किसलिए नाराज हैं वयोवृद्ध कांग्रेसी?



क्या कांग्रेस की पूरी एक पीढ़ी पार्टी नेतृत्व के खिलाफ होती जा रही है। तीन साल पहले के जयराम रमेश और हालिया दिग्विजय सिंह, शीला दीक्षित तथा टॉम वडक्कन को देखकर इस सवाल का जवाब ‘हां’ में ही प्रतीत होता है।  रमेश ने सन 2016 में कहा था कि प्रियंका वाड्रा के अकेले के बूते कांग्रेस का पुनरुद्धार संभव नहीं है। यह वह समय था, जब इस पार्टी की कमान प्रियंका को सौंपने की मांग करने वाले इसके लिए गला फाड़ने पर आमादा थे। दिग्विजय सिंह ने पुलवामा के  नृशंस आतंकी हमले को पूरे होशो-हवास में (‘जानबूझकर’ कहना ज्यादा उचित प्रतीत होता है) हादसा करार दे दिया


शीला दीक्षित ने कहा है कि नरेंद्र मोदी आतंकवाद को लेकर डॉ. मनमोहन सिंह से ज्यादा कड़ा रुख रखते हैं। जबकि टॉम वडक्कन ने यह कहते हुए भाजपा का हाथ पकड़ लिया कि पुलवामा हमले के बाद पार्टी के सेना का मनोबल गिराने वाले रुख से वह निराश हैं। बीके हरिप्रसाद पहले ही यह कहते हुए पार्टी की मुसीबत बढ़ा चुके हैं कि पुलवामा का हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष इमरान खान की मिली-जुली साजिश है। इन सारे और बीते कुछ साल में हुए इनसे मिलते-जुलते घटनाक्रमों में एक तत्व कॉमन है। अधिकांश बार ऐसा हुआ, जब राहुल गांधी या तो पार्टी में तेजी से ताकतवर हो रहे थे या फिर अंतत: वह राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पा चुके थे।


ऐसा है तो इसकी पड़ताल स्वाभाविक है। इस तफ्तीश में एक फैक्टर का खास तौर पर ध्यान रखना होगा। वह यह कि राहुल पार्टी में युवा पीढ़ी को तवज्जो देने के पक्षधर हैं। अपने घोषित तौर पर उपाध्यक्ष एवं अघोषित तौर पर पार्टी के सर्वेसर्वा रहते हुए उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया, अरुण यादव और सचिन पायलट जैसे नयी पीढ़ी के लोगों को प्रमोट करने में ज्यादा रुचि दिखायी।


  यकीनन यहां सवाल यह भी उठता है कि ऐसा होने के बावजूद मध्यप्रदेश में सिंधिया की जगह कमलनाथ और राजस्थान में पायलट की जगह अशोक गहलोत को क्यों मुख्यमंत्री बनाया गया? अजय माकन के स्थान पर दिल्ली इकाई की कमान शीला दीक्षित को क्यों सौंपी गयी? इसकी वजह भी साफ है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस ऐसे समय जीती, जबकि लोकसभा चुनाव सिर पर आ चुके थे। कई राज्यों में तेजी से जनाधार खो चुकी कांग्रेस यह जोखिम नहीं ले सकती थी कि बेहद तजुर्बेकार चेहरों को दरकिनार कर दिया जाए। गांधी को ऐसे मुख्यमंत्री चाहिए थे, जो अपने दीर्घ सियासी अनुभव की दम पर जीत का यह क्रम आम चुनाव तक बराकरार रख सकें।


साफ है कि इस लिहाज से सिंधिया की तुलना में नाथ और पायलट के मुकाबले गहलोत समायानुकूल ज्यादा मुफीद पाये गये। जहां तक माकन का सवाल है, तो दिल्ली में बेहद कमजोर दशा में पहुंच चुकी पार्टी को उबारने के लिए उनकी जगह किसी समय की वाकई लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहीं दीक्षित को सामने लाना अवश्यंभावी हो चुका था।  लेकिन पार्टी के बाकी बुजुर्ग नेता इतने खुशकिस्मत नहीं हैं। अहमद पटेल और मोतीलाल वोरा को छोड़ दें तो स्पष्ट परिलक्षित होता है कि राहुल उपाध्यक्ष से अध्यक्ष पद तक के सफर में कई बुजुर्ग चेहरे हाशिये पर धकेल दिए गए हैं। शायद यही वजह है कि बुजुर्गों के बीच रह-रहकर विद्रोह के स्वर सुनायी दे जा रहे हैं। क्या इसे बगावती तेवर नहीं कहेंगे कि गोवा में कांग्रेस के पास सबसे ज्यादा विधायक होने के बावजूद राज्य के तत्कालीन पार्टी प्रभारी दिग्विजय सिंह ने विधायक दल को सरकार बनाने का दावा पेश करने नहीं दिया? वडक्कन ने जो कुछ किया, वह तो खुला विद्रोह है, लेकिन बाकी उम्रदराज नेताओं की ढकी-छुपी गतिविधियां भी साफ कह रही हैं कि पार्टी के बुजुर्ग कुछ नहीं, काफी ज्यादा नाराज हैं। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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