ओबीसी आरक्षण में वर्गीकरण के बजाय क्रीमीलेयर की सीमा घटाना बेहतर



       केन्द्र की भाजपा सरकार संसद के मानसून सत्र में ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए पुन: प्रयासरत है। गौरतलब है कि पूर्व में यह प्रयास विपक्षी दलों के विरोध के कारण सफल नही हो सका है। दरअसल भाजपा अगर ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए वास्तव में गंभीर है तो वह वर्तमान आयोग को भी दिया जा सकता है। इसके लिए नया आयोग बनाने की कोई आवश्यकता ही नही है।  यह भी एक हकीकत है कि वर्तमान में ओबीसी की संपन्न जातियां ही आरक्षण का ज्यादातर लाभ ले रही हैं। भाजपा आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के बहाने ओबीसी की इन संपन्न जातियों, जो वर्तमान में कांग्रेस अथवा अन्य विपक्षी दलों को सहयोग कर रही हैं, के वर्चस्व को समाप्त करना चाहती है। भाजपा एन-केन प्रकारेण 52 फीसदी ओबीसी ब्लॉक को 3 टुकड़ों में बाटना चाहती है ताकि उसे ओबीसी की पिछड़ी और अति-पिछड़ी जातियों का समर्थन मिल सके। वर्गीकरण का ओबीसी की जातियों के उत्थान से कोई विषेष लेना-देना नही है। कुल मिलाकर यह विशुद्ध राजनैतिक लाभ-हानि का मामला है।  हालांकि मनमोहन सरकार के समय राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने ओबीसी को वर्तमान में प्राप्त 27 फीसदी आरक्षण को 3 श्रेणीयों में बांटने की सिफारिश की थी। आयोग का मत था कि ऐसा करने से समस्त जातियों में आरक्षण का लाभ समान रुप से मिलने की संभावना बढ़ जाएगी लेकिन  तब मनमोहन सरकार ने इस सिफारिश को लागू नही किया। अभी भी कांगे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी का ऐसा मानना है कि भाजपा सरकार ऐसा कर पिछड़ों की सौदेबाजी करने की ताकत को कम करने की कोशिश कर रही है। मुख्य विपक्षी दल के अध्यक्ष का यह रुख सहयोगी दलों के हितों को ही ज्यादा साधता दिख रहा है ना की ओबीसी को।


  गौरतलब है कि वर्ष 1953 में गठित काका कालेलकर आयोग ने वर्ष 1955 में ओबीसी की जातियों को आरक्षण देने की सिफारिश की थी लेकिन तत्कालीन कांग्रेसी सरकारों ने इसे लागू ही नही किया। कालेलकर आयोग की सिफारिशों को पूराना मानते हुए 1977 में केन्द्र की जनता पार्टी सरकार ने ओबीसी को आरक्षण देने हेतु मण्डल आयोग के नाम से नये आयोग का गठन किया जिसने अपनी रिपोर्ट 1980 में दे दी। विडम्बना यह रही कि जनता पार्टी की सरकार चली गई और इसके बाद की कांग्रेस सरकार ने इस रिपोर्ट को भी ठंडे़ बस्ते में डाल दिया। वर्ष 1989 में जनता दल की सरकार बनने के बाद चैधरी देवीलाल के विद्रोह को दबाने के लिए तत्कालीन प्रधान मंत्री वी.पी. सिंह ने आनन-फानन में इस रिपोर्ट की मात्र एक सिफारिश यानि केन्द्रीय सेवाओं में 27 फीसदी के प्रावधान को लागू कर दिया।  इतिहास गवाह है कि मण्डल आयोग की सिफारिष लागू होने पर अनारक्षित वर्ग के लोगों द्वारा भारी विरोध किया गया। भाजपा नेताओं ने भी इसका विरोध किया। लालकृष्ण अड़वानी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की यात्रा प्रारंभ कर दी जिससे पूरे देश का ध्यान मण्डल से हटकर कमण्डल की तरफ कर दिया गया। लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के पालन में वर्ष 1993 से केन्द्रीय सेवाओं में 27 फीसदी आरक्षण लागू हो सका। यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि ओबीसी आरक्षण को लागू होने के 25 वर्ष बाद भी केन्द्रीय सेवाओं में पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व महज दस प्रतिशत के आस-पास ही है।   सर्वोच्च न्यायालय ने ओबीसी को केन्द्रीय सेवाओं में आरक्षण देने के साथ ही इसमेंक्रीमीलेयर का प्रावधान कर दिया जिसमें 2 लाख की सीमा रखी गई। यह सीमा 2 लाख से बढ़कर 4, 4 से बढ़कर 6 और 6 से बढ़कर आज 8 लाख हो गई है जो  जरुरत से ज्यादा है।


मेरा ऐसा मानना है कि आज अगर किसी परिवार की 50 हजार रुपये मासिक आय है तो उसे क्रीमीलेयर में माना जाना चाहिए। इस हिसाब से क्रीमीलेयर 8 से घटाकर वापस 6 लाख कर देनी चाहिए ताकि ओबीसी की जो गरीब और अति पिछड़ी जातियां हैं, उनका प्रतिनिधित्व बढ़ सके, जो आरक्षण का असली मकसद है।  विडम्बना यह है कि पिछड़े वर्ग  के ज्यादातर राजनेता और सामाजिक संगठन क्रीमीलेयर को हटाने की मांग करते रहे हैं ताकि उनके स्वार्थों की पूर्ति होती रहे।ओबीसी के ये राजनेता और सामाजिक संगठन, जो संपन्न जातियों से संबंध रखते हैं, दिखावा तो समस्त जातियों के कल्याण का करते हंै लेकिन वास्तव में ये अपनी-अपनी जातियों के वर्चस्व को बनाये रखना चाहते हंै ताकि ओबीसी आरक्षण का उन्हें ही फायदा मिलता रहे। होना तो यह चाहिए कि ओबीसी के समस्त राजनेता और सामाजिक संगठन इकठ्ठे होकर सभी पिछड़ी जातियों के कल्याण के लिए काम करें और गरीब जातियों के उत्थान के रास्ते खोलने हेतु स्वयं पहल करें अन्यथा भाजपा जैसी पार्टी अपने राजनैतिक फायदे के लिएओबीसी की जातियों को तीन वर्ग में बाटने के लिए तैयार बैठी है। अगर ऐसा होता है तो भाजपा को इसका यूपी, म.प्र., राजस्थान जैसे राज्यों में राजनैतिक लाभ तो अवश्य होगा लेकिन पूर्व से ही अपनी-अपनी जातियों में बंटा हुआ वर्ग और विभाजित हो जाएगा, जो देश हित में नही है।  क्रीमीलेयर को इमानदारी से लागू कर समाज को और विभाजित होने से रोका जा सकता है। ओबीसीी के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनूसूचित जनजाति में भी क्रीमीलेयर लगाना समय की मांग है। ऐसा होने से एक तरफ जहां आरक्षण का विरोध खत्म हो जाएगा, वहीं दूसरी ओर देश के गरीब से गरीब तबके के व्यक्ति के विकास का मार्ग भी प्रशस्त हो सकेगा। मेरा मानना है कि संविधान निमार्ताओं द्वारा आरक्षण के प्रावधान को लागू करने की यही मंशा तो रही होगी लेकिन भाजपा और कांग्रेस जैसे दलों की नीति तो फूट डालो और राज करों की लगती है। क्या ऐसी नीतियों को लागू करने से भारत कभी विकसित राष्ट्र बन सकता है?  आजाद सिंह डबास (लेखक भारतीय वन सेवा के रिटायर्ड अधिकारी हैं)

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