कौन खेल रहा है यह खेल?



यह है तो नितांत खेल ही। सवाल यह कि कौन खेल रहा है और किसके जरिए? राजनीति इसलिए ही राजनीति है क्योंकि जरूरी नहीं कि जो सामने दिख रहा है, हकीकत वही हो। बात पश्चिम बंगाल में नरेंद्र मोदी की सीबीआई बनाम ममता बनर्जी की पुलिस वाली हो रही है। इस बात पर चौंकना नहीं चाहिए  कि सीबीआई के कल वाले कदम की चाबी मोदी ने भरी थी। इस जानकारी पर भी हैरत जैसी कोई बात नहीं कि पश्चिम बंगाल की पुलिस की गतिविधियों का रिमोट बनर्जी के पास था।  ममता के स्वभाव को दस प्रतिशत तक जानने वाले भी समझते हैं कि उनके राज्य में केंद्रीय एजेंसी की किसी भी गतिविधि पर सरकारी स्तर से असरकारी बवाल होना है। फिर भी सीबीआई बगैर किसी वारंट के कोलकाता के पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करने पहुंच गयी। इसके बाद जो हुआ, वह अपेक्षित तो था ही, लेकिन लगता है कि हुआ भी वही जो मोदी और अमित शाह की मंशा थी। गौर करें, क्योंकि इसके बाद एक झटके में ममता बनर्जी, राहुल गांधी सहित विपक्ष के तमाम अन्य दिग्गजों को पीछे छोड़कर मोदी-विरोधी धड़े की अगुआ बन गयी। भाजपा से दुश्मनी निभाने का भाव आज भले ही इन विपक्षियों को ममता के इर्द-गिर्द खड़ा कर रहा हो, लेकिन बंगाल की खाड़ी में उठा यह सियासी भंवर शांत होते-होते शेष विपक्षी इस आशंका से भर जाएंगे कि उनकी अगुआई करने वाली ममता कहीं भाजपा की हार की सूरत में प्रधानमंत्री पद की मजबूत दावेदार बनकर न उभर जाएं। मोदी यही चाहते हैं। तराजू में मेंढक तौलने की यह प्रक्रिया अंतत: उनके लिए ही फायदेमंद होगी।


विपक्ष यदि किसी एक नाम पर सहमत हो गया, तो मोदी की नैया डूबी समझो। विपक्ष की एकता ने ही अगर देश में सर्वशक्तिशाली कांग्रेस को जमीन दिखाई है तो फिर यह तो भाजपा है, जिसे अभी भी देश के कई हिस्सों में अपने विस्तार का इंतजार है।  यह कपोल-कल्पित लग सकता है, लेकिन इसे गहराई से समझिए। ममता द्वारा बीते दिनों आयोजित रैली में राहुल गांधी शामिल नहीं हुए थे। क्योंकि यह आयोजन उस समय किया गया, जब गांधी की पार्टी तीन राज्यों, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा को परास्त कर चुकी थी। इस विजय के बाद गांधी अति-विश्वास से भरकर आगे बढ़ रहे हैं। मीडिया का वह तबका भी गांधी की ताकत के लक्षण गिनने लगा है, जो कुछ समय पहले तक ही कांग्रेस के इस अध्यक्ष को मोदी की तुलना में कमजोर मानता था। गांधी ने राफेल को लेकर मोदी की नाक में दम कर रखा है। किसानों के बाद गरीबों की न्यूनतम आय और महिला आरक्षण तुरंत लागू करने की उनकी घोषणाओं ने भी भाजपा कैम्प में खलबली मचा दी है। यानि राहुल गांधी और कांग्रेस का एजेंडा मोदी को हराने से बदल कर राहुल को प्रधानमंत्री बनवाने की दौड़ में शामिल करवाने में बदल गया। कांग्रेस अगर संतोष कर सकती हो तो वो मोदी को हरवाने में तो भूमिका निभा सकती है लेकिन राहुल को प्रधानमंत्री बनवाना अभी उसके लिए दूर की कौड़ी है। इस सबके बीच पश्चिम बंगाल में हुए घटनाक्रम से विपक्ष का सारा ध्यान गांधी से हटकर बनर्जी की ओर चला गया है।


खास बात यह कि सीबीआई की इस कार्रवाई के लिए वह दिन चुना गया, जब गांधी ने बिहार के गांधी मैदान में अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर विराट रैली आयोजित की। यह ऐसा आयोजन रहा, जिसके जरिए इस राज्य में कांग्रेस करीब तीन दशक बाद फिर अपनी ताकत दिखा सकी। जिसका स्वाभाविक श्रेय गांधी को ही जाता है। लेकिन आज के अखबार उठाकर देख लीजिए। गांधी की रैली को सांत्वना पुरस्कार जैसा स्थान मिला है। टीवी चैनलों से तो शाम के बाद यह  रैली नदारद ही हो चुकी थी। वहां जो था, ममता थीं। अखबारों में आज प्रमुखता से जो है, वह  पश्चिम बंगाल का घटनाक्रम ही है। वहां की गरज-बरसकर धरने पर बैठी मुख्यमंत्री हैं। यानी फिलवक्त विपक्ष बनाम मोदी की बजाय ममता बनाम मोदी का बाजार हॉट है और गांधी इसके बीच कहीं बहुत छोटे नजर आ रहे हैं। ममता और भाजपा की इस लड़ाई का एक खामियाजा पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामपंथियों के खाते में भी दर्ज होगा। इस सारे वाकये ने ममता को भी वह मौका दे दिया, जो वह बहुत दिन से पाना चाह रही थीं। खुद पर मोदी की ओर से बड़ा हमला होना और प्रत्युत्तर में वीरांगना बनकर देश के सामने आ जाना। यानी जो हुआ, वह मोदी के हक में हो सकता है। वह ममता के लिए भी लाभकारी हो सकता है,  लेकिन उसे कांग्रेस और विशेषत: राहुल गांधी के लिए कुछ निराशा का सबब ही माना जा सकता है। खेल अभी जारी है। जारी रहेगा। ताजा प्रहसन कुछ  समय तक चलेगा और फिर किसी नये अध्याय का सूत्रपात हो जाएगा। देखने वाली बात यही रहेगी कि ऐसे किस मोड़ पर गांधी उस अवसर का लाभ ले पाएंगे, जो कल ममता को मिल गया। 

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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