मोदी बजट की काट के लिए शीर्षासन करती कांग्रेस



बजट मोदी सरकार का पेश किया अरुण जेटली की जगह प्रभारी वित्तमंत्री पीयुष गोयल ने। बजट का धमाका दिल्ली में हुआ और उसकी धमक कांग्रेस शासित राज्यों में देखी सुनी और महसूस की जा रही है। तीन माह बाद लोकसभा चुनाव होने हैं और मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान भाजपा से छीनने के बाद कांग्रेस के सामने विधानसभा की बढ़त आगे भी बनाए रखने का संकट है। केन्द्रीय बजट को मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक कहा जा रहा है जिसमें किसान और मध्यम वर्ग को भाजपा के पाले में लाने की बड़ी कोशिशें की गई हैं। वोटर को रिझाने के लिए टीम राहुल गांधी से लेकर राज्यों में टीम कमलनाथ, राजस्थान के अशोक गहलोत और छग के भूपेश बघेल सक्रिय हो गए हैं। बजट की आलोचना और मास्टर स्ट्रोक की काट के लिए सरकारों के वित्त विशेषज्ञ शीर्षासन कर रहे हैं। आलोचना का मतलब ही है घबराहट। जैसे प्रियंका गांधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बनाने पर भले ही भाजपाई कहें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन जिस ढंग से नुक्ताचीनी हो रही है उससे तो यही लगता है कि फर्क तो पड़ता है। मोदी सरकार के आखिरी बजट को लेकर कांग्रेस और शेष प्रतिपक्ष ने जो आलोचना की है उससे साफ संकेत मिलते हैं कि विपक्ष में चुनाव को लेकर चिंता बढ़ गई है।


अंतरिम बजट में पांच लाख तक की इन्कम टैक्स फ्री, छोटे किसानों को सालाना छह हजार रुपए, सवर्ण वर्ग के कमजोर तबके के छात्रों को शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए देश भर में दो लाख सीटें बढ़ाना, व्यापारियों को जीएसटी में राहत देने की बात करना पांच करोड़ तक का व्यापार करने वालों को तीन माह में एक बार जीएसटी फाईल करना असंतोष की आग पर पानी डालने जैसा है। इसके अलावा और भी बहुत सारी राहत भरी घोषणाएं बजट में हुई हैं जिनपर पहली बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी खुशी से फूले नहीं समाते दिख रहे थे। बजट घोषणा के दौरान इस बार इतनी टेबल ठोंकी गई जितनी शायद पूरे पांच साल में कभी नहीं हुई होंगी। पहली बार बजट में किसान और मध्यम वर्ग का ध्यान रखने जैसी बातें हुईं। ऐसा इसलिए भी हुआ कि दो महिने पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने किसानों की कर्ज माफी के वचन पत्र के साथ भाजपा को मप्र,राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सत्ता से बेदखल कर दिया था। गुरूर में डूबे भाजपा नेतृत्व ने पहली बार किसान और मध्यम वर्ग की बजट में सुध ली। जिसे लोगों ने महसूस भी किया। इसका असर भी पाजिटिव हुआ लगा। घबराई कांग्रेस ने छोटे किसानों को छह हजार रुपए सालाना के हिसाब से 75 हजार करोड़ रुपए के बजटीय प्रबंध को लोकसभा चुनाव में अपने लिए खतरे की घंटी मान लिया है।


इसका असर कम करने के लिए कांग्रेस किसानों को दी जाने वाली रकम को करीब साढ़े सोलह रुपए प्रतिदिन में बांटकर इसे किसानों के अपमान से जोड़ रही है। यह सियासी चतुराई हो सकती है मगर हकीकत ये है कि किसानों को दो लाख का कर्जा माफ करने का जब कांग्रेस ने नारा दिया था तब भाजपाई भी उसे खारिज कर रहे थे। लेकिन चुनावी नतीजों ने साबित कर दिया कि कर्ज माफी का नारा असरदार था। ऐसे ही पांच लाख की इन्कम टैक्स फ्री और किसानों को आर्थिक मदद साथ ही बाईस फसलों में लागत मूल्य के साथ पचास फीसदी मुनाफा जोड़कर समर्थन मूल्य तय करना भाजपा के लिए लाभ का सौदा होगा। अब इसकी काट कांग्रेस को अपनी राज्य सरकारों के बजट में ढ़ढ़नी पड़ेगी। कर्ज और आर्थिक तंगी में डूबे मध्यप्रदेश समेत राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री मोदी बजट के कारण दबाव में हैं। उनके वित्तमंत्री और बजट विशेषज्ञ कर्ज माफी के वचन को पूरा करने की मशक्कत में लगे हैं और तभी किसानों और नौजवानों के लिए फिर से सुविधा देने की घोषणा करने का भार आ पड़ा है। कह सकते हैं इन राज्यों में जो बजट आएगा उसमें खुश करने वाली घोषणाएं देखने को मिलेंगी। किसानों के लिए फिर से सरकारें हनुमान जी की तरह छाती चीरकर दिखाएं तो हैरत नहीं होगी। सरकारें बताएंगी हमारे दिल में किसान ही हैं। सरकारें यदि ये कहें कि मन वचन और कर्म से हम किसानों के सबसे बड़े हित चिंतक हैं। बजट के प्रावधानों से ये साबित करने का कठिन काम वित्तमंत्रियों के माथे है।

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राघवेन्द्र सिंह

राघवेन्द्र सिंह प्रदेश के उन वरिष्ठ पत्रकारों में आते हैं जिनके राजनीतिक लेखन पर लोग अपनी राय तय करते हैं। दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, नईदुनिया सहित प्रदेश के कई अखबारों में अपनी पत्रकारिता का लौहा मनवा चुके राघवेन्द्र इन दिनों इलेक्ट्रिानिक मीडिया में भी बराबर दखल रखते हैं। राजनीतिक परिस्थितियों पर उनका कालम, 'ना काहू से बैर' इन दिनों चर्चित स्तंभ बना हुआ है।



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