ये किस्मत के धनी कांग्रेसी...



हाय रे! सारी मेहनत बेकार गयी! सुबह से आंखों पर दूरबीन लगाकर अखबार की उस खबर में दशमलव तलाश रहा था। वह नहीं मिला। खबर थी कि जनाब सुरेश पचौरी को कांग्रेस ने प्रदेश के लिए चुनाव प्रबंधन समिति की कमान सौंपी है। साथ में लिखा था कि इन हजरत पर विन-29 फॉमूर्ले की रूपरेखा तय करने का यकीन जताया गया है। यह पढ़ते ही दिमाग पचौरी जी के चुनावी अतीत की ओर दौड़ गया। याद आया कि कांग्रेस में काले से लेकर सफेद बाल तक का सफर तय करने वाले पचौरी जी ने आज तक आम जनता के बीच कोई चुनाव जीता ही नहीं है। बल्कि एक बार लोकसभा और दो बार विधानसभा का चुनाव वे बुरी तरह से हार चुके हैं। प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए पार्टी को एक विधानसभा चुनाव बुरी तरह हरवाने का अनुभव उनके बायोडाटा में शामिल है। चुनाव जीतने या जितवाने की हर कोशिश में वे जनता द्वारा बार-बार नकारे गए हैं। इसलिए खबर पढ़कर एकबारगी लगा कि हो न हो, मामला विन 2.9 के फॉर्मूले का होना। क्योंकि कमोबेश हर मोर्चे पर फिसड्डी साबित हुए इस राजनेता की क्षमताओं पर इससे अधिक यकीन तो कांग्रेस का कोई परम शत्रु ही जता सकता है। अब प्रदेशाध्यक्ष और मुख्यमंत्री दोनों कमलनाथ हैं। अब चुनाव के माहौल में उन्हें पचौरी जी से मजाक करने की तो सूझना नहीं चाहिए। खैर, विनाशकाले विपरीत बुद्धि। यही सोचकर अपन ने भी दूरबीन दूर रखी और मान लिया कि दशमलव की खोज उस ही स्तर की मूर्खता है, जिस स्तर की मूर्खता पचौरी पर इतना बड़ा यकीन रखकर दिखायी गयी है।  एक हास्य प्रधान फिल्म है, चुपके-चुपके।


खुद को बेहद चालाक समझने वाला पात्र अंतत: बेवकूफ साबित हो जाता है। इसकी वजह पूछने पर वह कहता है, जुकाम में लोगों की नाक बंद हो जाती है, लेकिन मेरा दिमाग बंद हो गया था। हालांकि फिलहाल मौसम भीषण गरमी का है। फिर भी कांग्रेस से जुडेÞ ऐसे निर्णय यही यकीन दिला रहे हैं कि पार्टी में शीर्ष स्तर पर किसी न किसी को ऐसा जुकाम हुआ है कि उसका दिमाग बंद हो गया है। वरना कोई वजह नहीं थी कि घोरतम असफल प्रदेश अध्यक्ष रहे अरुण यादव को कांग्रेस खंडवा सीट से लोकसभा चुनाव का टिकट दे देती। पचौरी की तरह ही यादव का मामला किस्मत की खाने वाला है। पचौरी बगैर  चुनाव जीते केंद्र में मंत्री बन गये। बिना जमीनी आधार के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना दिये गये। यादव अपने दिवंगत पिता सुभाष यादव के जीवित रहते उनके असर की बदौलत एक बार खरगौन और एक बार खंडवा से सांसद बनकर केंद्रीय मंत्री हो गये। बाद में संगठन के शून्य अनुभव के बावजूद प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष पद  उन्हें दे दिया गया। विधानसभा चुनाव में बेचारे बलि का बकरा बनकर खेत रहे। शिवराज सिंह चौहान के सामने न उन्हें जीत पाना था और न ही जीत सके। फिर भी पार्टी ने उन पर फिर से यकीन जता दिया है। वाह! किस्मत हो तो ऐसी, वरना तो फिर बदकिस्मती ही अच्छी है। यादव जीत गये तो ठीक, वरना हारने की आदत को उन्हें हो ही गयी है। फिर चाहे वह बुधनी हो या हो खरगौन।  विंध्य में रीवा सीट से अजय सिंह प्रत्याशी बनाये गये हैं। निर्णय होने से एक दिन पहले वे शोले फिल्म के गब्बर सिंह बने दिखे।


क्षेत्र की जनता से तेरा क्या होगा रे कालिया! की तर्ज पर संवाद करते नजर आ गये। बीते विधानसभा चुनाव में विंध्य में कांग्रेस की जो मिट्टी-पलीद हुई है, उसका काफी श्रेय राहुल भैया के खाते में भी जाता है। बेचारे, कहां तो किसी समय प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे थे और कहां मतदाता ने चुरहट के चुनावी मैदान से घसीटकर उन्हें घर में बिठा दिया। तो जनाब, इस त्रिमूर्ति पर दांव लगाकर कांग्रेस ने दिखा दिया है कि जोखिम लेने की क्षमता में उसका कोई सानी नहीं है। हां, नकुल नाथ की बात अलग है। भोपाल में पिता कमलनाथ बैठे हैं। छिंदवाड़ा के चप्पे-चप्पे पर पिता की छाया अमिट रूप ले चुकी है। इसलिए विजयश्री उनका स्वाभाविक अधिकार बन गयी है। लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि जबलपुर में विवेक तन्खा जनता की अदालत में कितने खरे साबित उतरते हैं। वह जनता के नेता नहीं हैं। बतौर वकील उनकी बुद्धिमत्ता एवं क्षमताओं पर शक करना सिरे से गलत है, लेकिन लोकसभा चुनाव जीतने के लिए जिस तरह का व्यक्तित्व होना चाहिए, वह तन्खा से जरा दूर ही नजर आता है। फिर मामला जब कांग्रेस के लिए कठिन सीटों में से एक का हो, तो बात और चुनौतीपूर्ण हो जाती है।  इस तरह के निर्णयों पर कांग्रेस की वह पीढ़ी जरूर सदमे में होगी, जिसकी दूरदर्शिता एवं अनुभव की दम पर इस दल ने छह दशक तक देश पर शासन किया है। मध्यप्रदेश में पार्टी को चार दशक से ज्यादा शासन करने का मौका दिया। निश्चित ही उस पीढ़ी को दरकिनार कर दिया गया है। उनकी जगह क्षमताओं से च्युत, लेकिन किस्मत के धनी नेताओं ने ले ली है। इसके चलते जो कुछ हो रहा है, वह देश और प्रदेश के स्तर पर किसी से छिपा नहीं है।  

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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