स्वीकार करें मेरी बधाई.....



परम्पराएं धर्म की बैकबोन होती हैं। ये वो नियम-कायदे हैं, जिनके कारण वो धर्म, बाकियों से अलग बनता है। और जिन नियमों से किसी को नुकसान नहीं पहुंचता और जो उस धर्म को मानने वाले आराम से मान रहे हैं, उन पर आघात करने का मतलब उस धर्म को आघात पहुंचाना है। उस वकील नौशाद अहमद खान को बधाई, जिन्होंने लॉर्ड अयप्पा को मानने वाली उन महिलाओं की बेचैनी समझी जो सबरीमाला के दर्शन करना चाहती थीं और जिनकी अगुआई में वकीलों ने पीआईएल फाइल की। हालांकि उनमें एक भी अयप्पा भक्त नहीं था या थी। उस महिला एक्टिविस्ट रेहाना को भी बधाई, जिसने डिवोटी ना होने के बावजूद सबरीमाला मन्दिर तक पहुंचने के लिए 'हिंसक' भक्तों की भीड़ से लड़ाई की।


  उन सभी फेमिनिस्टों को भी बधाई, जो शायद कभी भी सबरीमला नहीं जाएंगी लेकिन जिन्होंने अपनी सोशल मीडिया दीवारों के जरिए यह जताया कि मन्दिर में जाने की अनुमति मिलना, महिला और पुरुषों के बीच इक्वेलिटी लाने के लिए अत्यधिक जरूरी है। बधाई की पात्र वो दो महिलाएं भी हैं, जो अयप्पा डिवोटी तो नहीं हैं लेकिन जिन्होंने महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ी और रात के अंधेरे में गर्भगृह जाकर सैकड़ो वर्षों पुरानी परम्परा तोड़ने की हिम्मत दिखाई।  एक बधाई उन सभी आजादख़्याल महिलाओं को भी बनती है, जिन्हें अपने धर्म की पाबन्दियों से तो कोई परेशानी नहीं है लेकिन उन्होंने अयप्पा भक्त महिलाओं के लिए ह्यूमन चेन बनाकर उनकी ईक्वेलिटी की वकालत की। इस बधाई के महत्वपूर्ण पात्र हैं- केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन साहब। सुप्रीम कोर्ट के आॅर्डर के प्रति इनकी निष्ठा लाजवाब है।


भले ही महिला जज ने ऐतराज जताया था, भले ही कोर्ट में रिव्यू पैटीशन डाली गई थी, भले ही लगातार भक्त विरोध कर रहे थे, लेकिन इन्होंने अपना सारा ध्यान, राज्य से जुड़े बाकी सारे महत्वपूर्ण मुद्दों को छोड़कर सुप्रीम कोर्ट का आॅर्डर फॉलो करने में लगाया और चोरी छिपे, रात के अंधेरे में, प्रशासनिक मार्ग से, कैमरे के साथ दो महिलाओं को सबरीमाला के गर्भगृह में ना केवल प्रवेश कराया बल्कि बहुत ही गर्व के साथ अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए वो विडियो भी बाकायदा प्रेस को दिया। इन्होंने कोर्ट के आदेश के ऊपर राज्य में होने वाले कैओज की भी चिन्ता नहीं की।   और सबसे ज्यादा बधाई के पात्र हैं  वो 'निष्पक्ष' मीडियाकर्मी जिन्हें वो ह्यूमन चेन तो दिखाई दी जिसमें एक भी अयप्पा डिवोटी नहीं था, लेकिन केरल की लाखों अयप्पा डिवोटी महिलाओं का शान्तिपूर्ण दीप प्रज्वलन वाला विरोध नहीं दिखा। जो इस बात पर खुश हैं कि केरल, जो कि सौ प्रतिशत साक्षरता वाला राज्य है, वहां की दबी कुचली महिलाओं को इन्होंने पुरुषों के बराबर ईक्वेलिटी दिला दी।  मुूबारक, मुबारक, मुबारक, हम इस धर्मनिरपेक्ष देश में जहां सभी अपने अनुसार अपने धर्म को मानने और उसकी परम्पराओं का पालन करने के लिए स्वतन्त्र हैं, लोगों की धार्मिक सम्प्रभुता को जीवित रख पाए।     

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चित्रा अग्रवाल

चित्रा अग्रवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं जिन्होंने प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में सफलतापूर्वक काम किया है। दैनिक जागरण, अमर उजाला से लेकर आज तक में काम करने के बाद इन दिनों वे दिल्ली में पत्रकारिता के विद्यार्थियों को पढ़ा रही है। सामयिक मुद्दों पर चित्रा सटीक टिप्पणी करती हैं।



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