तुमने इस तालाब से रोहू पकड़ने के लिए...



यह तथ्य हर तरह से विचलित करता है। चाहे आप अतीत से वाकिफ हों या नहीं। भोपाल के साउथ टीटी नगर में जो कुछ चल रहा है, वह विकास के नाम पर विनाश की घिनौनी साजिश से कम नहीं है। 'अक्ल के अंधे राजनेताओं' और 'गाठ के पूरे साहब बहादुरों' ने विकास के नाम पर जो तबाही मचाई है उसमें इस तथाकथित विकास की आड़ में हजारों फलदार हरे-भरे वृक्षों की बलि दी जा चुकी है। सिलसिला थम नहीं रहा है। जो बचे हैं, उन पर किसी भी समय कुल्हाड़ी चलना तय है। ऐसा इसलिए कि इस पूरी जगह के सिर से हरियाली की चूनर को नोच फेंककर वहां कांक्रीट जंगल तैयार किया जा रहा है। साहब बहादुरों के लिए यहां भव्य मकान बनाए जा रहे हैं। स्मार्ट सिटी ने साऊथ और नार्थ टी टी नगर का सत्यानाश किया और अब इसके दूसरे हिस्से का सत्यानाश साहब बहादुरों के लिए बहुमंजिला इमारत बना कर किया जा रहा है। चौढ़ी सड़क बनाने के लिए  कई मकानों और हरियाली को उजाड़ना अभी बाकी है।  जिन लोगों ने भोपाल के इस इलाके को देखा है, वह बखूबी जानते हैं कि एक विशिष्ट सभ्यता सहित हरियाली के संरक्षकों को वहां से बेदखल कर दिया गया है। भाजपा के शासनकाल में शुरू हुआ यह खेल आज कांग्रेस की सरकार में भी बदस्तूर जारी है। खैर, कांग्रेस तो कुछ कर पाने से रही। क्योंकि सत्ता की बागडोर उसके हाथ में आने तक इस समूचे इलाके को इस हद तक बिगाड़ दिया था कि वहां का पुराना स्वरूप और पुरानी हरितिमा को फिर लौटा पाना मुमकिन ही नहीं रह गया था।  सत्तारूढ़ नेताओं की अक्ल पर तो पट्टी बंधी थी, लिहाजा सरकार के सर माथे पर नाच रहे कुछ नौकरशाहों ने यह खेल शुरू किया। जमीन माफिया को उपकृत करने के लिए।


अपने भी हित साधने के लिए। विकास के हिस्से का कमीशन खाने और नेताओं को उनके हिस्से का पहुंचाने के लिए। किसी ने भी यह कहने का साहस नहीं किया कि आधुनिकीकरण की इस बाढ़ में हजारों दरख्त हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे।  बेशक आप कहेंगे कि किसी खास जगह से काटे गए वृक्षों की संख्या वाला वृक्षारोपण कहीं और करकर इसकी क्षतिपूर्ति करने का नियम है। लेकिन कोई यह तो बताए कि क्या आज रोपा गया पौधा देखते ही देखते एक या दो दिन में पेड़ का रूप ले सकता है? कम से कम बीस साल लगता है एक पौधे को पेड़ का रूप लेने के लिए। यानी आपने भोपाल के पर्यावरणीय संरक्षण को दो दशक पीछे धकेल दिया है।  बाबुओं और नौकरशाहों के इस शहर में हजारों पेड़ों का कत्लेआम किया जा रहा है, लेकिन इन उजड़ती बस्तियों में कहीं कोई उफान ही नहीं है। एक सवाल है। क्या भोपाल शहर के भीतर ही वह जमीन बची थी, जिस पर नेताओं और अफसरान के लिए बंगले ताने जा सकते थे? साउथ टीटी नगर नये रूप में आएगा तो वहां अफसरों के लिए एक डी टाईप का ट्विन टॉवर होगा। जो लोग किसी ट्विन टॉवर में जगह लेने या डी टाइप मकान पाने की पात्रता रखते हैं, वे आर्थिक रूप से इतने सक्षम होते हैं कि भोपाल के किसी बाहरी इलाके से रोज भीतर तक आना-जाना करना उनकी माली सेहत पर कोई असर नहीं डालता है। तो फिर क्यों नहीं ऐसा किया गया कि शहर के किसी बाहरी इलाके का चयन इस काम के लिए किया जाता। ऐसी जगह जहां हरियाली का अपेक्षाकृत कम नुकसान होता। जहां किसी बसी-बसायी आबादी को खदेड़ने का काम नहीं करना होता।


और अगर रीडेंसीफिकेशन ही करना था तो क्या कोई ऐसा रास्ता नहीं निकाला जा सकता था कि पेड़ पौधों को बचा कर पुराने निर्माण में ही नए निर्माण कर लिए जाते? जो तबाही हो गई, उसका तो कुछ होने से रहा लेकिन नई सरकार से क्या यह अपेक्षा की जा सकती है कि वो विकास के नाम पर उजाड़ने का खेल खत्म करेगी। सत्ता से विदा हुए पुराने हुक्मरान ने हाल ही में कहीं जनता के बीच गया है, 'हमसे का भूल हुई जो यह सजा हमका मिली.....' किश्तों में हुई भूलों की अभी तो बहुत सी सजाएं बाकी होना चाहिए। गैस त्रासदी के बाद भोपाल के मौसम ने जो करवट ली, वह आज तक कभी भीषण सर्दी तो कभी झुलसा देने वाली गरमी के रूप में परेशान करता है। बरसात का भी यहां अनियमित क्रम हो चुका है। तिस पर शहर के बीचों-बीच से असंख्य पेड़ काटे जाना यहां के पर्यावरण को कितनी हानि पहुंचाएगा, इसका उत्तर जानने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। अगली गरमी सिर पर है। उसे चरम पर आने दीजिए। तापमान का झुलसा देने वाला क्रम हमें याद दिलाएगा कि इसकी बहुत बड़ी वजह साउथ टीटी नगर की विकास के नाम पर की गयी बबार्दी है। जो कुछ हुआ, उसे देखकर दुष्यंत कुमार की याद आती है। उन्होंने लिखा था, 'तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिए, छोटी—छोटी मछलियां चारा बनाकर फेंक दीं। जाने कैसी उंगलियां हैं, जाने क्या अंदाज हैं, तुमने पत्तों को छुआ था, जड़ हिला कर फेंक दी।'भोपाल की इस बेशकीमती जमीन में स्वार्थ की रोहू पकड़ने के लिए आम जनता को चारा बना दिया गया। वास्तव में ऐसा करने वालों की उंगली और अंदाज इतने घातक रहे कि उन्होंने यहां की हरियाली को जड़ से उखाड़कर खत्म कर दिया। दुष्यंत ने सन 1975 में भोपाल शहर में ही अंतिम सांस ली। क्या अपने जीते-जी उन्हें कभी साउथ टीटी नगर के इस हश्र का पूवार्भास हो गया था?

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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