चीन के खिलाफ सख्त कदम का समय



साल 1964 में रिलीज हुई फिल्म 'हकीकत' दो तरह से उल्लेखनीय है। पहला, यह चेतन आनंद की तमाम औसत दर्जे की फिल्मों की तुलना में बेहद प्रभावी निर्माण था। दूसरा, फिल्म में 1962 के युद्ध में चीन के हाथों भारत की पराजय के बावजूद हमारी महान सेना के शौर्य और कुर्बानी का अकल्पनीय चित्रण किया गया था। अंतत: कई साल बाद डोकलाम में भारतीय सेना ने जता दिया कि वह हकीकत में चीन से कमजोर नहीं रही है।  कल भी भारत की चीन के हाथों एक पराजय हुई है। इस पराजय में भारत अकेला भागीदार नहीं है। दुनिया के बड़े देश भी शामिल हैं। अजहर मसूद के शरीर में लोहा उतारने का हमारा प्रयास विफल रहा। राजनीतिक दलों के बीच इस विषय पर अपने-अपने स्वार्थ के हिसाब से बहस चल रही है। किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि अंतत: मामला हमारे देश की प्रतिष्ठा का है। इस लिहाज से यह समय इस हार से ध्यान हटाकर इस ओर केंद्रित करने का है कि चीन को किस तरह धूल चटायी जाए। वर्तमान हालात में इसका जवाब यही नजर आता है कि अपने संबोधन के अनुरूप ही अंतत: ड्रेगन साबित हुए चीन का अर्थ के जरिए ही अनर्थ किया जा सकता है।  भारत को चाहिए कि अपने बाजार में चीन का दखल इतना कठिन कर दे कि यह देश कराह उठे। यह सर्वविदित है कि चीन के अत्यंत हल्के स्तर के उत्पादों को भारत जैसे विकासशील बड़े देश में ही खपाया जाता है।


यहां उसे अच्छा मुनाफा मिलता है और जनता भी कम दाम के फेर में उसके उत्पादों को हाथों-हाथ ले लेती है। पुलवाम के बाद भारत ने पाकिस्तान पर व्यापार संबंधी जो सख्तियां की, अब उन्हें चीन पर भी लागू करने का समय आ चुका है। यह कठिन नहीं है। जन सहयोग से इसे हम एक बार कर चुके हैं। बीते साल की दीपावली याद कीजिए। चीन में इस त्यौहार के लिए निर्मित होने वाले सामान की बिक्री में करीब चालीस फीसदी की कमी दर्ज की गयी थी। तब देश का जनमानस उबल पड़ा था। क्योंकि इस देश ने हमारे के लिए अनुचित संबोधन का प्रयोग किया था। सोशल मीडिया की बदौलत देश की जनता में चेतना का प्रसार हुआ और चीन के बाजार को करारा झटका देने में हम सफल रहे।  वर्तमान घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है, जब चीन की लगातार कोशिश है कि भारत में निर्यात को और बढ़ाए। उसके इस प्रयास को नाकाम करने के लिए एक बार फिर जनक्रांति की जरूरत है। उसके उत्पादों को न खरीदने का हर भारतीय का संकल्प अजहर मसूद जैसे मानवता के दुश्मन की मदद करने का जबरदस्त प्रतिसाद साबित होगा, इसमें कोई शक नहीं है। राष्ट्रवाद का जो ज्वार पिछले दिनों उठा है उसे साबित करने का यह सही मौका है। यहां सरकार की ओर से भी सख्त कदम की दरकार है। याद रखें कि भारत व चीन दोनों विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सदस्य हैं। ऐसे में भारत डब्ल्यूटीओ के नियमों के तहत चीनी माल पर टैरिफ या गैरशुल्कीय प्रतिबंध लगाकर चीनी माल को रोक नहीं सकता है।


लेकिन डब्ल्यूटीओ के नियमों का हवाला देते हुए चीन ने बोवाइन मीट, फल, सब्जियों, बासमती चावल और कच्चे पदार्थो के भारत से आयात पर बाधाएं उत्पन्न की हैं। ऐेसे में भारत द्वारा भी चीन के लागत से कम मूल्य पर माल भेजकर भारत के बाजार पर कब्जा करने का आधार देकर चीन के कई तरह के माल पर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाकर उन्हें हतोत्साहित करना होगा।  जनता और सरकार, दोनो के स्तर पर देश-हित में उठाए गए कदमों का चीन की अर्थव्यवस्था पर अनर्थकारी असर होना तय है। इस देश ने  वर्ष 2015 के बाद से अब तक अपनी करेंसी युआन के मूल्य में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारी कमी की है। इससे चीन के निर्यातकों को फायदा हो रहा है। चीन की मुद्रा सस्ती होने से वहां से भारत में आयात किया गया हर सामान सस्ता हुआ है। भारत में सस्ते चीनी सामान की आवक तेजी से बढ़ी है। जनता को चाहिए कि इस सस्ते के मोह को त्यागकर संकल्प ले कि देश-हित में चीन के सामान से कोई वास्ता नहीं रखेगी। ऐसा होने से हमारे पड़ोसी देश की हेकड़ी निकलना सुनिश्चित किया जा सकता है। क्योंकि युआन के मूल्य में कमी के बाद भारत को लुभाने का उसके पास यही तरीका बच जाएगा कि वह हमारी सरजमीं पर चलाये जा रहे आतंकवाद से अपने हाथ पीछे खींच ले। इन आसन्न  उपायों के बावजूद यदि किसी को चीन की ताकत का भय हो तो उसे दुष्यंत कुमार का पुण्य स्मरण कर लेना चाहिए। उनकी पंक्तियां, 'कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता...' यही यकीन दिलाएंगी कि चीन का दम्भ से तना सिर नीचे करने की ताकत हम में आज भी विद्यमान है। 

loading...

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति