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बदजुबान नेताओं की नकेल चुनाव आयोग नहीं वोटर के हाथ है...

राज्य की विधानसभाओं और लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों से जिस आचार संहिता की इमानदारी से पालन करने की अपेक्षा की जाती है उसकी उपेक्षा और अनादर करने वाले नेता हर राजनीतिक दल की कमजोरी होते है। खेद की बात यह है कि राजनीतिक दल खुद होकर अपने नेताओं को ऐसी हिदायत कम ही देते है कि वे चुनावी रैलियों अथवा सोशल मीडिया के जरिए ऐसे बयान देने से परहेज करे ,जिनसे धर्म अथवा जाति के नाम पर चुनावों की निष्पक्षता के प्रभावित होने की आशंका हो। read more  आगे पढ़ें

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तो सवाल यह है कि सवालों से डरता कौन है?

मनन कीजिए कि दुनिया में यदि कुछ भयंकर है तो वो सवाल है और कुछ मुश्किल है वह है जवाब देना । कयामत के दिन ईश्वर को जवाब देना है,घर जाकर पिताजी को या पत्नी को। बॉस या मालिक नामक प्राणी का तो अस्तित्व ही जवाब मांगने पर टिका हुआ है । read more  आगे पढ़ें

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ग्वालियर का एयरबेस, खमरिया के बम और हमारी अवनि चतुर्वेदी

मैं उन बौद्धिकों की बात नहीं करता जो हमारे जवानों पर थूकने, पत्थर बरसाने वालों के भी मानवाधिकार का परचम थामें इंडिया इंटरनेशनल में प्रेसकांफ्रेंस संबोधित करते हैं और सुप्रीमकोर्ट में याचिकाओं का बोझ बढ़ाते हैं। बहरहाल ग्वालियर और जबलपुर के लिए गौरव का ये क्षण तो है ही अपने विंध्यवासियों के लिए भी कम नहीं। सोशलमीडिया पर रीवा की बेटी अवनि चतुर्वेदी की फोटो तैर रही है- कि आतंकियों का काम तमाम करने वाली टुकड़ी की कमान उसके हाथों में थी। इसे आप भावनाओं का महज प्रकटीकरण भी कह सकते हैं। बालाटोक स्ट्राइक में कौन थे..कौन नहीं यह तो उस आपरेशन के सुप्रीम कमांडर ही जानते हैं..। कभी उचित समय पर हो सकता है कि इन वीर जाँबाजों के परिचय को देश के साथ साझा करें। लेकिन अवनि जैसी बेटियों के पराक्रमी क्षमता के स्मरण का अवसर तो बनता ही है। read more  आगे पढ़ें

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समय है देश विरोधियो के चहरे से नकाब उतारने का

पाक परस्ती के चलते जो लोग यह कहते हैं कि युद्ध किसी समस्या का विकल्प नहीं होता उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि युद्ध किसी समस्या का पहला विकल्प नहीं होता लेकिन अंतिम उपाय और एकमात्र समाधान अवश्य होता है। श्री कृष्ण ने भी कुरुक्षेत्र की भूमि पर गीता का ज्ञान देकर महाभारत के युद्ध को धर्म सम्मत बताया था। और जो लोग यह कहते हैं कि 1947 से लेकर आजतक कश्मीर के कारण भारत और पाकिस्तान में कई युद्ध हो चुके हैं तो क्या हुआ? तो उनके लिए यह जानना आवश्यक है कि हर युद्ध में हमारी सैन्य विजय हुई लेकिन राजनैतिक हार। हर युद्ध में हम अपनी सैन्य क्षमता के बल पर किसी न किसी नतीजे पर पहुंचने के करीब होते थे लेकिन हमारे राजनैतिक नेतृत्व हमें किसी नतीजे पर पहुंचा नहीं पाए। यह वाकई में शर्म की बात है कि हर बार हमारी सेनाओं द्वारा पाकिस्तान को कड़ी शिकस्त देने के बावजूद हमारी सरकारें कश्मीर समस्या का हल नहीं निकाल पाईं।read more  आगे पढ़ें

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जीने की ख्वाहिश है तो मरने की तैयारी रख..!

राष्ट्र युद्ध का अभिषेक माँगता है..हमारी पीढ़ी शून्य से फिर उठेगी और डरपोक बनकर खोल में घुसे रहने की बजाय लड़कर मर जाना चाहेगी। और कृष्ण का भी एक ही सूत्र वाक्य था..पार्थ हिजड़ापन न दिखा..युद्ध कर। उन्हीं कर्मयोगी महापराक्रमी कृष्ण का गीता में उपदेश है.. खड्गेन आक्रम्य भुंजीतः,वीर भोग्या वसुंधरा ।। अर्थात् तलवार के दम पर पुरुषार्थ करने वाले ही विजेता होकर इस रत्नों को धारण करने वाली धरती को भोगते हैं। राम और कृष्ण इसलिए हमारे आभीष्ठ हैं क्योंकि दोनों ही योद्धा हैं..शांति, युद्ध का ही भजनफल है..। read more  आगे पढ़ें

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पाकिस्तान के बिखराव में छुपा है आतंकवाद जैसी समस्याओं का हल

भारत के जनमानस में अब बात स्थापित की जाना चाहिए,कि जिस स्थान पर आज पाकिस्तान नामक देश स्थापित है,वह असल में हमारा भूभाग है। हमारे सारे प्रयत्न अब इस बात के लिए होने चाहिए कि पाकिस्तान नामक यह अवास्तविक देश अब समाप्त होना चाहिए। भारत को बेझिझक पूरे विश्व समुदाय के सामने यह तथ्य रखना चाहिए कि 71 वर्ष पहले भारत के तत्कालीन नेताओं पर गलत तरीके से दबाव डाल कर बंटवारा करवाया गया था। अब समय उस गलती को सुधारने का है। यह तथ्य भी याद रखा जाना चाहिए कि आज भारत में जितने प्रान्त है,वे सभी आजादी के समय से भारत में नहीं है। गोवा,सिक्किम जैसे प्रान्त भारत की आजादी के कई सालों बाद भारत में शामिल हुए हैं। यह प्रक्रिया आगे भी जारी रह सकती है।read more  आगे पढ़ें

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चलें देखें अमरकंटक..नर्मदा मैय्या का उद्गम

नमामि देवि नर्मदे पवित्र अभियान है। पर क्या अकेले कोई सरकार या संस्था इसे चला सकती है। मां नर्मदा का स्वच्छता अभियान चले ही मां की मुक्ति का भी अभियान चले। इन्हें उन धुरंधरों से भी मुक्त कराएं जो मां के ह्रदय में पाखंड का चिमटा गाडे भावनाओं का धंधा कर रहे हैं। यह मुक्ति का अभियान अमरकंटक से ही शुरू होना चाहिए ...मां का उद्गम रहे, माई की बगिया रहे, वही प्राकृतिक सुषमा लौटे, फिर त्रिबिध बयार बहे, कालिदास का यक्ष पुनः अपनी प्रियतमा तक मेघदूतों के जरिए प्रणय निवेदन प्रेषित करे..। read more  आगे पढ़ें

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पुलवामा के बाद ऐसी देशभक्ति को ओढ़ें या बिछाएं...

पुलवामा के बाद देशभक्ति का जो सैलाब उमड़ रहा है उसमें हर रोज राष्ट्रद्रोह करने वाले भी मोमबत्ती जला रहे हैं। पेट्रोल-डीजल से लेकर आटे-दाल तक में मिलावट करने वाले देशभक्ति का जयघोष कर रहे हैं। नकली दवाएं बनाना , नकली दूध से लेकर मुर्दाघर में लाश देने के लिए रिश्वत मांगने वाले भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जिस दिन पुलवामा हादसे की तरह विरोध शुरू हो जाएगा उस दिन न पठानकोट होगा न संसद पर हमला होगा और न कारगिल से लेकर पुलवामा होगा। विधानसभा और लोकसभा में कार्यवाही का हंगामे की भेंट चढ़ जाना क्या देशभक्ति का आचरण है। रक्षा सौदों में दलाली, किसान और जवानों के मामले में गलत नीतियां देशभक्ति के दायरे में तो नहीं आती।  आगे पढ़ें

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अब छलनी कर दो मौत के सौदागरों को

अब अपने आप में बड़ा सवाल यह है कि खुफिया एजेंसियों के इनपुट की अनदेखी क्यों होती है? हरेक बड़ी घटना के बाद खबरें आने लगती हैं कि खुफिया एजेंसियों ने हमले की आशंका तो पहले से जता दी थी। अगर खुफिया एजेंसियों की तरफ से एकत्र सूचनाओं की ही बार-बार अनदेखी की जानी चाहिए, तो फिर खुफिया एजेंसियों पर सरकारें हरेक साल हजारों करोड़ों रुपये फूंकती ही क्यों हैं? फिर तो इनके दफ्तरों पर ताले लगा देने चाहिए। पर बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि पुलवामा में देश के 44 शूरवीरों के दर्दनाक बलिदान के बाद भी हमारे कुछ कथित नेता बयानबाजी से बाज नहीं आ रहे हैं।  आगे पढ़ें

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ये पाकिस्तान पर चढ़ाई का सही समय है सरकार...आगे बढिये न...!

यह समय सवाल जवाब का नहीं है ,लेकिन इतना तो तय हो ही गया इसमें हमारी ही किसी चूक से आतंकी हमला करने में सफल हुए है। बताया गया है कि ख़ुफ़िया एजेंसियों ने 8 फरवरी को अलर्ट जारी कर दिया था कि घाटी में सुरक्षा बलों की तैनाती अथवा आवाजाही के दौरान आतंकी हमला करने की योजना बना रहे है। जिस राजमार्ग पर यह हमला किया गया है, वह अत्यंत सुरक्षित व संवेदनशील माना जाता है ,फिर उस एसयूवी की जांच क्यों नहीं की गई जिसमे विस्फोटक रखा हुआ था। अगर इस वाहन की जांच की गई होती तो इस हमले को टाला जा सकता था। इसके आलावा एक सवाल और भी है कि सीआरपीएफ के उस काफिले में 2500 से अधिक जवान क्यों थे, जबकि सामान्यतः एक काफिला 1000 जवानों का होता है। इतनी बड़ी संख्या में जवानों के होने के बाद की गई अनदेखी से ही आतंकियों को सुनहरा मौका मिला है।read more  आगे पढ़ें

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