लोकसभा चुनाव: जोश बनाए रखने की चुनौती



लोकसभा के चुनाव होने हैं और मध्यप्रदेश समेत हिन्दी भाषी राज्यों के कार्यकर्ता और मतदान के दिन तक वोटर माई बाप बने रहेंगे। कांग्रेस और भाजपा के साथ अन्य दलों के सामने मप्र में कार्यकर्ताओं में जोश बनाए रखने की चुनौती आ रही है। आठ फरवरी को राहुल बाबा की किसान आभार सभा में कार्यकर्ताओं को सिर माथे पर बैठाने जैसे भाषण हुए। मसलन राहुल गांधी ने कमलनाथ सरकार के लिए कहा ये कार्यकर्ताओं की सरकार है। कार्यकर्ताओं की नहीं सुनने वालों को कुर्सी से हटा दिया जाएगा। इसके पहले उन्होंने कहा था दस दिन में किसानों का कर्जा माफ नहीं सीएम साफ। कमलनाथ ने अपने पहले आदेश में कर्ज माफी पर हस्ताक्षर किए थे। इस सबके बाद भी मंत्रियों के रथ जमीन से ऊपर उठना रुक नहीं पा रहा है। इसे लेकर कार्यकर्ताओं में सरकार को लेकर ठंडापन दिखने लगा है। इस बात को साफगोई के लिए मशहूर दीपक बाबरिया ने पकड़ा और कहा कार्यकर्ताओं की उपेक्षा भारी पड़ सकती है। दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जोश भरने के लिए कह रहे हैं टाइगर अभी जिन्दा है और जहां भी वे जाते हैं उनका हीरो की तरह स्वागत होता है। विधानसभा चुनाव के लगे लगाए लोकसभा के चुनाव आने से भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस उम्मीद से थे कि कार्यकर्ता सक्रिय बने रहेंगे। लेकिन जमीनी हकीकत दोनों दलों के लिए चौकाने वाली है। भाजपा को लग रहा था कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद कार्यकर्ता इसे दिल पर लेगा और भावुक होकर लोकसभा चुनाव में जिताने के लिए कमर कसेगा। ऐसे ही कांग्रेस को लग रहा है कि सरकार बनने के बाद अब उसके चाहने वाले राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए जोश से भरे रहेंगे।


मगर सत्ता में मौज करने वाले मंत्री, विधायक और उनके चंपुओं के जलवे देख कार्यकर्ता भी सरकार की रस मलाई में हिस्सा चाहता है। दीपक बावरिया ने इस बात को समझ कर कार्यकर्ताओं की चिन्ता करने की जो समझाईश दी वह नेताओं को नागवार गुजर रही है। भाजपा सरकार के जमाने में चल रहा रेत का धंधा मंदा होने की बजाए और तेज हो गया है। इसको लेकर कमलनाथ सरकार के प्रतिष्ठा जनता में भी घट रही है। रेत के अवैध खनन में सिर्फ चेहरे बदले हैं अफसर ठेकेदारों से लेकर छुटभैयों की पौ बारह है। अलग बात है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ लगातार सख्ती बरतने का आदेश दे रहे हैं लेकिन अभी तक तो उनका ज्यादा असर नहीं दिखा है।  बुदनी होशंगाबाद को ही देख लें इन इलाकों से रेत का गोरखधंधा पहले रात में होता था अब दिन रात जारी है। ऐसे में पन्द्रह साल से सत्ता से दूर कांग्रेस का कार्यकर्ता देख रहा है कि सरकार भले ही बदली मगर रेत कारोबारी और दलालों के जलवे जो शिवराज सरकार में ते वही कमलनाथ सरकार में हैं। सत्ता तो बदली लेकिन जनता और कार्यकर्ता को वक्त है बदलाव का नजर नहीं आ रहा। विधायक मंत्रियों की धमक प्रशासन में कम दिख रही है। मंत्रियों के सामने विवाद और मारपीट तक की घटनाएं हो रही हैं। कटनी में हुए एक घटना इसका उदाहरण भी है। सरकार में हालत ये है कि तबादलों की भरमार को देखते हुए नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा है कि तबादला उद्योग फिर शुरू हो गया है। उधर शिवराज सिंह चौहान पहले ही कह चुके हैं। हम सरकार में भले ही न हों संख्या में बहुत कम नहीं हैं। कांग्रेस के 114 और भाजपा के 109 विधायक हैं लिहाजा भाजपा ने सरकार को समझाईश और चुनौती दोनों दे रखी है।


कुलमिलाकर प्रदेश के 29 लोकसभा सीटों में अधिकतम पर कब्जे का संघर्ष चल रहा है। अभी तो भाजपा 26 सीटों पर अपने कब्जे को बनाए रखने का प्रयास रख रही है जबकि कर्ज माफी, बेरोजगारों को चार हजार रुपए महीना देने के दम पर चौबीस सीटों पर जीतने का लक्ष्य रखे हुए है। दोनों ही दलों को पता है कि कार्यकर्ताओं की सक्रियता के बिना सफलता मुश्किल है। कांग्रेस के पास सत्ता एक बड़ा जरिया है मगर अभी तक कार्यकर्ताओं को उसकी मलाई नहीं मिली है। भाजपा के पास संगठन है लेकिन जिस संगठन के लुंज पुंज होने से पार्टी सत्ता के किनारे आकर डूब गई आज भी उसमें कमजोर कड़ियां बरकरार हैं। ऐसे में केन्द्र में फिर से भाजपा की सरकार के लिए 29 में से 26 तो क्या 16 सीटें पाने के लिए संघर्ष करती दिख रही है। अभी अघोषित रूप से भाजपा का चुनाव प्रचार राज्य में शिवराज सिंह के दम पर ही चलने वाला है। लेकिन चुनाव में मीडिया और विज्ञापन से जुड़े भुगतान विवाद को लेकर पार्टी की हाईकमान के सामने तक किरकिरी हो चुकी है। प्रदेश भाजपा आर्थिक संकट में है। पार्टी पत्रिका चैरेवति का प्रकाशन नहीं हो पाना इसका प्रमाण है। नेताओं ने सत्ता और संगठन के नाम पर पैसे तो कमाए लेकिन चुनाव हारते ही सबने माल दबा लिया। पार्टी की प्रतिष्ठा की चिन्ता किए बिना भुगतान रोक दिए। कांग्रेस को उम्मीद है कि राहुल के बाद प्रियंका के आने से वोट और सीटें दोनों बढ़ेंगी।दूसरी तरफ टीम मोदी को लगता है कि जनता मोदी के नाम पर वोट देगी। फिर से दिल्ली में सरकार बनेगी। कार्यकर्ताओं की स्थिति को देखते हुए लगता है दोनों ही दल हकीकत से दूर मुगालते में ज्यादा हैं। पहले कार्यकर्ता की जय हो तब पार्टी की विजय हो पाएगी। अभी तो चुनाव जिताने वाले सरकार और संगठन को उम्मीद भरी नजरों से टकटकी लगाए हुए हैं।

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raghvendra singh

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं



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