तूने पहन तो लिए कपड़े मेरे मगर...



जरा पता लगाइए कि राहुल गांधी का दर्जी कौन है? पता लग गया तो वह आपको बहुत रोचक जानकारी दे सकता है। यह कि गांधी ने यकायक शर्ट सहित कुर्ते के छाती वाले हिस्से का नाप 56 इंच रखवाना शुरू कर दिया है। यह कथन कल्पना मात्र है, लेकिन उसमें हकीकत का कुछ पुट तलाशा जा सकता है। आगामी आम चुनाव के पहले गांधी जिस तरह घोषणावीर बनकर उभर रहे हैं, उससे वह नरेंद्र मोदी याद आते हैं, जो इन बीते चुनावों के पहले तक 56 इंच की बात कहते हुए दनादन घोषणाएं करते जा रहे थे।  किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा काम कर गयी। तीन राज्यों में अन्नदाता ने कांग्रेस की सरकार बनवा दी। छत्तीसगढ़ में तो उसने कांग्रेस के पक्ष में वोटों की लहलहाती फसल खड़ी कर दी। इससे उत्साहित गांधी ने बीते दिनों गरीबों को न्यूनतम आय की गारण्टी दे दी और अब कह दिया है कि उनकी पार्टी के आम चुनाव जीतते ही महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराया जाएगा। निश्चित ही तीनों घोषणाएं उनके दायरे में आने वालों के कल्याणकारी नजर आती हैं। इनके पीछे राहुल की जो रणनीति छिपी है, वास्तव में उसने नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे घुटे हुए राजनीतिज्ञों की भी नींद उड़ा दी होगी। क्योंकि गांधी ने एक भी घोषणा के साथ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए की सरकार बनने जैसी शर्त नहीं रखी है।


वह साफ कह रहे हैं कि कांग्रेस की सरकार बनने की सूरत में यह सब किया जाएगा। यानी कांग्रेस अध्यक्ष ने मतदाता के पाले में यह कहते हुए गेंद डाल दी है कि क्रांतिकारी किस्म की सुविधाओं का लाभ लेना है तो उनके दल को ही स्पष्ट बहुमत दिलाना होगा। ध्यान रहे कि गांधी ने बीते दिनों पश्चिम बंगाल में जुटे करीब दो दर्जन विपक्षी दलों की रैली से भी किनारा कर लिया था। वह उत्तरप्रदेश में बजरिये प्रियंका गांधी समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी के सियासी गठबंधन की धार भोथरी करने की तैयारी भी कर चुके हैं।  सच कहें तो राहुल गांधी ने इन घोषणाओं के जरिए बहुत बड़ा जोखिम उठाया है। मोदी के नेतृत्व वाली सरकार यदि इस साल सत्ता से खदेड़ दी गयी, तो इसका सीधा दोष मोदी की चुनाव-पूर्व की गयी अधूरी घोषणाओं को ही दिया जाएगा। केंद्र में भाजपा नेताओं की पेशानी पर जो बल दिखते हैं, उन्हें किसी माइक्रोस्कोप के जरिए देखिए। आप पाएंगे कि उनके नीचे असंख्य वह बेहद सूक्ष्म बैक्टीरिया बिलबिला रहे हैं, जो मोदी के अंतत: थोथे साबित हुए ऐलानों की गंदी तस्वीर पेश कर रहे हैं। नितिन गडकरी हाल ही में फरमा चुके हैं कि घोषणाएं पूरी न करो तो जनता पीटती है। पिटाई होने के पहले का यह डर सीधा मोदी के 56 इंच वाले टूटते तिलिस्म से जुड़ा हुआ है।


ऐसे आसन्न हालात के बावजूद गांधी जटिल किस्म की घोषणाओं को जिस तरह अपने श्रीमुख से उगल रहे हैं, उसके लिए कहा जा सकता है कि वह अगला मोदी बनने की कोशिश में हैं। वह भी ऐसे समय, जब यह साफ दिख रहा है कि किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा किस तरह मध्यप्रदेश सरकार के लिए सांप और बिच्छु वाले रूप में तब्दील हो चुकी है।  गांधी की घोषणाओं का खौफ विपक्षी दलों में भी दिखने लगा है। मायावती ने न्यूनतम आय की गारण्टी को लेकर सवाल उठा दिए हैं। वह भी मुर्दा उखाड़ने की तर्ज पर इंदिरा गांधी के घोर असफल गरीबी हटाओ के नारे की याद दिलाते हुए। बसपा सुप्रीमो के इस कथन का विस्तार कर गांधी से पूछा जा सकता है कि साठ साल तक इस देश पर राज करने वाली उनकी पार्टी इस आशय की एक भी घोषणा को अमल में क्यों नहीं लायी? क्योंकि यह वह दल है, जो अपनी छह दशक की घोर नाकामियों को दरकिनार कर इसी बात के लिए आगबबूला हो रहा है कि मोदी  सरकार पांच  साल में अपने कई कार्यक्रम पूरे नहीं कर सकी। छप्पन इंच का सीना वाली कल्पना के चलते कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं। किसी ने लिखा था, ‘तीर सा मचल सकेगा क्या? मोम सा पिघल सकेगा क्या? तूने पहन तो लिए जूते मेरे मगर, चाल मुझ-सी चल सकेगा क्या?’ मोदी ने कई मौकों पर वाकई 56 इंच जैसा आचरण दिखाया है। इसी सीने के नाप वाले कपड़े पहनने जैसा उपक्रम कर रहे गांधी से  पूछा जा सकता है कि ‘...तूने पहन तो लिए कपड़े मेरे मगर, दम मुझ-सा दिखा सकेगा क्या?’  

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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