक्टर में उतरने की सूचना। आखिरी में सबने परिजनों को लिखा गुडबाय...ऐसी देशभक्ति हो तब देश बचते हैं। जुबानी जमा खर्च से तो सिर्फ नारे लगा सकते हैं, पुतले जला सकते हैं और रो सकते हैं बस...

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राघवेन्द्र सिंह

राघवेन्द्र सिंह प्रदेश के उन वरिष्ठ पत्रकारों में आते हैं जिनके राजनीतिक लेखन पर लोग अपनी राय तय करते हैं। दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, नईदुनिया सहित प्रदेश के कई अखबारों में अपनी पत्रकारिता का लौहा मनवा चुके राघवेन्द्र इन दिनों इलेक्ट्रिानिक मीडिया में भी बराबर दखल रखते हैं। राजनीतिक परिस्थितियों पर उनका कालम, 'ना काहू से बैर' इन दिनों चर्चित स्तंभ बना हुआ है।



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