यह बीमार का इलाज है, बीमारी का नहीं



किसी बेहद गरीब शख्स का एक पैर यकायक नीला पड़ गया। डॉक्टर ने इसे जहर फैलने का मामला बताया। कहा कि जान बचाने के लिए घुटने के नीचे से पैर काटकर अलग करना होगा। ऐसा ही किया गया। कुछ दिन बाद दूसरा पैर भी नीला पड़ा। डॉक्टर ने उसे भी घुटने के नीचे से काटकर अलग कर दिया। फिर पता चला कि मरीज की कमर से लेकर जांघ तक का हिस्सा भी नीला हो रहा था। तब डॉक्टर ने दिमाग चलाया। मरीज से बोला, 'सॉरी यार, तेरे दोनो पैर काट दिए। जबकि समस्या केवल यह है कि तेरी नयी नीली लुंगी रंग छोड़ रही है।' ऐसा हर उस मामले में होता है, जहां केवल बीमार का उपचार किया जाता है, बीमारी का नहीं। बात का ताजातरीन संदर्भ मध्यप्रदेश है। लेकिन ऐसे सियासी डॉक्टर सारे देश में हैं, जो बीमारी की बजाय केवल बीमार का उपचार कर रहे हैं। जानबूझकर। किसी षड़यंत्र के तहत। अपना उल्लू सीधा करने के लिए। आप बेशक कमलनाथ की तारीफ कर सकते हैं कि उन्होंने किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा कुछ हद तक पूरी की है। लेकिन इसे किसी उल्लेखनीय काम की संज्ञा नहीं दी जा सकती। क्योंकि इससे कर्ज का मर्ज तो कायम ही रहेगा। उलटे यह मर्ज और बढ़ जाएगा। क्योंकि इस तरह की लोक-लुभावनी घोषणाओं ने देश के अधिकांश हिस्सों में किसानों को चार्वाक शैली का बना दिया है। वह '...ऋणम कृत्वा घृतम पीवेत...' को पूरी सहूलियत के साथ अंगीकार कर चुका है। वह जानता है कि उसे सिर्फ कर्ज लेने की मेहनत करनी है, बाकी उसे चुकाने का सिरदर्द उसका नहीं है। एक चुनाव आएगा और उसे ऋण माफी का लाभ मिल जाएगा। फिर यहां तो कर्ज माफी कई शर्तों और किन्तुओं  और परन्तुओं के साथ हो रही है। और किसान का दो लाख तक का कर्जा माफ करने से कर्ज के बोझ तले आकर आत्महत्या का रास्ता छोड़ देगा, इसके आसार नहीं है। यह खबरें अखबारों में बराबर आती रहेंगी।


क्योंकि सहकारी बैंकों और राष्ट्रीय बैंकों के अलावा किसान साहूकारों का भी बड़ा कर्जदार है। और आपने इधर कर्ज माफ किया और उधर किसान फिर कर्ज लेकर कर्जदार होने को तैयार बैठा है। जाहिर है नाथ सहित कर्ज माफी करने वाला कोई भी राजनीतिज्ञ बीमारी का इलाज करना ही नहीं चाह रहा है। यदि समस्या ही नहीं रही तो फिर निदान किसका किया जाएगा? यदि निदान ही नहीं कर सके, तो किस बात को लेकर जनता को लुभाया जाएगा। यही वजह है कि देश में खेती को लाभ का धंधा बनाने की बात केवल संगोष्ठी, आलेखों या भाषणों में सिमटकर रह गयी है। जबकि खेती को लाभ का धंधा बनाने का ईमानदार जतन ही वह कुंजी है, जिसके जरिये देश के अन्नदाता की स्थायी खुशहाली का दरवाजा खोला जा सकता है। इसका एक नहीं कई उपाय है। सरकार किसान की खेती की लागत को कम करने के स्थायी जतन करें। आप मनरेगा को खेती से जोड़ दीजिए। क्योंकि खेती की लागत में श्रम की कीमत सबसे ज्यादा है। खेती के लिए मजदूर उपलब्ध नहीं हैं और इसका कारण भी मनरेगा है। वर्तमान में इस योजना का लाभ अधिकांश निकम्मों को ही दिया जा रहा है। चूंकि गांव में बगैर काम किए पैसा मिल जाता है, इसलिए खेत में मजदूर ही नहीं मिल पाते। यदि मजदूरों के लिए एक तय अवधि तक खेत में काम करना अनिवार्य कर दिया जाए तो रोजगार तो मिलेगा ही, खेती की दशा एवं दिशा में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया जा सकेगा। मनरेगा का लाभ लेने वालों के लिए यह तय होना चाहिए कि एक निश्चित श्रम दिवस के आधार पर ही उसे सारे सरकारी लाभ मिलेंगे अन्यथा नहीं। और आप किसान को भी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने मत दीजिए। श्रम का तय फीसदी पैसा, उसे भी मजदूर को देना जरूरी कीजिए। इसके  अलावा खेतों को निश्चित समयावधि के लिए सस्ती दर पर बिजली मुहैया कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए।


सिंचाई के साधन सुगम और सस्ते बनाने चाहिए। उपज का दाम लागत के आधार पर किसान का फायदा तय करते हुए बढ़ाना चाहिए और किसान की उपज के लिए आसान बाजार उपलब्ध कराना प्राथमिकता होना चाहिए। कृषि विशेषज्ञ और भी ढेर रास्ते बता सकते हैं। यह बीमार का नहीं बीमारी के इलाज का जतन होगा। लेकिन इसके लिए वोट बैंक की मानसिकता से ऊपर तो उठना ही पड़ेगा। कमलनाथ सरकार की ताजा घोषणा के बाद किसान खेत में दोगुनी मेहनत करने नहीं उतर जाएगा। वह फिर तिकड़म लगाएगा कि किस तरह नया कर्ज ले सके। याद करिए कांग्रेस की कर्ज माफी की घोषणा के बाद किसान ने बैंकों को अपने कर्ज की किश्ते देना रोक दिया था। यह प्रवृत्ति बेहद घातक है। एक पक्का शराबी ऐसे शहर में फंस गया, जहां नशाबंदी थी। होटल के वेटर से उसने पूछा, 'इस समय शराब कहां मिलेगी?' वेटर बोला, 'यहां नशाबंदी है। केवल अस्पताल में उन मरीजों के इलाज के लिए शराब रखी जाती है, जिन्हें जहरीले सांप ने काट लिया हो।' शराबी ने दन्न से पूछा, 'तो इस समय जहरीला सांप कहां मिलेगा?'  मध्यप्रदेश सहित देश के तमाम हिस्सों के किसान कर्ज माफी के नशे में डूबकर इस हालत की ओर ही बढ़ते जा रहे हैं। उन्हें यह समझना होगा कि सियासदां उनकी मदद नहीं कर रहे, बल्कि उन्हें हमेशा के लिए दीन-हीन और जरूरतमंद बनाने का सामान मुहैया करा रहे हैं। अन्नदाता को इस बात का अहसास करना होगा कि अपनी आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य देने के लिए उसे वैज्ञानिक पद्धति की खेती करना चाहिए। इस व्यवसाय को आधुनिक तरीके से लाभकारी बनाने के जतन ढूंढने चाहिए। वरना, सियासत यूं ही रंग छोड़ती रहेगी और किसान के पैर एक के बाद एक काट दिए जाएंगे। अंत में राजनीतिरूपी डॉक्टर उससे माफी मांग लेंगे। इससे क्या होगा, तब तक किसान तो लंगड़ा हो ही चुका होगा। वैसे भी देश के कर्ताधर्ता ही उसकी मौजूदा हालत के सीधे जिम्मेदार हैं।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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