पेस्ट कंट्रोल की जरूरत वाला समय



यह व्यापक तौर पर पेस्ट कंट्रोल की क्रिया शुरू करने का अवसर है। दीमकों की असंख्य प्रजातियां किस्म-किस्म के चोले पहनकर देश की सेना के गर्व को चट कर जाने पर आमादा हैं। देश की अस्मिता को खोखला करने पर उतारू हैं। ऐसा करने वालों में कई राजनीतिक मंचों पर कुंडली मारकर बैठे हुए  हैं। अनेक ने न्यूज चैनल के स्टूडियो में कैमरों के सामने डेरा डाल दिया है। टिड्डी दल की शक्ल में सोशल मीडिया पर अतातायी दल ज्ञान के अजीर्ण के चलते कै कर रहे हैं। ऐसे में पेस्ट कंट्रोल बहुत जरूरी हो गया है।  कश्मीर की सीमा लांघकर पाकिस्तान की सीमा के भीतर बालाकोट इलाके में जाकर कौन जान पर खेला? किसने वहां बमबारी करते हुए पाकिस्तान को साफ संदेश दे दिया कि  अहिंसा के पुजारी समय आने पर हिंसक प्रतिकार करना भी जानते हैं? दोनों का एक ही उत्तर है, हमारे सैनिक। लेकिन कुंडली मारकर बैठे समूह का कोई क्या करे? नरेंद्र मोदी इस कार्रवाई का सियासी लाभ लेने पर उतारू हैं तो विपक्ष का आचरण भी भौंडेपन की सीमाओं के बाहर जाता दिख रहा है। अमित शाह का बस चले तो वह तो यह तक कह दें कि मिराज में बैठकर पीओके तक जाने वाले वायुसेना के सभी पायलट भाजपा के सदस्य हैं। इधर, ममता बनर्जी की मर्जी चल जाए तो शायद वह यह सबूत भी मांग बैठें कि देश में सेना नामक किसी संस्था का अस्तित्व है भी या नहीं। राहुल गांधी के पेट में मरोड़ उठ रही है। उन्हें दर्द है कि मोदी इस कार्रवाई का राजनीतिकरण कर रहे हैं। यदि वे अपनी पार्टी का अतीत पलटते तो उन्हें पता चल जाता कि कांग्रेस ने भी दशकों तक बंगलादेश को अस्तित्व में लाने का श्रेय लेकर सियासत करने में कभी कोई कसर नहीं उठा रखी थी।


राजनीतिक दलों के बीच श्रेय की होड़ तो ऐसी मची, जिसने मुंबई के कमाठीपुरा और दिल्ली की जीबी रोड के दलालों के बीच ग्राहकों को लेकर होने वाले झगड़ों को भी पीछे छोड़ दिया।  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का माहौल तो ऐसा है, जिसे बिना किसी शर्म के ‘मुंह के भीतर हुई बवासीर’ की संज्ञा दी जा सकती है। जुबान की खुजली मिटाने के लिए कुछ भी कहना है। किसी ने कह दिया कि भारतीय सेना ने साढ़े तीन सौ आतंकी मार गिराये। इधर, खुद को श्रेष्ठि वर्ग का समझने वाले गिरोहनुमा मीडिया का दावा है कि वहां केवल एक कौआ मरा। जिस बात को लेकर आपके देश की सरकार गोपनीयता बरत रही हो, उस पर ऐसी मनमानी बयानबाजी का भला क्या औचित्य है? हां, तथ्यों और सबूतों के साथ यदि ऐसी बात कही जाए, तो किसी को आपत्ति नहीं होगी। लेकिन इसके लिए समय कौन खराब करे! समय तथा ऊर्जा तो इस बात में खपायी गयी कि अभिनंदन वर्तमान का घर कहां है। परिवार के सदस्य कौन-कौन हैं तथा वे क्या काम करते हैं। यह वह जानकारियां थीं, जो पाकिस्तान अभिनंदन से लेना चाह रहा था। वर्तमान ने इनका खुलासा करने से साफ मना कर दिया, लेकिन टीआरपी का भूखा मीडिया दुश्मन देश को यह सारी जानकारी परोसता नजर आ गया। याद रखें कि इस होड़ के चलते ही मुंबई आतंकी हमले का लाइव टेलीकास्ट किया गया और एक न्यूज चैनल पर हेमंत करकरे की पोजीशन देखकर आतंकियों को उन्हें निशाना बना लिया था।  सोशल मीडिया तो उफ! निठल्लों की जमात में जिसे जो सूझा, वह पोस्ट कर दिया। यह नस्ल घर के भीतर बैठकर गला तर करते हुए पाकिस्तान को ललकारने का पराक्रम जताती रही। मौका मिलते ही ढेर आतंकियों की संख्या पांच सौ से अधिक कर दी तो कुछ ने लगे हाथ इस कार्रवाई की सत्यता पर सवालिया निशान लगा दिए।


पुलवामा के  शहीदों के लिए आंसू बहाने का जो स्वांग किया गया, यदि वह वास्तव में हो जाता तो आसूओं का वह सैलाब उठता, जो पाकिस्तान का नामो-निशान मिटा सकता था। लेकिन न आंसू बहे और न ही सैलाब वाली स्थिति आयी। अधिकांश पोस्ट घोर गैर-जिम्मेदाराना रवैये वाले दिखे। जो सेना की हौसला अफजाई करने वाले कम और माहौल का तनाब बढ़ाने वाले अधिक थे।  इस सबके बीच एक सवाल है। सेना के पराक्रम तथा हौंसले पर किसी को शक नहीं, किंतु केंद्र सरकार और राजनीतिक नेतृत्व की इच्छा शक्ति के बगैर क्या यह संभव था कि लड़ाकू विमान पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर नहीं बल्कि पाकिस्तान की सीमा के भीतर बालाकोट इलाके में घुसकर बम गिरा देते? इसके अलावा सरकार ने अपनी तरफ से यही जानकारी दी कि बालाकोट हमले में जेश ए मोहम्मद के ठिकाने पर हमला किया है। वहां कई आतंकियो के मारे जाने की संभावना है। संख्या का कोई प्रचार विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने नहीं दिया। यह आंकडे तो टीआरपी के भूखे मीडिया की देन है। यह हिंदुस्तान है। अनुशासित सेना वाला। यहां की सेना के लिए यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वह सरकार की सहमति के बिना ऐसे किसी काम को हाथ में ले ले। इसलिए पीओके में गिराए गए बमों का श्रेय और सेना की कार्रवाई के लिए निश्चित तौर पर मोदी को भी श्रेय दिया ही जा सकता है।  हालांकि विपक्ष का यह आरोप सही है कि मोदी सरकार सेना के शौर्य का राजनीतिक लाभ लेना चाह रही हैं, लेकिन यह भी तो सही है कि ऐसा इस देश में पहली बार अकेले मोदी या भाजपा ने नहीं किया है। दरअसल होना यह चाहिए था कि इस वक्त में सारा देश निजी राय और निहित स्वार्थ से परे सिर्फ और सिर्फ सेना के हक और आतंकवाद के खिलाफ खड़ा रहता। उसकी वास्तविक हौंसला अफजाई करता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आजादी के बाद के अनुभव बताते हैं कि ऐसा हो नहीं सकता और होने भी नहीं दिया जाएगा। इसलिए पेस्ट कंट्रोल बेहद जरूरी है। दीमकों को समूल नष्ट करने की खातिर यह कदम समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।  

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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