उमा भारती का संन्यास



उमा भारती यूं भी संन्यासन हैं और अब उन्होंने चुनावी सियासत से संन्यास का विधिवत ऐलान भी कर दिया है। अब उनका सारा ध्यान अयोध्या में भगवान राम एवं पतित-पावन गंगा नदी की सफाई पर केंद्रित रहेगा। इसके लिए उन्होंने आने वाले डेढ़ साल का समय भी आरक्षित कर दिया है।  उमा भावुक हैं। जिद्दी भी। तुनकमिजाज उनकी कमजोरी है। जिव्हा पर अक्सर नियंत्रण खो देने से उन्हें नुकसान उठाने पड़ते हैं। इन सारे तथ्यों के बीच वह राजनीतिज्ञ भी हैं। ऐसे तत्वों का जब राजनीतिक दिमाग में घालमेल होता है तो वही होता है जो हम मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने, यकायक वह पद छोड़ने, फिर पद के लिए बगावत करने, नया दल बनाने और अंतत: वापस पुराने दल में आ जाने के तौर पर देख चुके हैं। कहा तो यह तक जाता है कि एक समय में अपनी उपेक्षा से दु:खी होकर इस साध्वी ने पार्टी के शीर्ष नेता को देर रात फोन कर आत्महत्या करने की धमकी दे डाली थी।  इनमें से किसी भी तत्व की उनके आचरण में कमी नहीं दिखती है। इसलिए यह देखने वाली बात होगी कि भावुकता और जिद्दीपन सहित तुनकमिजाजी एवं जुबानी आक्रामकता के साथ वह डेढ़ साल में राम और गंगा के लिए क्या कर पाएंगी।  राम मंदिर को लेकर उमा के तेवर कालांतर में भाजपाईकरण का शिकार हो गए। नतीजा यह हुआ कि सन दिसंबर 1992 में अयोध्या में उग्र साध्वी के तौर पर गरजती दिखी यह शख्सियत केंद्रीय मंत्री के तौर पर मामले का हल बातचीत के जरिए करने की बात करते दिख रही है। गंगा के लिए  प्राण देने तक की बात तो उन्होंने इससे संबंधित महकमे की मंत्री रहते हुए भी कही, किंतु इस दिशा में वह खास काम नहीं कर सकीं।


तीन साल तक का उनका सारा समय योजनाएं बनाने, उनके क्रियान्वयन को ठोस स्वरूप देने एवं इन दोनों प्रयासों को घोरतम असफल होते देखने में ही बीत गया। यह अच्छा है कि विभाग छिनने के बावजूद उनकी चिंता में कोई कमी नहीं आई।  भाजपा राम मंदिर के लिए कितनी गंभीर है, यह मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल से बखूबी समझा जा सकता है। गंगा नदी के संरक्षण की उसे कितनी चिंता है, इसका अनुमान यूं सहज ही लगा सकते हैं कि केंद्र, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में उसकी सरकारें होने के बावजूद इस नदी की दशा को सुधारने का कोई ठोस जतन नहीं किया गया है। अयोध्या में राम टेंट में रहने को मजबूर हैं और गंगा नदी गंगोत्री से लेकर पश्चिम बंगाल तक हर सेकंड में चक्रवृद्धि ब्याज की दर से प्रदूषण का शिकार हो रही है। यकीनन सियासी स्वार्थ रहते हुए आप सत्ता में रहकर मंदिर के लिए विपक्ष जैसा तेवर नहीं दिखा सकते। यह भी तय है कि गंगा की दुर्दशा जिस स्तर एवं लम्बे समय से हुई है, उसे कम अंतराल में सुधारा नहीं जा सकता।  इसलिए यह उम्मीद की जाना चाहिए कि मंत्री  पद एवं चुनावी राजनीति से दूर होकर उमा भारती वाकई इन दो दिशाओं में कुछ कर सकती हैं। उम्मीद यह नहीं है कि वह मंदिर विवाद का हल अदालत के बरखिलाफ जाकर कर दें। उनसे यह आशा है कि मंदिर निर्माण के लिए वह भाजपा के उन संयमित एवं विधि सम्मत आचरण की ध्वजा वाहक बनकर दिखें, जिस आचरण से इस पार्टी के ऐसे तमाम नेता भी गुरेज करने लगे हैं जो ‘जय-जय श्रीराम’ की लहर पर सवार होकर ही राजनीति के शीर्ष पर विराजमान हो सके थे।&


  कहा जाता है कि छत्रपति शिवाजी के एक किले में काम करने वाली महिला कर्मचारी को वहां देर रात हो गई। तब तक किले के दरवाजे बंद हो चुके थे। द्वारपालों ने नियम का हवाला देकर सूर्योदय से पूर्व दरवाजे खोलने की बात से इनकार कर दिया। महिला को घर  पर मौजूद उसके दुधमुहे बच्चे की चिंता सता रही थी। किले की दीवार का अपेक्षाकृत कम ऊंचा हिस्सा देखकर वह वहां से नीचे उतर गई। पूरे समय उसकी जुबान पर ‘मेरा बच्चा’ सवार था। इसी धुन में वह झाड़ियों, फिसलन और ढलान के बावजूद नीचे उतरती चली गई। सुबह जब वह दोबारा किले में आई तो उसे हिरासत में ले लिया गया। आरोप लगा कि वह किले से बाहर जाने का कोई गुप्त रास्ता जानती है। महिला ने शिवाजी को सच बताया। छत्रपति उसे लेकर उसी हिस्से में गए। वहां से नीचे उतरने को कहा। दिन की रोशनी में महिला ने नीचे देखा तो उसके प्राण सूख गए। वह भयावह रात में जिस जगह से नीचे उतरी थी, वह बेहद ऊंचाई पर थी और वहां से नीचे उतरना नामुमकिन था। तब उसने अपने बच्चे की याद आने वाली बात बताई। शिवाजी ने महिला को यह कहते हुए रिहा कर दिया कि ममत्व ने उसे किसी भी गंभीर परिणाम के डर से मुक्त कर दिया था। इसलिए उसका खतरनाक खाई में उतरकर सुरक्षित घर तक पहुंचना असामान्य बात नहीं है।  मंदिर और गंगा, साध्वी के लिए किसी संतान की ही तरह प्रिय हैं। लम्बे समय से वह जिस तरह की सियासत में शामिल रहीं, उसमें इन दो बिंदुओं की खातिर जोखिम लेना आत्महत्या जैसा घातक साबित हो सकता था। शायद मंत्री पद और चुनाव से सर्वथा विरत मन में ममत्व का भाव वह जोर मार ले, जो भगवान तथा नदी से जुड़े मकसद को पाने की गुफा के भयावह अंधेरे एवं फिसलनदार होने की आशंका के बावजूद उमा को उनकी मंजिल तक ले जाए।  

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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