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कटाक्ष: हाथ जोड़ फिर तोड़—फोड़

चुनावी मौसम आ गया है और एक बार फिर नेताओं को जनता की याद आने लगी है। लोकसभा चुनाव से पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं, सो नेताओं की सिरदर्दी शुरू हो गई है। विधानसभा चुनाव में जीत ही दिल्ली का रास्ता दिखाएगी। यह सोच सब नेता अपनी खोल से निकल गए हैं।  आगे पढ़ें

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वन नेशन वन इलेक्शन की कल्पना को मूर्त रूप दिला पायेगी विधि आयोग की बैठक?

यह भी आश्चर्य का विषय है कि इस अवधारणा का विरोध करने वाली कांग्रेस और अन्य विरोधी दल इस सत्य को कैसे विस्मृत कर गए कि देश मे 1952 से लेकर 1967 तक लोकसभा एवं सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही कराए जाते थे। हालांकि तब औऱ अब की परिस्थितियों में बड़ा अंतर आया है। अब यदि पुरानी परंपरा को फिर शुरू करना है तो मामूली संवैधानिक संसोधन से संभव नही है। तब देश मे इतने क्षेत्रीय दल नही थे।गठबंधन की सरकारें अस्तित्व में नही थी।1967 के बाद गैर कांग्रेसवाद की शुरुआत हुई है।  आगे पढ़ें

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इसलिए नोटबंदी से ज्यादा जरूरी है पोर्नबंदी

वर्जनाएं टूट गईं सबकुछ खुल्लमखुल्ला हो गया। पहले कैसेट्स में ब्लू फिल्में आईं,फिर ये कम्प्यूटर में घुसीं और अब इनकी जगह जेब के मोबाइल फोन में बन गई। बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती है कि कुल नेट सामग्री में तीस फीसद पोर्न सामग्री। है। दो साल पहले मैक्स हास्पिटल ने स्कूली छात्रों के बीच सर्वे के बाद पाया कि 47 फीसद छात्र रोजाना पोर्न की बात करते हैं।  आगे पढ़ें

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सरकार के भगोड़ा आर्थिक अपराधी अध्यादेश से घबराये माल्या

शराब कारोबारी विजय माल्या ने दो साल बाद अपनी चूप्पी थोड़ी है,तो इसका प्रमुख कारण प्रवर्तन निदेशालय द्वारा मुंबई की विशेष अदालत में लगाई गई वो अर्जी है, जो भगोड़े कानून के तहत भारत मे उनकी संपत्ति जब्त करने दाखिल की गई है। इस अर्जी के बाद ही माल्या ने चूप्पी तोड़ते हुए बकाया वापस करने की पेशकश की है, लेकिन प्रवर्तन निदेशालय ने उनकी पेशकश को ठुकरा दिया है।  आगे पढ़ें

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ओबीसी आरक्षण में वर्गीकरण के बजाय क्रीमीलेयर की सीमा घटाना बेहतर

यह भी एक हकीकत है कि वर्तमान में ओबीसी की संपन्न जातियां ही आरक्षण का ज्यादातर लाभ ले रही हैं। भाजपा आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के बहाने ओबीसी की इन संपन्न जातियों, जो वर्तमान में कांग्रेस अथवा अन्य विपक्षी दलों को सहयोग कर रही हैं, के वर्चस्व को समाप्त करना चाहती है। भाजपा एन-केन प्रकारेण 52 फीसदी ओबीसी ब्लॉक को 3 टुकड़ों में बाटना चाहती है ताकि उसे ओबीसी की पिछड़ी और अति-पिछड़ी जातियों का समर्थन मिल सके। read more  आगे पढ़ें

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मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग पर तमाशा

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का नोटिस नामंजूर करने के राज्यसभा सभापति के फैसले के विरोध में दायर याचिका को कांग्रेसी सांसद एवं वकील कपिल सिब्बल ने जिस तरह वापस लिया उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर वह चाहते क्या हैं? उनकी ओर से जिस आधार पर यह याचिका वापस ली गई उससे तो यही लगता है कि वह या तो इस मसले को तूल देकर कोई संकीर्ण राजनीतिक हित साधना चाहते हैं या फिर इस कोशिश में हैं कि उनकी मनपसंद बेंच ही इस मामले की सुनवाई करे? आम तौर पर किसी भी याचिकाकर्ता की पहली कोशिश यह होती है कि उसकी सुनवाई जल्द से जल्द हो, लेकिन किन्हीं अबूझ कारणों से कपिल सिब्बल यह जानने पर अड़े कि पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किसने और किस आधार पर किया? यह जानने का औचित्य समझना इसलिए कठिन है, क्योंकि न तो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इस याचिका की सुनवाई करने वाली पीठ का हिस्सा थे और न ही वे चार वरिष्ठ न्यायाधीश जिन्होंने सार्वजनिक रूप से सामने आकर यह शिकायत की थी कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ सही नहीं। न्याय और नैतिकता का तकाजा यही कहता था कि इस याचिका की सुनवाई से मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ चार वरिष्ठ न्यायाधीश भी दूर रहें। ऐसी ही व्यवस्था की गई और सुप्रीम कोर्ट के छह से दस नंबर तक के पांच शीर्ष न्यायाधीशों को यह मामला सौंपा गया। जैसे यह जरूरी था कि हितों के टकराव से बचने के लिए मुख्य न्यायाधीश इस मामले की सुनवाई से दूर रहें वैसे ही वे चार वरिष्ठ न्यायाधीश भी जिनकी शिकायत ही एक तरह से महाभियोग नोटिस का आधार बनी। आखिर इस सबसे कहीं भली तरह परिचित होने के बाद भी कपिल सिब्बल चार वरिष्ठ न्यायाधीशों में से एक से ही अपनी याचिका को सूचीबद्ध कराने पर क्यों अड़े? मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत का झंडा बुलंद करने वाले न्यायाधीश से ही उनसे संबंधित याचिका को सूचीबद्ध करने को कहना हितों के टकराव से भी कहीं अधिक गंभीर बात है। महाभियोग सरीखे गंभीर मामले में तमाशा करने का जैसा काम किया गया उसकी मिसाल मिलना कठिन है। समझना कठिन है कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाने की अगुआई करने वाले कपिल सिब्बल उक्त याचिका पर बहस करने कैसे पहुंच गए? क्या यह हितों का एक और टकराव नहीं? अगर कपिल सिब्बल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य के साथ ही एक बड़े वकील हैं तो इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि उन्हें यह तय करने का अधिकार दे दिया जाए कि किस याचिका की सुनवाई कौन करे और कौन नहीं? उन्होंने याचिका वापस लेकर एक तरह से यह भी माहौल बनाया कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ छह से लेकर दस नंबर तक के पांच शीर्ष न्यायाधीशों पर भी भरोसा नहीं? भले ही वह यह कह रहे हों कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट की साख की परवाह है, लेकिन उनका आचरण ठीक इसके उलट है। इससे गंभीर बात और कोई नहीं हो सकती कि वरिष्ठ वकील ही सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा से जानबूझकर खिलवाड़ करते नजर आएं। [ मुख्य संपादकीय ]  आगे पढ़ें

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विपक्षी एकता से टूटेगा मोदी शाह का तिलिस्म

हॉल में ही संपन्न हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव के माध्यम से राज्य में कांग्रेस जेडीएस व बसपा की सेक्युलर सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त होने के बाद भाजपा विरोधी दलों ने सारे आपसी मतभेद भुलाने के हर संभव प्रयास कर दिए है।  आगे पढ़ें

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शिक्षा बनाम लोक संस्कृति

हाल ही में राजस्थान के समाचार पत्रो में एक खबर पढऩे को मिली कि राजस्थान सरकार ने निर्णय किया है कि आने वाले शिक्षा सत्र में राजस्थान शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त सभी सरकारी व गैर सरकारी प्रारम्भिक व माध्यमिक स्कूलों में हर शनिवार को सामाजिक सरोकार से जुड़ी शिक्षा प्रदान की जायेगी।  आगे पढ़ें

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राजकपूर और विंध्य की सांस्कृतिक विरासत

प्रायः लोग जिग्यासावश पूछ बैठते हैं कि भला राजकपूर का रीवा से क्या रिश्ता रहा है..? वर्षों-वर्ष तक मुझे भी नहीं मालुम था। एक साहित्यिक समारोह में विंध्य के संस्कृतिकर्मियों ने इस तथ्य की ओर मेरा ध्यान आकर्षित करते हुए एक सुविधा संपन्न रंगशाला की मांग की। तभी मैंने जाना कि राजकपूर की बारात रीवा आई थी व यहीं उनकी शादी हुई।  आगे पढ़ें

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राजकपूर और विंध्य की सांस्कृतिक विरासत

प्रायः लोग जिग्यासावश पूछ बैठते हैं कि भला राजकपूर का रीवा से क्या रिश्ता रहा है..? वर्षों-वर्ष तक मुझे भी नहीं मालुम था। एक साहित्यिक समारोह में विंध्य के संस्कृतिकर्मियों ने इस तथ्य की ओर मेरा ध्यान आकर्षित करते हुए एक सुविधा संपन्न रंगशाला की मांग की। तभी मैंने जाना कि राजकपूर की बारात रीवा आई थी व यहीं उनकी शादी हुई।  आगे पढ़ें

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