वन नेशन वन इलेक्शन की कल्पना को मूर्त रूप दिला पायेगी विधि आयोग की बैठक?



कृष्णमोहन झा देश में लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों के विचार जानने के लिए विधि आयोग ने दो दिवसीय बैठक बुलाकर इस दिशा में एक निश्चित योजना के तहत पहल करना प्रारंभ कर दिया है। भाजपा ने इस बैठक में हिस्सा नही लिया और कांग्रेस का कहना है कि वह इस बैठक में इसलिए शामिल नही हुई है कि उसने इस मुद्दे पर पूर्व में ही अपने विचार से चुनाव आयोग को लिखित में अवगत करा दिया है। विधि आयोग द्वारा बुलाई इस बैठक में शिरोमणि अकाली दल ,अन्नाद्रमुक ,समाजवाद पार्टी और तेलंगाना राष्ट्र समिति ने एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में अपने विचार रखे, लेकिन नौ राजनीतिक दलों ने इसके विरोध में अपनी राय दी है। भाजपा ने इस विषय पर अपनी  राय बाद में देने की सूचना दी है। विधि आयोग की अगली बैठक इसी विषय पर 31 जुलाई को एक बार फिर बुलाई गई है।  चुनाव आयोग पहले ही कह चुका है कि जब तक सभी दलों की इस विषय पर एक राय नहीं होगी तब तक इस अवधारणा को मूर्त रूप देना मुश्किल है। यहाँ यह भी विशेष उल्लेखनीय है कि जिस भाजपा ने अभी तक बैठक से अपने आप को दूर रखा है ,उसी पार्टी की सरकार ने इस अवधारणा  को शुरू करने की मंशा जाहिर की है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस अवधारणा के पक्ष में अपने विचार व्यक्त कर चुके है। मोदी सरकार इस मामले को लेकर इतनी गंभीर है कि इस साल के बजट अधिवेशन के उद्घाटन भाषण में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी इस दिशा में पहल किए जाने पर जोर दिया था। कुछ राजनीतिक दलों के नेता यह आशंका भी व्यक्त कर चुके है कि केंद्र सरकार  इस साल  होने वाले तीन राज्यों मप्र, छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान के विधानसभा चुनावो के साथ लोकसभा का चुनाव भी करा सकती है, इसीलिए उन्होंने भी अभी से तैयारी  शुरू कर दी है।  एक देश एक चुनाव की अवधारणा का जिन दलों द्वारा अधिक विरोध किया जा रहा है उनका प्रभाव अधिकांशतः एक या दो राज्यों तक सीमित है।


वैसे जिन दलों ने इसका समर्थन किया उनमे समाजवादी पार्टी ही ऐसा दल है जिसका प्रभाव उत्तरप्रदेश के आलावा कुछ राज्यों में है, बाकी तीन दलों शिरोमणि अकाली दल का पंजाब ,अन्नाद्रमुक का तमिलनाडु एवं टीआरएस का प्रभाव तेलंगाना तक ही सीमित है। भाजपा ने ही इस अवधारणा के लिए राष्ट्रीय बहस की पहल की है, वही विरोधी दल भाजपा के इस तर्कों से सहमत नहीं है कि इससे धन व समय की बर्बादी पर विराम लग जाएगा तथा विकास कार्य अबाध गति से चलते रहेंगे।  बिहार में भाजपा की सहयोगी पार्टी जेडीयू ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इस प्रस्ताव  का समर्थन करते हुए कहा है कि एक साथ चुनाव कराने के पहले जरुरी तैयारी करना चाहिए। समाजवादी पार्टी ने भी सुझाव दिया है कि 2019 में 16 वी लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होने पर सारे चुनाव एक साथ कराना चाहिए। सपा के सुझाव के पीछे उनकी यह मंशा छुपी है कि समय पूर्व चुनाव होने की स्थिति में  उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव भी निश्चित समय से पूर्व होंगे। यदि ऐसा होता है तो उन्हें राजनीतिक संभावनाओं को बेहतर बनाने का मौका मिल जाएगा। गौरतलब है कि विगत कुछ समय में पूर्व  उत्तरप्रदेश में हुए उपचुनावों में सपा एवं बसपा गठबंधन को बेहतर सफलता मिली थी। सपा को लगता है कि प्रदेश में हो रही लगातार हार से योगी सरकार के प्रति लोगो का आकर्षण घटा है। इसका फायदा उसे भविष्य में मिल सकता है।  एक देश एक चुनाव की अवधारणा के विरोधी दलों आम आदमी पार्टी जेडीएस तेलगुदेशम पार्टी द्रमुक  माकपा फॉरवर्ड ब्लाक तथा तृणमूल कांग्रेस आदि की एक ही राय है कि एक साथ चुनाव कराने की प्रणाली न तो व्यवहारिक है न देश के संघीय ढांचे के अनुकूल। इस अवधारणा का समर्थन करने वाली अन्नाद्रमुक का कहना है कि इस तरह की अवधारणा उचित हो सकती है ,परंतु इससे पूर्व कुछ मुद्दों को सुलझाना आवश्यक है। पार्टी इसके समर्थन में तो है लेकिन उसका मानना है कि इसकी शुरुआत 2024 से होनी चाहिए।&


  दरअसल इस अवधारणा का विरोध करने वाले दलों को यह भय है कि अगर सरकार ऐसा करने में सफल हो जाती है तो एक या दो राज्यों में अपना वर्चस्व रखने वाले क्षेत्रीय दलों का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। तेलुगुदेशम पार्टी    तृणमूल कांग्रेस, जेडीएस सहित विभिन्न क्षेत्रीय दल अभी तक स्थानीय मुद्दों पर चुनाव लड़ते आए है। ये दल अपने प्रभाव वाले राज्यों में सरकार बनाने तक मे सफल हुए है। उनका यह सोचना कही हद तक सही हो सकता है कि यदि सभी चुनाव एक साथ कराए  जाते है तो राष्ट्रीय मुद्दों के आगे क्षेत्रीय मुद्दे गौण हो जाएंगे। इसका फायदा सीधे -सीधे भाजपा को होगा जो धीरे-धीरे सारे देश मे अपने पैर पसार रही है। लोकसभा चुनाव के दौरान 44 सीटों पर सिमटी कांग्रेस को सरकार की इस पहल में दुराग्रह नजर आ रहा है। पार्टी ने आशंका व्यक्त की है कि इस अवधारणा को मूर्त रूप देने में  सरकार यदि सफल हो गई तो लोकतंत्र एक तंत्र में बदल जाएगा। पार्टी का यह भी कहना है कि यह प्रस्ताव भारत के लोगो के सरकार चुनने के अधिकार को भी प्रभावित करेगा।  यह भी आश्चर्य का विषय है कि इस अवधारणा का विरोध करने वाली कांग्रेस और अन्य विरोधी दल इस  सत्य को कैसे विस्मृत कर गए कि देश मे 1952 से लेकर 1967 तक लोकसभा एवं सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही कराए जाते थे। हालांकि तब औऱ अब की परिस्थितियों में बड़ा अंतर आया है। अब यदि पुरानी परंपरा को फिर शुरू करना है तो मामूली संवैधानिक संसोधन से संभव नही है। तब देश मे इतने क्षेत्रीय दल नही थे।गठबंधन की सरकारें अस्तित्व में नही थी।1967 के बाद गैर कांग्रेसवाद की शुरुआत हुई है। अनेक राज्यों में क्षेत्रीय मुद्दे इतने प्रभावी हो गए कि विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों की संख्या बढ़ती गई। बाद में ऐसा समय आया कि क्षेत्रीय दलों  की राष्ट्रीय राजनीति में दखल तक बढ़ता गया। स्थिति तो यहां तक आ गई कि केंद्र में सरकार के गठन में क्षेत्रीय दलों की अहमियत होने लगी। यह स्थिति अब भी कायम है। भाजपा जिस तरह से सारे देश मे पैर जमा रही है उससे यह अनुमान लगाना कठिन नही है कि केंद्र में आगे भी उसे सरकार बनाने में सफलता मिलेगी। यही चिंता विरोधी दलों को  एकल चुनाव प्रणाली का विरोध करने पर विवश कर रही है।

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