महाभारत 2019: डिजास्टर टूरिज्म की वजह से आपदा अब उत्सव बन रही है- कुमार विश्वास की व्यंग्य श्रृंखला



हाजी आज जब घर आए तो उनका पजामा नब्बे प्रतिशत गीला था। ऐसा लग रहा था कि जीवन की वैतरणी इन्हीं पजामों में पार करके आ रहे हैं। मैंने छेड़ा, ‘यार हाजी! आज तो कतई ड्राई क्लीन होकर आ रहे हो!' हाजी ने कहा, ‘मजाक मत करो महाकवि! नरक पालिका, माफ करना नगर पालिका के शानदार इंतजामों के कारण शहर में तो जैसे अघोषित बाढ़ ही आ गई है।' मैंने कहा, ‘अब ये न कह देना कि पिछले कुम्भ से नहीं धुले तुम्हारे चीकट कपड़े धोने को सरकार ही मुआवजा दे।' हाजी बोले, ‘जिनको मिलना चाहिए उनको तो ठीक से मिल नहीं रहा, हमारा तो जाने ही दो। सरकारों को इतनी ही शर्म होती तो हर बार चिंतित होने की नौटंकी छोड़कर इस बारे में सोचते कि बाढ़ को आने से कैसे रोका जाए। भगवान जाने ये डिजास्टर मैनेजमेंट के नाम पर पूड़ी-सब्जी बांटने और सरकारी लूट-खसोट से ऊपर कब उठेंगे।' मैंने कहा, ‘हर बात पर क्यों सरकारों को कोसते हो हाजी! जाते तो हैं नेता देखने।' हाजी सामने चल रहे टीवी की ओर इशारा करके बोले,‘ये वाला झरोखा दर्शन? यकीन मानो महाकवि, इसे डिजास्टर टूरिज्म से ज्यादा कुछ न कहो।


' फिर रुककर बोले, ‘अच्छा चलो ये बताओ, जितनी ऊंचाई से ये नेता बाइस्कोप देखकर चले आते हैं, उतनी ऊंचाई से कौन देखता होगा?' मैंने पूछा, ‘कौन?' हाजी बोले, ‘इतनी ऊंचाई से तो गिद्ध देखते हैं, गिद्ध!' हाजी अजीब-सी झुंझलाहट में आ गए। मैंने उन्हें वहां से उतारने के लिए पूछा, ‘अच्छा हाजी पता है, अपन बचपन से ही यही देखते आ रहे हैं। इतने ऊपर से हाथ हिलाता देख मुझे लगता है जैसे ये ऊपर से हाथ हिला-हिलाकर कह रहे हों, नहीं नहीं, हम कुछ नहीं कर सकते। हमसे कोई उम्मीद मत रखो।' हाजी ठठाकर हंसे, ‘सही कह रहे हो महाकवि! वो कहते भी यही हैं, और करते भी यही हैं। और एक तरफ ये मीडिया वाले ऐसी हरकतों को ईश्वरीय हाथ मानकर पूरे दिन दिखाते रहते हैं।' मैंने जोड़ा, ‘तुम्हें तो पता है हाजी, सब टीआरपी का खेल है। नेता वहां जाकर हेलिकॉप्टर से झरोखा दर्शन करते हैं, और यहां हम-तुम इस डिब्बे के सामने बैठकर। कुल-मिलाकर एक आपदा को एक उत्सव के पास लाकर खड़ाकर दिया गया है।' हाजी ने भी दुर्दशा की कहानी को आगे धकेला, ‘ये तो है भाई।


जिस पर बीतती है, उसके लिए पीड़ा है, बाकी सबके लिए कहानी है। लेकिन करें भी तो क्या?' मैंने जोड़ा, जो कर सकता था वो तो किया है। सब ही कर रहे हैं। केरल की हालत सब से बुरी है। मुख्यमंत्री राहत कोष में अपनी क्षमतानुसार जो भेज सकता था, वो मैंने भेज दिया है।' हाजी ने उत्सुकता जताई, ‘अच्छा! कैसे भेज सकते हैं?' मैंनेफिर से हाजी के मजे लिए, ‘यही होता है जब कोई जवानी में बूढ़ा हो जाए। जितनी रुचि तुम्हारी राजनीति और दुनियादारी में है हाजी, उतनी अगर टेक्नोलॉजी में भी हो जाए तो क्या कहने। अब एप्प-वेप्प तो तुम इस्तेमाल करने से रहे। सो ऐसा करो, एक चेक दे दो, मैं अपने ऑफिस से भिजवा दूंगा।' हाजी बोले, ‘अच्छी बात निकल आई महाकवि! वरना मैं भी टीवी देख-देखकर कुछ न कर पाने का फ्रस्ट्रेशन झेलता रहता। मैं चेक भिजवाता हूं।' फिर आंख मारकर बोले, ‘डोनेशन के गुप्तदान का इस्तेमाल तो लोगों ने सीटें खरीदने तक में किया है। मेरे डोनेशन से किसी की जान बच जाए, यही बहुत है। तुम्हारे ही गुरु कुंवर बेचैनजी का शेर है ना महाकवि! गमों की आंच पर आंसू उबालकर देखो बनेंगे रंग किसी पर डालकर देखो तुम्हारे दिल की चुभन जरूर कम होगी किसी के पांव का कांटा निकालकर देखो’

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