महाराष्ट्र: समय पर पैसा न मिलने से हिंसक हुए गन्ना किसान, दो चीनी मिलों में लगाई आग, चार में की तोड़फोड़



कोल्हापुर। गन्ना किसानों को कम कीमत, वह भी देरी से दिए जाने को लेकर पैदा नाराजगी ने महाराष्ट्र के कोल्हापुर में शनिवार को हिंसक रूप ले लिया। यहां कुछ गांववालों ने दो शुगर मिलों के दफ्तरों में आग लगा दी और चार आफिस बंद करा दिए। जिन दो मिलों के दफ्तरों में आग लगाई गई वे सतारा और सांगली जिले की हैं, जबकि कोल्हापुर के चार दफ्तरों में तोड़फोड़ की गई और जबरन बंद करा दिए गए। पुलिस ने तीनों जिलों में चीनी मिलों की सुरक्षा कड़ी कर दी है। पुलिस ने बताया है कि अज्ञात लोगों के खिलाफ 6 मामलों में केस दर्ज किए गए हैं और हमलावरों की पहचान करने की कोशिश की जा रही है।


घटना उस वक्त हुई जब किसानों को पता चला कि ज्यादातर प्राइवेट और कोआॅपरेटिव चीनी मिलों ने उन्हें दी जाने वाली कीमतों का केवल 80% ही उनके बैंक अकाउंट्स में जमा किया है। इस बात पर वे नाराज हो गए क्योंकि उनसे गन्ना लिए जाने के 14 दिन के अंदर पूरा पेमेंट किया जाना अनिवार्य होता है। फैक्ट्रियों ने 2,300 रुपये प्रति टन के हिसाब से पैसे जमा कराए जबकि सही दाम 2,800 रुपये प्रति टन है। महाराष्ट्र की ज्यादातर फैक्ट्रियों ने किसानों को तीन महीने से पेमेंट नहीं किया है जिससे इस क्षेत्र में नाराजगी है। सांगली और कोल्हापुर जिलों की 37 फैक्ट्रियों को शुगरकेन कंट्रोल ऐक्ट का उल्लंघन करने के लिए शुगर कमिश्नर के आॅफिस से नोटिस भेजा जा चुका है।


पश्चिमी महाराष्ट्र में गन्ना किसान परेशान पुलिस ने बताया कि अज्ञात लोगों ने सांगली की क्रांति शुगर फैक्ट्री और सतारा की कृष्णा शुगर फैक्ट्री के बाहर जमा होकर आॅफिस में आग लगा दी। पुलिस के मुताबिक हमलावरों ने आॅफिसों को भारी नुकसान भी पहुंचाया। कोल्हापुर के जवाहर, डट्टा, गुरुदत्ता और कुरुंदवाड में भी चार दफ्तरों में भी तोड़फोड़ की गई। बाद में इन दफ्तरों को गुस्सा भीड़ ने बंद भी करा दिया। बता दें कि पश्चिमी महाराष्ट्र में किसानों के लिए गन्ने के कीमत नहीं दिया जाना एक बड़ी समस्या बन चुका है। फैक्ट्रियों ने दिया कम रीटेल कीमत का हवाला उधर, फैक्ट्रियों को कहना है कि एक बार में किसानों का पूरा पेमेंट देना उनके लिए मुश्किल है। उन्होंने इसके लिए उत्पादन की कीमत और रीटेल मार्केट में चीनी की कीमत को वजह बताया है। स्वाभिमानी शेटकरी संगठन ने चेतावनी दी है कि आधे पेमेंट को मंजूर नहीं किया जाएगा। संगठन के मांग की है कि अतिरिक्त 22 रुपये प्रति टन उचित एवं लाभकारी मूल्य दिया जाए।  

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