मायानगरी में घुट रहा था नीरज की लेखनी का दम



कहते हैं कि मायानगरी की रंगीन दुनिया में जाकर हर कोई खो जाता है। रंगीन दुनिया की चकाचौंध उसे कभी वापस नहीं लौटने देती है, लेकिन यायावर, फक्कड़ और तूफानी मिजाज के गोपाल दास नीरज को मायानगरी रास नहीं आई। एक दशक तक बॉलीवुड को कई मशहूर गानों से नवाजने वाले नीरज की आत्मा साहित्यिक लेखनी के रूप में उनकी रगों में बहती व बसती थी, लेकिन मायानगरी मुंबई की भागमभाग में नीरज की लेखनी का दम घुट रहा था। पिता के जीवन से जुड़ी ये अहम बातें एम्स में मौजूद उनकी बेटी कुंदनिका शर्मा ने बताई।


आगरा के बल्केश्वर की रहने वालीं कुंदनिका ने बताया कि उन्हें याद है कि उनके पिता ने जीवन में कितना संघर्ष किया और जिंदगी के हर कदम पर संघर्ष करने की नसीहत दी। वह मुंबई में वर्ष 1960 से 1975 के बीच नीरज के साथ रहीं। उन्होंने बताया कि मुंबई की चकाचौंध भरी जिंदगी के बीच भी पिताजी ने सादगी से जीवन जिया। मुंबई की भागदौड़ वाली जिंदगी उन्हें कभी रास नहीं आई और 70 का दशक आते-आते उनका मन मुंबई से उचटने लगा था। वह मां से अक्सर कहते थे, 'मेरी आत्मा कविता में बसती है और यहां मेरी कविता मर रही है।'


' कविता को जीवित रखने के लिए ही वर्ष 1975 में उन्होंने मुंबई छोड़ने का फैसला कर लिया था। कुंदनिका बताती हैं कि इसके बाद मुंबई ने पिताजी को बहुत बुलाया और वह एक-दो गाने लिखने के लिए मुंबई गए भी, लेकिन कभी वहां रुके नहीं। वह बताती हैं कि उन्होंने जीवन में संघर्ष करना पिताजी से ही सीखा। पिताजी द्वारा जोकर फिल्म के लिए लिखा गया गाना, ए भाई जरा देखकर चलो.. हमें पूरे जीवन का सार देता है। वह बताती हैं कि पिताजी हमेशा कहते थे कि जीवन में कभी कोई लड़ाई लड़नी हो तो मौखिक नहीं बल्कि कागज से लड़ना और हर चुनौती का सामना करना।

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