"आदमी आईना ही नहीं देखता अगर उसमें चेहरे की जगह मन दिखने लगता'



कला, संस्कृति और शिक्षा विमर्श के लिए प्रतिबद्ध मंच "सृजना' की ओर से शहर की वरिष्ठ रचनाकार बसंती पंवार रचित हिंदी व्यंग्य संग्रह "नाक का सवाल' और राजस्थानी काव्य संग्रह "जोवूं एक विसवास' का लोकार्पण रविवार को किया गया। प्रोग्राम के चीफ गेस्ट बीकानेर के वरिष्ठ व्यंग्यकार, कथाकार और स्तंभकार बुलाकी शर्मा ने कहा कि पुस्तक का जीवन में महत्वपूर्ण योगदान है। पुस्तक के बिना अपनी लाइफ अधूरी है क्योंकि पुस्तक ही हमें अपनी लाइफ में आगे बढ़ना सिखाती है तथा जो ज्ञान हमें पुस्तकों से मिलता है वो ज्ञान हमें ओर कहीं से भी नहीं मील सकता। लेखक की रचनात्मक ऊर्जा उनके लेखन को श्रेष्ठ बनाती हैं। "नाक का सवाल' में समाज के सभी तबकों को टटोला गया है। ये व्यंग्य समाज की विसंगतियों को उजागर करने का साहसिक प्रयास है।


विशिष्ट अतिथि जोधपुर के वरिष्ठ आलोचक और कवि डॉ. रमाकांत शर्मा ने कहा कि इन रचनाओं में परंपरा की झलक के साथ आधुनिकता का बोध मिलता है। "आदमी आईना नहीं देखता अगर उसमें चेहरे की जगह मन दिखता' जैसी क्षणिकाएं पुस्तक की खूबी हैं। अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ रचनाकार और सृजना की अध्यक्ष सुषमा चौहान ने कहा कि लेखिका के मन की कुलबुलाहट उनकी रचनाओं में साफ नजर आती हैं। पंवार के रचनाकर्म एवं कृतियों पर पत्रवाचन डॉ. चांद कौर जोशी एवं वाजिद हसन काजी ने किया। सृजना संस्था के सचिव डॉ. हरिदास व्यास ने स्वागत उद्बोधन दिया। राजस्थानी की पहली उपन्यासकार बसंती पंवार के पूर्व में "सौगन'' और "ऐडो क्यूं'' नामक दो राजस्थानी उपन्यास, एक हिंदी कविता संग्रह "कब आया बसंत'', राजस्थानी कहानी संग्रह "नुवौ सूरज'' राजस्थानी में बाल साहित्य की दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।


इन्हें राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर, पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी, शिलांग, तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी आदि के महत्वपूर्ण पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। पंवार को अब तक चौदह सम्मान और दो पुरस्कार मिल चुके हैं। कार्यक्रम में अतिथियों ने व्यंग्य व काव्य संग्रह का लोकार्पण किया। न जाने कितने मुखौटे लगाकर जी रहा है इंसान: पंवार विमोचित पुस्तकों के चुनिंदा अंश का पाठन करते हुए लेखिका बसंती पंवार ने रचना प्रक्रिया को साझा किया। "श्मशान घाट की सेल्फी के साथ फीलिंग सैड जैसे स्टेटस के उल्लेख के साथ उन्होंने समाज के बदलते रूप को चित्रित किया। "नाक का सवाल' पुस्तक की बात करते हुए उन्होंने बताया, इंसान जैसा खुद को दिखाना चाहता है या दिखाता आ रहा है, रियलिटी में वैसा वह बिल्कुल नहीं होता। वह ना जाने कितने ही मुखौटे अपने सर पर लगाकर जीवन बिताता है। "जोवूं एक विसवास' में राजनीति, हास्य, समाज, आधुनिक न्याय, जीवन के मूल्य के बारे में बताया गया है।

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