मोदी के कटाक्ष पर राहुल का मौन



जो लोग राहुल गांधी को गंभीरता से लेते हैं, वे इस शुक्रवार मायूस हुए होंगे। गांधी को बहुत गंभीरता से लेने वाले सदमे-जैसी हालत में होंगे। लेकिन वे पूर्णत: अविचलित दिखेंगे, जो गांधी का तटस्थ विश्लेषण करने की क्षमता रखते हैं।  गुरूवार को संसद में मोदी जिस तरह आन रिकॉर्ड कांग्रेस पर बरसे, उसके बाद गांधी को गंभीरता से लेने वालों को उम्मीद थी कि कांग्रेस अध्यक्ष भोपाल की सरजमीं से मोदी को इस सबका जवाब देंगे। उनके ‘अत्यंत गंभीर’  श्रेणी प्राप्त समर्थकों को आस थी कि कई महीनों से उनके नेता के श्रीमुख में कैद भूकम्प आ जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। गांधी ने मोदी के कल के तमाम कटाक्ष और आरोपों का जवाब देने का उपक्रम तक नहीं किया। ‘पचपन  साल बनाम पचपन महीने’ ‘सत्ताभोगी’ और ‘महामिलावटी’ जैसे जुमलों के प्रत्युत्तर में भी उनके तरकश में तीर नहीं दिखे। वही गुस्सा और वही राफेल से लेकर अंबानी, नीरव मोदी या ऐसे ही कुछ घिसे-पिटे जिक्र।  सच कहें तो कई बार गांधी की बतौर विपक्ष सियासी तैयारियों पर शुबहा होने लगता है।


इतने बड़े नेटवर्क वाली कांग्रेस को आज भी राफेल जैसे मुद्दे पर मोदी को घेरने के लिए किसी अखबार में छपी एक्सक्लूसिव खबर का सहारा लेना पड़ रहा है। आज भोपाल पहुंचने से पहले गांधी द्वारा दिल्ली में आयोजित संवाददाता सम्मेलन इसकी ताजा बानगी है।  चलिए मान लिया कि भोपाल में गांधी केवल किसानों से मुखातिब होने आए थे। लेकिन यह भी तो साफ है कि किसानों के बीच ही उन्होंने इस तबके से असंबद्ध कई पक्षों को खासा समय तथा तवज्जो दी। तो फिर यह क्यों नहीं हुआ कि इस समय का सदुपयोग वह मोदी के कल के आरोपों का जवाब देने में  नहीं कर सके? क्या इसकी वजह यह कि गांधी (समूची कांग्रेस को क्यों इसका दोषी कहें?) के पास इस बारे में कहने के लिए कुछ था ही नहीं। या इसका कारण यह मान लें कि मोदी के आरोपों में इतना दम था कि गांधी चाहकर भी अपनी  पार्टी के पचपन साल के शासन की कमियों का प्रतिवाद नहीं कर सके?  पिछले कुछ समय की गांधी की बॉडी लैंग्वेज पर गौर करें। वह आपे से बाहर होने लगे हैं।


मोदी का नाम किसी  सौतिया डाह की तरह उन्हें विचलित करता है और अपने दल की वर्तमान स्थिति पर मजबूती का मुलम्मा चढ़ाने का नाकाम जतन करते वह खीझ उठते हैं। ऐसी मानसिक दशा में वाकई किसी शख्स से बहुत तथ्यपरक बात कहने की उम्मीद करना बेमानी है। लेकिन गांधी जो लक्ष्य और दावे साथ लेकर चल रहे हैं, उसमें गांधी से इसके अलावा और किस बात की उम्मीद की जा सकती है कि वह नयी बोतल में पुरानी शराब भरने जैसे बचकाने कृत्य न करें! लेकिन वह ऐसा कर रहे हैं और शायद करते ही जाएंगे। क्योंकि कांग्रेस का ग्राफ भले ही कुछ बढ़ रहा हो, लेकिन गांधी यह जानते हैं कि खुद उनका ग्राफ तेजी से गिरा है। प्रियंका की राजनीति में एंट्री इस बात की सख्त चुगली करती है। ममता बनर्जी सहित मायावती, अखिलेश यादव, एन चंद्रबाबू नायडू एवं लालू यादव एंड फैमिली की गांधी के प्रति बेरुखी भी हमारे इस अनुमान को दम प्रदान करती है। फिर राहुल भी अंतत: एक इंसान ही हैं। राजनेता ऐसे, जिसे बिरसे में एक पार्टी और उसके सर्वेसर्वा का पद मिल गया। पद मिलने भर से क्षमताएं आ जातीं तो कई राजे-रजवाड़े देखते ही देखते मिट नहीं गये होते। गांधी को यह क्षमता पाने के लिए अभी लम्बा सफर तय करना है। कम से कम आज की सभा में मोदी के कल के लिए उनके मौन को देखकर तो कहा जा सकता है कि उन्हें बहुत लम्बा सफर तय करना है।  

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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