अभी और बढ़ेगा यह सियासी उथलापन



वह 19 मई नजदीक आ रही है,  जब देश की आठ राज्यों की 59 सीट पर मतदान के साथ ही लोकसभा चुनाव का यह महायज्ञ पूर्ण हो जाएगा। हालांकि आज की बात का आरम्भ ‘यज्ञ’ शब्द से किया गया है, किंतु मामला किसी भी तरह से इतना शालीन नहीं है। छठवें चरण तक राजनीतिक वा तावरण में जिस किस्म के मानसिक प्रदूषण ने असर किया, उसके चलते यह यज्ञ नहीं बर्बर युद्ध वाली प्रक्रिया बनकर रह गयी है। राजनीति में मतभेद तो न जाने कबके मनभेद के स्तर से भी आगे निकल चुके हैं, किंतु पारस्परिक विरोध के दुश्मनी की भी सीमा लांघने और परस्पर विरोधियों के  मर्यादाओं को पार करने की तो अब जैसे होड़ ही लग गयी है। ऐसे में यह भयावह कल्पना बेमानी नहीं लगती कि अंतिम चरण के मतदान से पहले सियासी उथलापन और बदजुबानी चरम पर पहुंच चुकी होगी।  आक्रामकता के भयावह स्तर वाले इस चुनाव में नरेंद्र मोदी सबसे आगे रहे। ऐसे ही तेवरों के दम पर उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री पद का तक सफर तय किया था। बाद के पांच साल उन्होंने इस आक्रामकता का कभी बूमरैंग झेलना पड़ा तो कभी विवश होकर ऐसे ही रुख को  उन्होंने कई बार फिर अपनाया। सच कहें तो मामला काफी हद तक एक विचित्र किस्म की रिले रेस का है। इस दौड़ में एथलीट बारी-बारी से बदलते रहते हैं। यहां मामला कुछ अलग था। भाजपा की ओर से मोदी ही अकेले दौड़े और विपक्षी दलों की टीम से धावकों के चेहरे बदलते रहे


राहुल  गांधी, से लेकर ममता बनर्जी, एन चंद्रबाबू नायडू, मायावती, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल, नवजोत सिंह सिद्धू और सैम पित्रोदा जैसे नाम इनमें प्रमुख हैं। मजे की बात यह कि विपक्ष की ओर से अलग-अलग नेता मोदी के खिलाफ दौड़ तो एक ही ट्रेक पर, किंतु वह अब  तक किसी टीम की शक्ल नहीं ले सके हैं। सबसे खास बात यह कि ये सभी दौड़ के बीच उसी स्तर पर हांफते नजर आते हैं, जितना हांफना अकेले मोदी के हिस्से में आया है।  गुजरात के मुख्यमंत्री निवास से दिल्ली के प्रधानमंत्री निवास तक की रणनीति बनाने के बीच मोदी ने यकीनन बहुत कुछ सहा। हालांकि उन्होंने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की तरह न तो आंसू बहाए और न ही श्राप वाली मुद्रा अख्तियार की। वह इस सबसे सबक लेते रहे। सरकारी एजेंसियों के केंद्र की शह पर अपने खिलाफ हुए नाजायज इस्तेमाल का दंश उन्होंने झेला। वह ‘मौत का सौदागर’ कहलाये। इस घृणित उपाधि को इतनी जादूगरी से उछाला गया कि इसमें से गोधरा में कार सेवकों से भरी ट्रेन जलाई जाने का जिक्र ही कहीं नजर नहीं आया। इशरत जहां कांड हुआ, छींटे मोदी के दामन पर गये। चूंकि मामला तेजी से उभरते आक्रामक नेतृत्व का था, लिहाजा उस समय अपनी साफ छवि के आधार पर विपक्षी दलों की ओर से प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे नीतिश कुमार ने तो अंतत: आतंकवादी साबित हुई इशरत को ‘बिहार की बेटी’ तक कह डाला। सोहराबुद्दीन एनकाउंटर का सारा दोष मोदी के सिर पर मढ़ा गया।


गुजरात दंगे को तो दुनिया-भर में ‘हिंदुत्व का प्रयोग’ बताकर सियासी लाभ का सबब और मोदी की राजनीतिक हत्या के औजार के रूप में इस्तेमाल करने का कृत्य तक किया गया। वस्तुत: ऐसा करना भाजपा के विरोधियों की मजबूरी बन गया था। मोदी जिस तीखे अंदाज से आगे बढ़ रहे थे, उससे कांग्रेस का यह डर स्वाभाविक था कि उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी को ऐसा नेतृत्व मिलने जा रहा है, जो कांग्रेस की सियासी संभावनाओं को कई दशक पीछे धकेलने और उसकी राजनीतिक ताकत को नींबू से रस की तरह निचोड़ फेेंकने का दम रखता है। यह वह समय था, जब कुकुरमुत्ते की तरह उगे कई क्षेत्रीय दल भी इस चिंता से भरे हुए थे कि मोदी की राजनीतिक ताकत बढ़ी तो इस देश को खिचड़ी सरकारों की दम पर अपनी तरह से चलाने का उनका मंसूबा धरा का धरा रह जाएगा। हालांकि तमाम कोशिशें नाकाम रहीं और सन 2014 के लोकसभा चुनाव ने जता दिया कि मोदी को टोकना आसान है, रोकना नामुमकिन।  मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बनने के बीच मोदी को जो सियासी सबक मिले, उनका सन 2014 से अब तक लाभ उठाने में मोदी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने कई वरिष्ठ नेताओं और घनिष्ठ रिश्तेदारों पर जांच एजेंसियों के कसे शिकंजे से बिलबिला रहे विपक्ष के इस आरोप में कई मौकों पर दम दि खता है कि मोदी ने जांच एजेंसियों का दुरूपयोग किया है। ठीक उसी तरह, जैसा कभी खुद उन और अमित शाह के खिलाफ किया गया था। यानी वर्तमान प्रधानमंत्री ने जो किया, वह कतई नया नहीं था। हां, मोदी अगर चाहते तो प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुसार मर्यादा का एक नया अध्याय लिख सकते थे।


लेकिन उनके सत्तासीन होने को ही कई लोग इस देश में पचा नहीं पाए तो मोदी के लिए भी प्रधानमंत्री पद की मर्यादा को उच्च स्तर पर बनाए रखना उनके अतीत को देखते हुए मुश्किल ही था। इस देश के राजनीतिक कदाचार में वह कोई नयी प्रेक्टिस का हिस्सा नहीं था। ध्यान दीजिए कि एक शख्स जो सतत रूप से कटाक्षों का सामना कर रहा है। कभी ‘चोर’ सुन रहा है तो कभी अपनी पत्नी के नाम पर घिनौने तंज-दर-तंज का शिकार बन रहा है। जिसकी इस बात तक के लिए आलोचना की जा रही है कि वह अपनी मां का आशीर्वाद लेता है और जिस इस बात के लिए भी आरोपों के घेरे में लिया गया कि उसने विदेशों के रिकॉर्ड तोड़ दौरे किए। वही दौरे, जिनकी दम पर आज अमेरिका को भारत से बराबरी के स्तर की मित्रता निभाना पड़ रही है। चीन को डोकलाम पर पीछे हटना पड़ा और अजहर मसूद जैसे आतंकी के प्रति अपने प्रे्रम का जिसे परित्याग करना पड़ गया। वही दौरे, जिनके बाद पाकिस्तान लाख प्रपंच करने के बावजूद भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक बार भी पूरी ताकत से नहीं घेर पा रहा है। यह वह यात्राएं रहीं, जिनके असर से इजरायल के प्रधानमंत्री को मोदी के लिए ‘मेरे प्यारे दोस्त’ कहना पड़ा और जिनके चलते अफगानिस्तान ने पुरजोर तरीके से हमारे सुर में सुर मिलाकर पाकिस्तान को आतंकवादी देश कहा।  खैर, लोकसभा चुनाव में मोदी ने संयम खोया तो बाकी अधिकांश राजनेता भी इसमें पीछे नहीं रहे। तो यही मानकर मन मार लीजिए कि यह एक किस्म की प्रतियोगिता थी। अब सवाल यह कि इसमें विजयी होता कौन दिख रहा है। जवाब है, मोदी।


क्योंकि उनकी आक्रामकता आज भी पुरजोर असर  लिए हुए है। मोदी की इस हासिल होती कामयाबी का राज यह है कि उन्होंने विपक्ष के आरोपों के जवाब देते हुए अपने संयम को छोड़ा। कांग्रेस एक राफेल लेकर मैदान में आयी तो मोदी ने एक राजीव गांधी की याद दिलाकर बोफोर्स सहित सिख-विरोधी दंगे और भोपाल गैस कांड की यादें ताजा  कर दीं। कीचड़ उछालने की इस प्रक्रिया में कभी प्रियंका वाड्रा ने भी ‘दुर्योधन’ के जरिए हाथ गंदे किए तो कहीं राबड़ी देवी ने ‘जल्लाद’ के द्वारा अपने कुनबे की राजनीतिक परम्पराओं को और मजबूती एवं नया आयाम प्रदान कर दिया। हिमाचल प्रदेश में यदि सतपाल सिंह सत्ती ने राहुल गांधी के  लिए घोर अपमानजनक शब्द कहे तो कांग्रेस के खेमे से नवजोत सिंह सिद्धू का जुबानी तेजाब भी लोकतंत्र की आत्मा को जलाता चला गया। जाति पर आधारित सियासत वाली मायावती मोदी की जाति के पीछे पड़ गयीं तो ममता बनर्जी ने अपने वचनों में केवल यह गुंजाइश बाकी रखी कि मोदी के  लिए उन्होंने सार्वजनिक रूप से किसी अपशब्द के बजाय थप्पड़ का ही प्रयोग कर डाला। स्पष्ट है कि 19 मई से पहले-पहले यह गंदी प्रतियोगिता चरम पर होगी। हॉलीवुड की फिल्म ‘आॅल द मार्बल्स’ यानी ‘द कैलीफोर्निया डॉल्स’ मेरे एक परिचित ने करीब सात बार देखी थी। उनके सुझाव पर मैंने भी इसे एक बार देखा। किसी जगह कीचड़ में लिपटी लड़कियां कुश्ती प्रतियोगिता करती दिखीं तो किसी जगह उन्हें इस खेल के दौरान खून से लथपथ होकर जीतने की कोशिश करते दिखाया गया। मैंने इस पर अरुचि का भाव दिखाया तो सज्जन बोले, ‘कीचड़ और खून छोड़ो। कम कपड़ों में कुश्ती लड़ती युवतियों का आनंद क्या कम है।’ क्या इस बेहद घिनौनी हो चुकी राजनीतिक कुश्ती में भी इसी तरह के किसी आनंद का तत्व तलाश लिया जाए! क्योंकि बाकी तो यह गंदगी और किसी भी जतन से सहन नहीं हो पा रही है। क्योंकि यहां तो प्यार में भी धुंआधार चौतरफा नफरत छिपी है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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