शादी वाले फूफा शिवराज



हिंदुस्तानी शादियों में फूफाजी नामक एक गजब कैरेक्टर होता है। आवभगत या पूछपरख में जरा-सी कमी होते ही वह शादी के हर काम में नुक्स निकालने लगता है। ऐसा करने का मकसद यही होता है कि लोग बाकी सारा काम छोड़कर उनकी मनुहार करने में लग जाएं। शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री रहते हुए भले ही मामा बने रहे, किंतु इस पद से हटने के बाद उनकी दशा भी शादी वाले फूफाजी जैसी ही हो गयी है। शायद वह विधानसभा चुनाव में बहुमत न मिल पाने के शाश्वत सत्य को पचा नहीं पा रहे हैं। ऐसा करके कहीं वह खुद मजाक के पात्र बन रहे हैं तो कहीं समूची भाजपा को विचित्र स्थिति में पहुंचा दे रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री ने गुरूवार को भोपाल में कहा कि भाजपा प्रदेश में सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ नहीं करेगी। इस कथन पर बरबस ही हंसी आती है। सरकार तो कांग्रेस की चल रही है। उसे बाहर से ही सही, बहुमत हासिल है। कमलनाथ जब भी अगला मंत्रिमंडल विस्तार करेंगे उनकी सरकार का सुरक्षित होना या फिर असंतोष होना, उस पर निर्भर करेगा।


लेकिन अभी तो सरकार के पास पूरा बहुमत है तो फिर चौहान कहना क्या चाह रहे हैं? क्या यह इस बात की खीझ थी कि 11 दिसंबर, 2018 के पहले तक कभी रथ पर सवार तो कभी लाल परेड मैदान या जम्बूरी मैदान में गरजने के बाद अब उन्हें भीम नगर जैसी छोटी सी बस्ती में भाषण देना पड़ गया? अगली हंसी तब आती है, जब चौहान कहते हैं कि वर्तमान सरकार संबल  योजना में तब्दीली कर सकती है। उनसे पूछना चाहिए कि जब देश में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार मनरेगा में रत्ती भर भी बदलाव नहीं कर सकी तो निर्दलियों और सपा तथा बसपा की दम पर चल रही कांग्रेस सरकार ऐसा करने का भला सोच भी कैसे सकती है? हां, जिन आर्थिक दिक्कतों को कमलनाथ सरकार झेल रही है,अगर शिवराज भी सत्ता में लौट आते तो क्या करते? आखिर प्रदेश सरकार को तेरह साल लगातार चलाने के बाद इस स्थिति के लिए अहम जिम्मेदार तो शिवराज ही हैं। शिवराज के ताजा एलान के बाद भाजपा अंत:विरोध से लिपटी दिख रही है। क्योंकि उसके राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय तो खुलकर कह चुके हैं कि बॉस का इशारा होते ही प्रदेश की सरकार गिरा दी जाएगी। बॉस बोले तो अमित शाह। सवाल यह कि सच कौन बोल रहा है? किसकी बात में ज्यादा दम है? शिवराज या कैलाश? सच कहें तो शिवराज बुरी तरह बौखलाये दिख रहे हैं।


अभी तो कमलनाथ सरकार ने बमुश्किल सवा महीने पहले काम शुरू किया है। कामकाज एक बार रफ्तार पकड़ ले, तब विपक्ष उसमें नुक्स निकाले तो समझ आता है, लेकिन यहां तो शादी के फूफा जी ऐसे हैं, जो कनात खड़ा होने से पहले ही यह शिकायत करने लगे हैं कि उसकी छत में कई सुराख नजर आएंगे। हो सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री का ऐसा आचरण प्रदेश में अपनी सक्रियता कायम  रखने की गरज का प्रतीक हो, किंतु यह भी तो देखना होगा कि इस सक्रियता का आज की स्थिति में शिवराज, भाजपा तो दूर, खुद को भी कितना लाभ दिलवा सकते हैं? वह विपक्ष के एक वरिष्ठ नेता जैसा आचरण दिखा ही नहीं पा रहे। पूर्व मुख्यमंत्री के ताजे अंदाज भाजपा के लिए भले ही 'मैं हूं ना!' के तेवर वाले हों, किंतु खुद पार्टी उनके लिए 'ये हैं ना!' वाला यकीन फिर स्थापित नहीं कर पा रही है।  शादी के समारोह में नाराज फूफा को कुछ और गड़बड़ नहीं मिला तो वो लपककर हलवाई वाले सेक्शन में जा धमके। वहां चाक-चौबंद इंतजाम थे। लेकिन फूफा को तो गलती तलाशना थी। कड़ाही से जलेबी उठाकर खाई और चीखते हुए बोले, 'मेहमानों को फीकी जलेबी खिलाएगा दुष्ट!' उनका तेज स्वर सुनकर वहां अच्छा-खासा मजमा लग गया। फूफा सबको सुनाते हुए चीखते रहे, 'हमारी तो कोई सुनता ही नहीं। कर लो मनमर्जी। हो गई पूरी जलेबी बर्बाद। लेकिन किसी को क्या!' सब सकते में थे। फिर हलवाई ने जवाब दिया, 'जनाब! अभी इसे चाशनी में डालना है।' वहां हंसी का फव्वारा छूट गया और फूफाजी अपना सा मुंह लेकर चलते बने। शिवराज जी, प्रदेश सरकार की जलेबी के चाशनी में डूबने तक तो धीरज रखिए, वरना हंसी का फव्वारा इस समय आपके लिए भी छूट सकता है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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