विपक्षी एकता से टूटेगा मोदी शाह का तिलिस्म



कृष्णमोहन झा/ हॉल में ही संपन्न हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव के माध्यम से राज्य में कांग्रेस जेडीएस व बसपा की सेक्युलर सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त होने के बाद भाजपा विरोधी दलों ने सारे आपसी मतभेद भुलाने के हर संभव प्रयास कर दिए है। कर्नाटक में नई सरकार के शपथ ग्रहण में जिन दलों के वरिष्ठतम नेताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी,उनमे फिलहाल इतनी आपसी समझ तो दिखाई देने की वे आपस मे एक दूसरे की आलोचना से परहेज कर रहे है।  पश्चिम बंगाल में विगत दिवस सम्पन्न हुए पंचायत चुनाव में राजनीतिक हिंसा के जो आरोप भाजपा ने सत्तारूढ़ तृणमूल पर लगाए थे, उसमे कांग्रेस का उन्हें समर्थन नही मिला था। कांग्रेस नेता तृणमूल सरकार एवं उनके कार्यक्रताओं पर प्रत्यक्ष आरोप लगाने से बचते रहे। वही इन दिनों तृणमूल सुप्रीमो भी कांग्रेस के विरुद्ध बोलने से बच रही है। उत्तरप्रदेश में  भी अमूमन यही स्थित दिखाई दे रही है। राज्य के दो प्रमुख भाजपा विरोधी दल बसपा की सुप्रीमों मायावती व सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव भी एक दूसरे के विरुद्ध  सीधे कोई आरोप नही लगा रहे है। उत्तरप्रदेश के उपचनावों में सत्तारूढ़ भाजपा की जो पराजय हुई है ,उसे इन भाजपा विरोधी दलों ने ही सम्भव बनाया है।  उत्तरप्रदेश के सभी विपक्षी दलों को अब यह बात अच्छी तरह समझ आ गई है कि भाजपा विरोधी वोटो का ध्रुवीकरण कर वे अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा के अच्छे दिनों की राह को मुश्किल बना सकते है। लेकिन अभी भी इन दलों का अहम उनका पीछा नही छोड़ रहा है।


विगत दिवस मायावती ने एक बयान जारी कर कहा कि गठबंधन में बसपा को सम्मानजनक सीटें नही मिलती है तो वह अलग राह पकड़ सकती है। उनके इस बयान से सपा प्रमुख अखलेश यादव की मुश्किलें बढ़ती दिख रही है। हालांकि बसपा को भी इससे नुकसान ही होने वाला है।  अखिलेश जानते है कि यदि बसपा ने अलग राह पकड़ ली तो उन दोनो की स्तिथि 2014 के लोकसभा चुनाव की तरह हो सकती है, जिसमे वोटो के बटवारे के कारण दोनों को शर्मनाक हार मिली थी। अखिलेश ने मायावती की धमकी को समय रहते समझ लिया और सीटों के मामले में कुछ कुर्बानी देने को तैयार हो गए। अतः अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों के गठबंधन में किस दल को कितनी कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना होगा। पश्चिम बंगाल में तृणमूल की शर्तें कांग्रेस को माननी ही पड़ेगी। उत्तरप्रदेश में सीटों का असली बटवारा तो सपा एवं बसपा के बीच ही होगा। कांग्रेस को कुछ सीटों पर ही संतोष करना पड़ सकता है।   दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी की एंट्री ने कांग्रेस के लिए और मुश्किलें बढ़ा दी है। भाजपा विरोध को देखते हुए उसे आप से गठबंधन करना ही होगा। दिल्ली में चर्चा गर्म है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो समझौते के मूड में है,लेकिन आप की लोकप्रियता में गिरावट व पंजाब में उसके साथ सीधी लड़ाई ने कांग्रेस को सोचने पर मजबूर कर दिया है। शायद इसी कारण भी कुमारास्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में जहां तमाम विपक्ष मौजूद था वहां केजरीवाल की उपस्थिति नही थी। वैसे दिल्ली में आप कार्यकर्ता भी कांग्रेस से समझौते के पक्षधर नही है।


कांग्रेस की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उसके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र के कद का  कोई करिश्माई नेता नही है। अगर राहुल गांधी मोदी की तरह करिश्माई होते तो ममता बनर्जी,शरद पंवार, मायावती,अखिलेश यादव जैसे दिग्गज स्वयं ही उन्हें गठबंधन का नेता मानकर उन्हें नेतृत्व सौपने को तैयार हो जाते। राहुल गांधी की भी मजबूरी है कि उनके पास मोदी को हराने के लिए  इन क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ गठबंधन के अलावा कोई रास्ता नही है। कांग्रेस पार्टी भले ही 133 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी हो एवं उसकी जड़ें देश के सभी राज्यों में मौजूद हो ,लेकिन फिलहाल तो उत्तरप्रदेश , बिहार, तमिलनाडु सहित कई राज्यों में वह क्षेत्रीय दलों से भी पीछे है। कांग्रेस को इसलिए इन क्षेत्रीय दलों के साथ मित्रता प्रगाढ़ रखने के प्रयास करने ही होंगे। क्षेत्रीय दलों के ये दिग्गज कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए फिलहाल इतनी कुर्बानी देने को तैयार नही दिख रहे है ,जितना कांग्रेस चाहती है। लेकिन यह  संभव हो सकता है यदि कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश , राजस्थान एवं छतीसगढ़ के आगामी विधानसभा के चुनावों में भाजपा के इन मजबूत किलों को दरकाने में सफल हो जाए। किन्तु अभी यह मान लेना भी जल्दबाजी होगी कि कांग्रेस इन राज्यों के मजबूत भाजपाई गठबंधन एवं नेतृत्व को चुनौती दे सकने की स्थिति में आ चुकी है।  देश के 21 राज्यों में सत्ता से बेदखल हो चुकी कांग्रेस को उसके स्वर्णयुग में वापस लाना कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं एवं पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए फिलहाल तो दूर की कौड़ी लग रहा है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि आगामी लोकसभा चुनावों में यदि कांग्रेस को महागठंबधन का नेतृत्व करने का मौका नही मिलता है तो उसकी  स्थिति क्षेत्रीय दल के बराबर हो जाएगी। (लेखक राजनीतिक विश्लेषक और आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

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