एक हमाम होता है और उसमें बस......



अब अगर अमित शाह के पास यह जानकारी है कि बालाकोट में हुई एयर स्ट्राइक में ढाई सौ से ज्यादा आतंकवादी मारे गए हैं तो फिर विपक्ष का सबूत मांगना नाजायज कैसे हो सकता है? अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष है। भाजपा देश का वो राजनीतिक दल है, जिसकी केन्द्र में बहुमत की सरकार है। अब जिस दिन अमित शाह ढाई सौ आतंकवादी मारने का दावा कर रहे हैं, उसी दिन वायुसेना प्रमुख बी एस धनोआ कह रहे हैं कि वायुसेना का काम टार्गेट पर निशाना साधना था, लाशें गिनने का काम वायुसेना नहीं करती है। सवाल तो फिर बनता ही है कि अमित शाह को मारे गए आतंकियों की लाशें गिनकर किसने बताई? वायुसेना प्रमुख ने अपने संवाददाता सम्मेलन में कहा भी कि मारे गए आतंकियों की संख्या या सबूत देने का काम सरकार करेगी। वायुसेना नहीं। सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष के पास अगर यह जानकारी है तो जाहिर है उनका सोर्स सरकार ही हो सकता है। अब जब सरकार अपने पार्टी अध्यक्ष को यह जानकारी चुनावी सभाओं में जनता के बीच दावा करने के लिए बता सकती है तो फिर देश की आम जनता को सरकार खुद यह जानकारी या सबूत क्यों नहीं दे देती? जाहिर है पाकिस्तान के साथ भारत के ताजा तनाव को भाजपा लोकसभा चुनाव में भुनाने की तैयारी कर रही है। जरूर भुनाएं, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मैंने तो सोमवार को लिखे अपने कालम में कहा भी था कि यदि अमित शाह वायुसेना के  बालाकोट  में हमला करने गए वायु सैनिकों को भी भाजपा का सदस्य बता दें तो ताज्जुब नहीं करना चाहिए।


पर कम से कम मोटा भाई को यह तो नहीं भूलना चाहिए था कि अभी भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहा खेल विंग कमाडंर अभिनंदन की वापसी के साथ या फिर पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों  के भारतीय सीमा के उल्लंघन के साथ 'हिसाब-किताब बराबर' की तर्ज पर खत्म नहीं हो गया। पाकिस्तान कुत्ते की ढेड़ी पूंछ है। सीमा पर रोज टूट रहा सीजफायद इसका उदाहरण नहीं है क्या। हां, मैं मोदी या उनके समर्थकों की इस बात से सहमत हूं कि ये भारत बदल गया है। भारत का वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व पाकिस्तान को किसी भी सीमा तक जाकर सबक सीखा सकता है। कायदे से एयर स्ट्राइक में कितने मारे गए, यह कहीं से सवाल ही नहीं था। बड़ी बात यह थी कि भारतीय वायु सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में सीमित सर्जीकल स्ट्राइक नहीं की थी बल्कि पाकिस्तान के एक राज्य में जाकर आतंकवादी ठिकानों पर बम गिराए थे। इस एयर स्ट्राइक को पहले खुद पाकिस्तान ने ही स्वीकारा किया था। दूसरी बात जहां बम बरसाए गए थे वो निश्चित तौर पर जेश-ए-मोहम्मद के आतंक की पाठशाला था। यह तो वहां के स्थानीय रहवासियों ने भी स्वीकार किया है। अब अगर वहां बमबारी हुई है तो जो मौजूद रहा होगा वो मरा ही होगा।  जाहिर तौर पर यह माना जा सकता है कि पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान भारत की तरफ से किसी कार्रवाई की उम्मीद तो कर रहा था पर भारत क्या कदम उठा सकता है,इसका अनुमान निश्चित तौर पर पाकिस्तान को नहीं रहा होगा। इसलिए पाक सेना प्रमुख बाजवा बार-बार सीमा का निरीक्षण कर रहे थे।


जब मसूद अजहर की पाकिस्तान देख रेख कर रहा है तो बड़ी बात नहीं कि भारत के रवैये को देखते हुए उसने मसूद को अपने सुरक्षा कवच में लिया ही होगा। इसलिए बालाकोट के शिविर में कौन था? कौन नहीं था? कितने मरे और कितने बचे? यह कहीं से भी किसी बहस का हिस्सा नहीं ही होना चाहिए। ना इसे सरकार को अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करने की जरूरत है। चुनाव जीतने के लिए बिखरे हुए विपक्ष के अलावा भी मोदी सरकार की कुछ तो उपलब्धियां है हीं। पाकिस्तान पर वायुसेना के आक्रमण के साथ इस सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ अपने सख्त रूख का बार-बार इजहार कर दिया। अब यह सरकार मोदी के नेतृत्व में किसी भी आतंकवादी घटना का प्रतिशोध लेगी, क्या देश के नागरिकों को यह अलग से बताने के लिए ढिंढोरा पीटने की जरूरत बाकी है। विपक्ष की एकता की कोशिशों से चौतरफा घिरे मोदी और भाजपा के लिए एक बहुमत की सरकार की मजबूती और जिसे  मोदी 'महामिलावट' बता रहे हैं, इन गठबंधनों का अतीत ही जनता के बीच प्रचारित करना मोदी या भाजपा की कामयाब रणनीति हो सकती है। लेकिन जब फाउल की शुरूआत खुद सत्तारूढ़ दल कर रहा हो तो फिर विपक्ष को किसी सीमा में बांधने का कोई नैतिक अधिकार किसी को कैसे हो सकता है। लोकतंत्र में अगर ढेर सारी खूबसूरती हैं तो इसकी बदसूरती को भी भुगतने के लिए देश अभिशप्त नहीं होगा क्या? हमेशा याद रखना पड़ेगा कि एक हमाम होता है और उसमें जो होते हैं वे बस केवल नंगे ही होते हैं। हम नंगों के शासन तंत्र में जी रहे हैं। देश में सरकार चाहे कांग्रेस की हो, भाजपा की या किसी गठबंधन या महागठबंधन की। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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