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खूबसूरती से लेकर बनावट और इतिहास तक, इस मंदिर की हर एक चीज़ है खास

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है घृष्णेश्वर मंदिर। जो महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में दौलताबाद से महज 11 किलोमीटर की दूरी पर है। शहर की चहल-पहल से दूर यहां का माहौल काफी शांत रहता है। लोगों का मानना है कि मंदिर में दर्शन करने से हर प्रकार के रोग, दुख दूर होते हैं यहां तक कि निःसंतान को संतान का सुख भी मिलता है।  आगे पढ़ें

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मुंशी प्रेमचंद स्मृति कार्यक्रम में शामिल हुए साहित्यकार

संबोधन साहित्य एवं कला परिषद मनेंद्रगढ़ की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक टीम मुंशी प्रेमचंद के 138 वें जन्मदिवस पर मनेंद्रगढ़ से लमही बनारस जाकर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित मुंशी प्रेमचंद स्मृति आयोजन में शामिल हुई।  आगे पढ़ें

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साहित्य भूषण से सम्मानित साहित्यकार विजय रंजन का किया चर्वणा ने अभिनंदन

आगरा। फैजाबाद के साहित्यकार व उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा हाल ही में 2लाख की राशि के साहित्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार विजय रंजन के आगरा साहित्य प्रवास के दौरान साहित्यिक संस्था चर्वणा द्वारा उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए अभिनंदन किया गया। यहां हुआ कार्यक्रम त्रैमासिक काव्य पत्रिका चर्वणा के संपादक व साहित्यिक संस्था चर्वणा के संस्थापक व शहर के वरिष्ठ साहित्यकार शीलेंद्र कुमार वशिष्ठ के सुलभ बिहार- गैलाना रोड स्थित आवास पर आयोजित साहित्य गोष्ठी में समारोह अध्यक्ष व प्रसिद्ध हिंदी गजलकार अशोक रावत ने माला पहनाकर विजय रंजन का सम्मान किया। इस अवसर पर आयोजित काव्य गोष्ठी में अपने सम्मान के प्रति आभार जताने के बाद विजय रंजन जी ने अपनी इस कविता से समां बांध दिया-तुम न देखो अभी शाम है रात है। शोख मौसम बहुत ही बदजात है। कौन कहता है ये क्षण निरर्थक है जब, इन क्षणों में हमारी मुलाकात है। ये रहे मौजूद अध्यक्षीय काव्य पाठ के दौरान अशोक रावत के इस शेर पर सब वाह-वाह कर उठे- न तुम बेजार होते हो न हम बेजार होते हैं। बड़ी मुश्किल से लेकिन हम कभी दो चार होते हैं। कार्यक्रम संयोजक शीलेंद्र कुमार वशिष्ठ के इस गीत पर सब झूम उठे- झंझा उपल तड़ित गर्जन में मेरी अपराजेय जवानी। मैं बरखा का व्याकुल पानी, मेरी पानीदार कहानी...। कार्यक्रम में डॉक्टर राघवेंद्र शर्मा, संजीव गौतम, कुमार ललित, सुधांशु यादव साहिल, प्रोफेसर हेमराज मीणा व डॉक्टर दिग्विजय शर्मा ने भी अपनी कविताओं से सब को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम का संचालन शीलेंद्र कुमार वशिष्ठ ने किया। आभार ममता वशिष्ठ ने व्यक्त किया।  आगे पढ़ें

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नर्मदा की लहरों के साथ कदमताल करने वाले चित्रकार-साहित्यकार अमृतलाल बेगड़ नहीं रहे

प्रसिद्ध साहित्यकार, चित्रकार और नर्मदा समग्र के प्रमुख अमृतलाल बेगड़ नहीं रहे. उन्होंने जबलपुर में आख़िरी सांस ली. वो काफी समय से बीमार थे और कुछ दिन से वेंटिलेटर पर थे.अमृतलाल बेगड़ का अंतिम संस्कार जबलपुर में नर्मदा किनारे ग्वारीघाट पर शुक्रवार शाम किया जाएगा. अमृतलाल बेगड़ उन चित्रकारों और साहित्यकारों में से थे जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए उल्लेखनीय काम किया. नर्मदा की चार हज़ार किमी की पदयात्रा उन्होंने की और नर्मदा अंचल में फैली बेशुमार जैव विविधता से दुनिया को वाक़िफ कराया. 47 साल की उम्र में 1977 में उन्होंने नर्मदा की परिक्रमा करना शुरू किया था और 2009 तक ये क्रम जारी रहा. उनकी हिंदी की प्रसिद्ध किताब- नर्मदा की परिक्रमा है, जो उन्होंने नर्मदा परिक्रमा के दौरान हुए अनुभव के आधार पर लिखी थीं. नर्मदा के हर भाव और अनुभव को बेगड़ साहब ने अपने चित्रों और साहित्य में उतारा. उनकी गुजराती में 7, हिन्दी में 3 किताबें लिखीं. ‘सौंदर्य की नदी नर्मदा, ‘अमृतस्य नर्मदा’, ‘तीरे-तीरे नर्मदा’. साथ ही 8-10 पुस्तकें बाल साहित्य पर भी लिखीं. इन पुस्तकों के 5 भाषाओं में 3-3 संस्करण निकले. कुछ का विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हो चुका है. अमृतलाल बेगड़ का जन्म जबलपुर में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा कच्छ में और फिर बाद में शांति निकेतन में विश्व भारती विवि से पढ़ाई की. लेकिन उनकी कर्मभूमि बना जबलपुर जहां वो ललित कला संस्थान में शिक्षक रहे. हाल ही में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने उन्हें डी- लिट की उपाधि से नवाज़ा था. जीवन भर उन्हें साहित्य -कला और लेखन के लिए दर्जनों पुरस्कार और सम्मान प्रदान किए गए. वो साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित थे.  आगे पढ़ें

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लुधियाना| विश्व सिख साहित्य अकादमी पायल की बैठक ज्ञानी दित्त

लुधियाना| विश्व सिख साहित्य अकादमी पायल की बैठक ज्ञानी दित्त सिंह यादगारी खालसा लाइब्ररेरी में अकादमी के प्रमुख जगदेव सिंह घुंगराली की अध्यक्षता में हुई, जिसमें अकादमी के सदस्यों ने बढ़चढ़कर भाग लिया। इस दौरान आसा की वार में तूरे पलाणे शब्द की व्याख्या के बाद रचनाअों का दौर शुरू हुआ। रचनाअों की शुरूआत हरप्रीत सिंह सिहोड़ा ने गीत नशे के व्यापारी से किया। इसके बाद चरनसिंह हरबंसपुरा ने मिन्नी कहानी सतकार, हाकम सिंह जगेड़ा ने गीत, जिम्मी अहमदगढ़ ने गीत टूटे ढाले, गुरी तुरमुरी ने गीत सरंगिया, शेरा नवीं पिंडिया ने गीत चरखा पिया रोंदा, आतिश पायलवी ने गजल, काला पायल वाला ने गीत महंगाई, राम सिंह भीखी ने गीत बेगमपुरा, पप्पू बलवीर ने गीत फुल टाहनी नालों तोड़ी नां, धरमिंदर शाहिद खन्ना ने गजल नफरत दे शहर तों, हैप्पी बोडहाई ने गीत कागज ते चार लकीरां, जगवीर सिंह विक्की ने गीत चुगली, गुरसेवक सिंह ने कविता जदो वजाइयें साज, हरबंस सिंह शान ने गीत मां बोली अौर जगदेव सिंह घुंगराली ने कविता सुलगदी बगावत सुना के वाहवाही लूटी। इस मौके पर रचनाअों पर खूब बहस की गई, जिस दौरान योग्य सुझाव दिए गए। इस मौके पर धरमिंदर शाहिद ने अपना नया पंजाबी गजल संग्रह नासुर लाइब्रेररी अौर सदस्यों को भेंट किया। इस मौके पर दविंदर सिंह अौर गुरजंट सिंह के अलावा अन्य मौजदू थे।   आगे पढ़ें

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केरल की संस्कृति को जानना है तो जरूर जाएं कोलम बीच

आप घूमने-फिरने का शौक रखते हैं, तो आपको किसी जगह पर घूमकर वहां की संस्कृति और वहां की खास बातें जानने में भी दिलचस्पी होगी। आज हम आपको ऐसी ही जगह के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां जाकर न सिर्फ आप मस्ती रोमांच का मजा ले सकते हैं बल्कि वहां की संस्कृति के बारे में भी बहुत कुछ जान सकते हैं। केरल का कोलम बीच केरल की संस्कृति को जानने में सबसे परफेक्ट जगह है यहां बीच के पास कल्चर इवेंट और स्ट्रीट फूड का मजा लेने के लिए देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। ऑफ सीजन भी घूमते हैं टूरिस्ट केरल राजधानी त्रिवेंद्रम या तिरुवनंतपुरम से मात्र 16 किमी की ही दूरी पर है, कोलम तट। यहां सर्दियों के मौसम में टूरिस्ट्स की भीड़ लगी रहती है, लेकिन जून से अक्टूबर तक ऑफ-सीजन वाले महीने में भी लोग यहां घूमने आते हैं। गोवा बीच से कम नहीं है कोवलम बीच आपको यहां आकर बिल्कुल भी ऐसा नहीं लगेगा कि आप केरल के किसी बीच पर खड़े हुए हैं। यहां पर आपको गोवा जैसा ही एहसास होगा। यहां आपको सुकून मिलेगा। आप चाहें, तो यहां के प्राकृतिक सौंर्दय को आजकल उपलब्ध होटल से भी निहार सकते हैं। केरल की संंस्कृति की झलक यहां घनी हरियाली से ढके हुए पहाड़, नारियल-केले के पेड़ और अरब सागर के लहरों को स्पर्श करती इसकी तटों का तो कोई जवाब ही नहीं है। आयुर्वेद के खजाने से भरे और चन्दन के पेड़ों की भीनी-भीनी महक आपका मूड रिफ्रेश कर देगी। साथ ही अगर आपको यहां के मसालों और जायकों का स्वाद चखना है तो आप स्ट्रीट फूड का मजा ले सकते हैं। इसके अलावा शाम के समय बीच के आसपास कई कल्चरल इवेंट भी देखने को मिलते हैं। आप यहां पर स्ट्रीट फूड में सुडल, पेरीपू वड़ा, मक्का, मसाला डोसा जैसे कई जायकों का लुफ्त उठा सकते हैं। अगर आप सी फूड खाने के शौकीन हैं, तो आपको यहां और भी ऑप्शन मिलेंगे। कैसे पहुंचे : ट्रेन से आने के लिए आपको त्रिवेंद्रम आना पड़ेगा। इसके बाद आपको कोवलम की बस मिल जाएगी। घूमने के लिए बेस्ट टाइम : आप जुलाई से नवम्बर के बीच यहां घूम सकते हैं। क्या है खास : यहां चंदन पेड़ों के अलावा आपको केरल की स्पेशल डिश बहुत अच्छी लगेगी।   आगे पढ़ें

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अपनी अदभुद स्‍थापत्‍य शैली के चलते विशेष है सिंगापुर की चूलिया मस्‍जिद

मस्‍जिद के कई नाम सिंगापुर कर की चूलीया मस्‍जिद कई नाम है। जैसे इसे मुख्‍य रूप से मस्‍जिद जामे कहा जाता है। इसके अन्‍य नाम जामे मॉस्‍क और पेरिया पल्ली यानि विशाल मस्‍जिद, भी हैं, हांलाकि ये चूलिया मस्‍जिद के नाम से ही दुनिया भर में प्रसिद्ध है। ये सिंगापुर में बनी शुरूआती मस्‍जिदों में अग्रणी मानी जाती है। चाइना टाउन डिस्‍ट्रिक्‍ट के केंद्र में साउथ ब्रिज रोड पर ये मंदिर मरिअम्‍मन मंदिर के पास बनी हुई है। इस मस्‍जिद का निर्माण भारत से व्‍यापार आदि करने आये तमिल मुस्‍लिम समुदाय के लोगों ने करवाया था। मुख्‍य रूप से चीनी लोगों के प्रभाव वाले क्षेत्र में बनी चूलिया मस्‍जिद के पीछे की गली मस्‍जिद स्‍ट्रीट कहलाती है। मस्‍जिद के निर्माण की कहानी बताते हैं इस मस्‍जिद का निर्माण चूलिया मुस्‍लिम समुदाय ने करवाया जो दक्षिण भारत में कृष्‍णा नदी के तट पर बसे तमिल मुसलमानों का समुदाय है। इसीलिए इसका नाम चूलिया मस्‍जिद पड़ा। ये लोग जब सिंगापुर आये तो इन्‍होंने जल्‍दी ही तीन मस्‍जिदों का निर्माण कार्य शुरू किया, जिसमें से मस्‍जिद जामे सबसे पहले बन कर तैयार हुई। बाकी दो में से एक नाम अल अबरार मस्‍जिद और दूसरी का नागोरे दरगाह है। शुरूआती दौर में इस स्‍थान पर अंसार सैब नाम के शख्‍स ने 1826 में यहां एक मस्‍जिद बनवाई थी। उसी जगह पर 1831 में वर्तमान चूलिया मस्‍जिद बनाई गई। हालाकि 1835 में जब मस्‍जिद बन कर तैयार हुई तो इसका अधिकाश ढांचा पुरानी मस्‍जिद वाला ही रहा। 1996 में मस्‍जिद का पुर्नउद्धार किया गया। मंदिर के स्‍थापत्‍य में अनोखा मेल उपासक मस्जिद में दो मीनारों से बने एक गेटवे के माध्यम से मस्जिद में प्रवेश करते हैं। प्रवेश द्वार का अग्रभाग एक छोटे चार मंजिल के महल का आभास देता है जबकि अगल बगल की मीनारें सात मंजिल की हैं जिनके शिखर पर खूबसूरत गुंबद हैं। प्रत्‍येक मीनार पर महराबदार मोटिफ हैं जिनके बीच के स्‍थान पर बेहतरीन चित्रकारी की गई है। मुख्‍य द्वार के ऊपरी हिस्‍से पर छोटा सा गेट बना है और खिड़कियों पर क्रास की आकृति है। मस्‍जिद में एक विशाल मुख्‍य हाल और एक मुख्‍य पूजा भवन है। मस्‍जिद के अंदर ही सिंगापुर में मुस्‍लिमों के एक धार्मिक गुरू मोहम्मद सलीह वालिनावा का पवित्र स्‍थान भी मौजूद है। उनकी कब्र भी मस्‍जिद के र्निमाण के पूर्व यहीं थी। मुख्‍य भवन से ऊपर की ओर सीढ़ियां जाती हैं जो उस बालकनी तक जाती है जहां से अजान दी जाती है। चौकोर बने पूजा ग्रह का प्रवेश द्वार आर्च्‍ड आकार में बना है। सारी खिड़कियां अर्द्ध गोलाकार बनी हैं। जिनके आसपास चीनी शैली के करे चमकदार टाइल्‍स लगे हैं। मुख्‍य हाल खुला और हवादार है जिसकी छत टस्‍कन स्‍तंभों की दोहरी पंक्‍ति पर टिकी है। कक्ष के दोनों ओर खुले बरामदे हैं। खास बात ये की मस्‍जिद का स्‍थापत्‍य उस दौर की स्‍पष्‍ट झलक दिखाता है, जबकि उसका प्रवेश द्वार दक्षिण भारतीय शैली पर आधारित है। वहीं पूजा कक्ष पर सिंगापुर के प्रथम प्रशिक्षित आर्किटेक्‍ट जॉर्ज ड्रमगोले कोलमन की निओ क्‍लासिकल शैली की छाप नजर आती है। यही अनोखापन चूलिया मस्‍जिद को विशेष दर्जा प्रदान करता है।   आगे पढ़ें

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